अक्षरब्रह्मयोग

 

अक्षरब्रह्मयोग के अर्थ है "अक्षरब्रह्म की प्राप्ति का मार्ग" इस अध्याय के प्रारम्भ में अर्जुन द्वारा किए गये प्रश्नों के उत्तर देने के पश्चात अपनी दिव्य प्रेरणा से प्रेरित होकर भगवन कृष्ण ने , प्रयाकाल में परम पुरूष के स्मरण करने वाले को अनंत की प्राप्ति कैसे होती है, इसका वर्णन किया है और अर्जुन को इश्वर स्मरण करते हुए जीवन संघर्षो की चुनौतियों का कुशलता से सामना करने का उपदेश दिया है

 

10 घंटे की इस प्रवचन में स्वामी जी ने परमात्मा के मार्ग को सुखालय और जगत को दुखालय बताते हुए इश्वर में परम अनुरक्ति रखने का निर्देश दिया है। स्वामीजी ने यह भी बताया है मूड बदलना भी पुनर्जन्म है। स्वर्ग और नरक लोक मन की स्तिथि मात्र है। 

 

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