विश्वरुपदर्शनयोग

 

इस अध्याय का "विश्वरुपदर्शनयोग" यह नाम सार्थक है। वेदान्तशास्त्र की परिभाषिक शब्दावली के अनुसार यहाँ प्रयुक्त "विश्वरुप" शब्द का वास्तविक अर्थ "विराट-रुप" है। आत्मा एक "व्यष्टि स्थूल देह" के साथ तादात्मय को प्राप्त होकर जाग्रत अवस्था की घटनाओं का अनुभव करता है। इस अवस्था में स्थित आत्मा को वेदान्त में "विश्व" कहा जाता है। वही आत्मा "समष्टि स्थूल देह" अर्थात ब्रह्माण्ड के साथ तादात्मय प्राप्त कर "विराट" कहलाता है। यद्यपि भगवान ने अपना विराट रुप दिखाया है, तथापि इस अध्याय का नाम "विश्वरुपदर्शनयोग" है। इससे विश्व और विराट् के परमार्थिक एकत्व का बोध होता है।
 

11 घंटे की इस प्रवचन में स्वामी जी ने इस अध्याय का विस्तार से व्याख्या किया है।

 

सुने इन्टरनेट आरकाईव में

 

 

डाउनलोड करे इन्टरनेट आरकाईव से जीप फाईल

 

 

एम पी 3 डाउनलोड करे विन्डो लाईव से

चिन्मय मिशन

चिन्मय मिशन एक आध्यात्मिक संस्था है जो गुरुदेव स्वामी चिन्मयानन्द जी  द्वारा स्थापीत की गई. शेष ...

वेदान्त अध्ययन