पुरुषोत्तमयोग
प्रस्तुत अध्याय में गीताचार्य भगवान
श्रीकृष्ण आत्मस्वरूप के सभी आयामों का विवेचन करते है।
ज्ञात वस्तु के द्वारा ही अज्ञात का बोध कराया जा सकता है।
विषय, भावनाओं,
तथा विचारो का व्यक्त जगत हमें ज्ञात है।
"कारण के बिना कोई कार्य नहीं हो
सकता" और समस्त कार्य अपने उपादान कारण
के द्वारा धारण किये जाते है, जैसे
कपास के द्वारा सभी वस्त्र।
युक्तिसंगत तथ्य के आधार पर भगवान पार्थ सारथि हमारे मन को इस ज्ञात जगत से ऊपर उठाकर अज्ञात
ज्ञेय वस्तु में स्थिर करने का प्रयत्न करते है।
इस नित्य परिवर्तनशील नश्वर जगत की दृष्टि या तुलना में
आत्मा को नित्य और अक्षर कहा गया है।
तत्पश्चात भगवान कहते है की इन
क्षर और अक्षर तत्वों से भिन्न निरुपाधिक ब्रह्म
पुरुषोत्तम कहलाता है जो सब का अधिष्ठान
है।
7 घंटे की इस प्रवचन में स्वामी जी ने निरुपाधिक ब्रह्म पुरुषोत्तम जो चैतन्य रुप में व्याप्त है उसके ज्ञान का विस्तार से व्याख्या किया है।
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