ज्ञानविज्ञानयोग
अर्जुन के
मन में यह शंका उठ सकती है कि एक परिच्छिन्न जीव के
अंतःकरण के द्वारा अनंतस्वरूप का ग्रहण कैसे संभव हो सकता
है। इस शंका का निवारणार्थ भगवान श्रीकृष्ण, इस अध्याय का
प्रारम्भ करते हुए वचन देते हैं कि वे ज्ञान और विज्ञानं
को समग्रतः बताएँगे जिससे किसी प्रकार कि शंका शेष नहीं
रहेगी। अपने विषय के प्रतिपादन तथा विस्तृत विवेचन करने
में , सभवतः, किसी भी अन्य धर्मं ग्रन्थ कि तुलना गीता के
साथ नहीं कि जा सकती। गीता एक अनुपम ग्रन्थ है। गीता न
केवल तत्वज्ञान का ग्रन्थ है , वरन विश्व के साहित्य में
वह ज्ञान और सौंदर्य से परिपूर्ण एक श्रेष्ट साहित्यिक
रचना भी है।
केवल ज्ञान
विशेष उपयोगी नहीं होता। ज्ञान का पूर्णत्व उसके यथार्थ
अनुभव में है। ज्ञान का उपदेश तो दिया जा सकता है, परन्तु
अनुभव (विज्ञान) नहीं। धर्मं तत्त्व ज्ञान का उपदेश देता
है और उसके साथ ही उन उपायों का भी निर्देशन करता है,
जिसके द्वारा वह ज्ञान साधक का अपना विज्ञान बन सके, और
जीवन के साथ एकरूपाय हो जाए। इस प्रकार धर्मं का प्रयोजन
ऐसे अनुभवी पुरुषों के निर्माण करना है जो जीवन के परम
पुरुषार्थ को प्राप्त करके, धर्मं को सत्योचित प्रमाणित
कर सके और अपने पीढियों को अनंदाभिभूत करके कृतार्थ करने
में सक्षम हो।
10 घंटे की इस प्रवचन में स्वामी जी ने इस अध्याय कि बहुत विस्तृत व्याख्या कि है।
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