कर्मयोग
युद्ध
से निवृत होकर और राज्य का वैभव का त्याग कर जंगलों में
सन्यासी जीवन व्यतीत करते हुए सत्य की खोज करने के लिए
अर्जुन ने विचार व्यक्त किया था।
भगवान श्रीकृष्ण ने अनेक तर्क
प्रस्तुत करते हुए अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से इसका
प्रतिवाद किया। भगवान ने यह उपदेश
दिया किया की कर्मफलास्क्ति छोड़कर
कर्म करना परम कर्तव्य है
। इस अध्याय की समाप्ति में भगवान ने ज्ञानमार्ग के उपदेश
से किया है। अर्जुन के इस शंका का उन्होंने समाधान किया है
की आत्मविकास के लिए कौनसा मार्ग अपनाये।
कर्मयोग का हमारे जीवन में क्या महत्व है। चाहे हम
व्यापारी हो या नौकरी में हो या फिर खेतो में काम कर रहे
हो फल की आसक्ति किए बिना कर्म कैसे हो इसका विस्तार से
व्याख्या स्वामीजी ने १३ घंटे की इस प्रवचन में किया है ।
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