सांख्ययोग
सांखयोग में
गीता के संपूर्ण तत्त्वज्ञान का सार मिलता है। इसके प्रथम
दस श्लोको में उन परिस्तिथियों का वर्णन है जिनमे अर्जुन
पूर्ण रूप से भगवन के सामने आत्मसमर्पण करता है। उसके बाद
११ से ४६ वे श्लोक तक सांख्योग का निरूपण मिलता है। ४७वे
से ६०वे श्लोक तक कर्मयोग की
विस्तृत रूपरेखा है। ६१वे से लेकर ७०वे श्लोक तक
भक्तियोग का निर्देश है और अन्तिम दो श्लोको में संक्षेप
में संन्यास का लक्षण बताया गया है।
यह अध्याय सारे उपनिषदों में बताये गए तत्वज्ञान का सार प्रस्तुत करता है। इस अध्याय से अर्जुन रोग का क्रिश्नौप्चार भी प्रारम्भ होता है।
सांख्ययोग की इतनी पूर्ण व्याख्या किसी भी ग्रन्थ में लिखना संभव नही हो सकता। सुनते सुनते ऐसा प्रतीत होता है की अब हमारे और परमात्मा में कोई भेद नहीं रह गया है। ऐसी व्याख्या करने के लिए अपना अनुभव होना आवश्यक है - 33 घंटे की इस प्रवचन में स्वामी जी ने उपनिषदों में बताये गए तत्वज्ञान को बहुत सरल तरीके से प्रस्तुत किया है।
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