क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
शरीर,इन्द्रिय,मन आदि जड़ उपाधियाँ तथा उसके द्वारा दृश्य रूप में अनुभव किया जाने वाला जगत - ये दोनों क्षेत्र कहलाते है और जो चैतन्यस्वरूप परमात्मा इस क्षेत्र को प्रकाशित करता है, वह इन्द्रियादि उपाधियों की दृष्टि से क्षेत्रज अथार्त "क्षेत्र का ज्ञाता" कहलाता है। जब वह क्षेत्र को प्रकाशित करता है तभी उसे क्षेत्रज नाम मिलता है।
गीता का अतिशय उज्जवल अध्याय है यह जो हमें नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त आत्मस्वरूप के ध्यान करने के साधन का उपदेश देता है। जिसके अभ्यास से हम अप्रोक्षनुभूति प्राप्त कर सकते है। स्वप्न से जग जाने का अर्थ स्वप्नावस्था के सब दुखो का अंत हो जाना है। जाग्रत, स्वप्न, और सुषुप्ति अवस्था के मंध्य यातायात की कोई निश्चित सीमा नहीं निर्धारित की गयी है अर्थात अवस्थांतर के लिए हमें कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता है।
10 घंटे की इस प्रवचन में स्वामी जी ने परमात्मा के स्वरुप और उसे समझकर उससे एक होने के र्माग का विस्तार से व्याख्या किया है।
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