राजविद्याराजगुह्ययोग
इस अध्याय के लिए दिया गया यह नाम उपयुक्त है। शुद्ध चैतन्य ही वह ज्ञान है जिसके प्रकाश में सभी औपाधिक या वृतिज्ञान संभव है। अतः उस पारमार्थिक तत्त्व का बोध कराने वाली इस विद्या को राजविद्या कहना अत्यन्त समीचीन है। उपनिषदों में इसे "सर्वविद्या प्रतिष्ठा" कहा गया है, क्योकि "इसे जानकर और कोई जानने योग्य शेष नही रह जाता है" - यही मुन्डकोपनिषद् की भी घोषणा है
15 घंटे की इस प्रवचन में स्वामी जी ने इस ज्ञान का बोध सा करा दिया है।
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