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--------भगवान
शंकराचार्य द्वारा लिखे गये ग्रन्थ "तत्त्वबोध"
की हिन्दी मे व्याख्या परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी ने अपनी पुस्तक तत्त्वबोध
में की है ।
यह वेदान्त दर्शन का ज्ञान
कराने वाली प्रथम पुस्तक है। वेदान्त के सभी साधको को इस पुस्तक का अध्ययन
अवश्य़ करना चाहिए। हम साधकों को तत्त्व का ज्ञान कराने के लिए इस पुस्तक को
अंशो में प्रस्तुत कर रहे है।
अंश संख्या -30
पिछला अंश
पंचकोशातीत
मदीयं शरीरं
मदीयाः प्राणाः,
मदीयं मनश्च मदीया बुद्धिः
मदीयं ज्ञानमिति
स्वेनैव ज्ञायते,
तद्यथा मदीयत्वेन
ज्ञातं,
कटककुंडल गृहादिकं,
स्वस्माद् भिन्नं,
तथा पञ्च कोशादिकं,
स्वास्माद् भिन्नं
मदीयत्वेन
ज्ञातमात्मा न भवति।
जैसे कटक,
कुण्डल,
गृह
आदि अपने से भिन्न हैं,
इसी
प्रकार मेरा शरीर,
मेरा प्राण,
मेरा मन,
मेरी बुद्धि,
मेरा ज्ञान - इस रूप में भासित होते पंचकोश आदि भी अपने से भिन्न हैं। ये सब
मेरे हैं इसलिए मैं (आत्मा) इनमें से कोई नहीं हुँ।
व्याख्या - ज्ञाता और ज्ञेय में भेद है। घट का द्रष्टा घट से
भिन्न होता है। वह अपने को घट नहीं समझता। इसी प्रकार यह गृह मेरा है तो भी मैं
स्वयं घर नहीं हुँ। ये कंकण और कुण्डल मेरे हैं,
ये
पहने हुए वस्त्र मेरे हैं किन्तु मैं इनमें से कोई नहीं हुँ। इसी प्रकार यह
शरीर,
यह प्राण,
यह
मन मेरा है किन्तु मैं स्वयं शरीर आदि नहीं हुँ। पंचकोश या तीन शरीर और इनमें
अनुभव होने वाले भूख-प्यास राग-द्वेष आदि नहीं हुँ। ये सब अनात्मा हैं।
सर्वाधिकार सुरक्षित - वेदान्तीजीवन
(काँ) 2002
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