मोक्षसंन्यासयोग
वस्तुतः यह अंतिम अध्याय संपूर्ण
भगवद्गीता का सारांश है। यदि द्वितीय अध्याय गीता का
पूर्वानुमानित सारांश है तो अठारहवाँ अध्याय गीता का
सिंहावलोकन करता है। यह पहले ही सिद्ध किया जा चुका है कि
सर्वत्र एक ही सच्चित्स्वरूप परमात्मा प्रकृति में प्रकट
होकर स्वय ही इस नानाविध सृष्टि का रुप धारण करता है। यह
नाम रुपमय सृष्टि विविध वर्णी है;
यहाँ वस्तुओं और व्यक्तियों के गुण, स्वभाव और व्यवहार में
असंख्य छटाओं की विविधता देखी जाती है
इस अध्याय में हमारी वासनाओं, प्रवुर्तियों, भावनाओं एवं
कर्मो आदि का सूक्ष्म अध्ययन एवं विश्लेषण करके उनका
वर्गीकरण किया गया है। जीवन की वास्तविकता को बताने वाले ये
सब संकेतक है, अतः इनका ज्ञान होने पर मनुष्य स्वयं का ही
सूक्ष्म अध्ययन करने में समर्थ हो सकता है।
20 घंटे की इस प्रवचन में स्वामी जी ने इस अध्याय का विस्तार से व्याख्या किया है।
सुने इन्टरनेट आरकाईव में
डाउनलोड करे इन्टरनेट आरकाईव से जीप फाईल
एम पी 3 डाउनलोड करे विन्डो लाईव से