दैवासुरसंपद्विभागयोग
हिन्दुओं की एक और तीव्र आलोचना इस प्रकार भी की जाती है की अद्वैत सिद्धांत के समर्थको को सदाचार और नैतिक नियमो के प्रति कोई आदर नहीं है। भक्ति सम्प्रदायों तथा अन्य यहूदी धर्मो की अद्वैत वेदान्त के साथ तुलना करके वे अपनी प्रमाणशून्य श्रेष्ठता को स्थापित करने का साहसिक किन्तु हास्यास्पद प्रयत्न भी करते है। यह अध्याय उनकी इस आलोचना को असत्य सिद्ध करता है। गीता के अन्य अध्यायों से भी यह स्पष्ट ज्ञात होता है की किस प्रकार आत्मज्ञान की साधना में प्रवेश करने से पूर्व नैतिक मूल्यों के पालन पर वेदांत निरंतर बल देता है। इस अध्याय से यह भी स्पष्ट होगा की ऋषियों ने सदाचारी और दुराचारी मनुष्य के स्वभाव का कितना विस्तृत अध्यन किया था।
8 घंटे की इस प्रवचन में स्वामी जी ने इस अध्याय का विस्तार से व्याख्या किया है।
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