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दान कैसा हो और क्यों हो ?


श्रीमद्भगवदगीता में भगवान कहते है


 

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेनुपकारिणे

  देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्विकं स्मृतम।।20।।

   श्रीमद्भगवदगीता (अ0 17)

 

 दान देना ही कर्तव्य है - इस भाव से जो दान योग्य देश, काल को देखकर ऐसे पात्र व्यक्ति को दिया जाता है, जिसमें प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं होती है, वह दान सात्त्विक माना गया है।

 

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपः क्रियाः ।

 दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकांक्षिभि।।25।।

   श्रीमद्भगवदगीता (अ0 17)

 

 तत् शब्द का उच्चारण कर , फल की इच्छा नहीं रखते हुए, मुमुक्षुजन यज्ञ, तप, दान आदि विविध कर्म करते है।     

 

  दान कर्तव्य समझकर योग्य व्यक्ति को बिना किसी अपेक्षा के देना चाहिए। दान करने से अहंकार का नाश होता है। अहंकार के अभाव में, अन्तःकरण की पूर्वार्जित वासनाएं नष्ट हो जाती हैं और नई वासनाएं उत्पन्न नहीं होती। यही मुक्ति है।  

 

 

"दानशीलता ऐसा प्रयास है, जिसके जरिए मैं अपने जीवन का दायरा बढ़ाने और अपने चारों ओर के समस्त तत्वों को समाहित करने का प्रयास करता हूँ। इसके जरिए मैं दूसरों की जरुरतों को उतना ही महत्त्वपूर्ण मानने की कोशिश करता हूँ जितनी कि मेरी खुद की जरुरतें। कम से कम अपने निकटतम संपर्क में आनेवाले लोगों से तादात्म्य बनाने का अर्थ है दमघोंटू स्वार्थपरता और अपनी ऐन्द्रिक मोहबद्धता से दूर होना।"   

-पूज्य गुरुदेव स्वामी चिन्मयानन्द

पितामह सदन, मंधना, कानपुर

अवकाश प्राप्त वरिष्ठ नागरिकों की सेवा के लिए पूज्य गुरुदेव स्वामी चिन्मयानन्द जी के मन में एक विशिष्ट कल्पना थी। जहाँ कहीं अवसर मिला उन्होने देश के विभिन्न भागों में कई पितामह सदन स्थापित किए। उनमें से मद्रास, कोयम्बटूर, रीवा और कानपुर के पितामह सदन प्रमुख है। स्थानीय परिवेश के कारण इन सबका बाहरी स्वरुप कुछ भिन्न है। कानपुर का पितामह सदन सबसे अन्त में उद्भूत हुआ। यह कानपुर से करीब 10 किलोमिटर उत्तर में आई.आई.टी की तरफ सें बिठुर जाने वाले रास्ते में मंधना नामक स्थान पर स्थित है।पितामह सदन, कानपुर, इस समय चिन्मय मिशन के हिन्दी गतिविधीयों का एक महत्वपूर्ण केन्द्र है। इस समय पितामह सदन, मंधना, कानपुर में लगभग 30 पितामह और 10  कर्मचारी रहते है। सबको अन्नक्षेत्र से भोजन मिलता है। आश्रमवासियों को अपने कमरे में भोजन बनाने की स्वीकृति नहीं है। उनका अधिकांश समय मंदिर की आरती, सत्संग, प्रवचन सुनने, स्वाध्याय करने, जप करने और ध्यान करने में व्यतीत होता है। वे आश्रम के लिए अपनी सेवायें अर्पित करते है। कार्यालय , पुस्तक प्रकाशन, चिन्मय चन्द्रिका, चिकित्सालय तथा बाजार का कार्य उन्हीं के द्वारा होता है।

 

पितामह सदन का प्रबन्धन 

चिन्मय तपोवन ट्रस्ट द्वारा किया जाता है।

आप निम्नलिखित दान कर सकते है।

 

सं हेतु

दानराशि (एक दिन के लिए) रुपए

1 नाश्ता 600
2 दोपहर का भोजन 1200
3 रात्रि का भोजन 1200
4 वनखण्डेश्वर मन्दिर का प्रसाद एक महीने के लिए 1000
5 अन्य इच्छानुसार

नोट -चिन्मय तपोवन ट्रस्ट को दिये गये दानराशि पर दानकर्ता आयकर अधिनियम,1961 की धारा 80-जी के अन्तर्गत आयकर में छूट प्राप्त कर सकते है।    

दान हेतु चेक या ड्राफ्ट चिन्मय तपोवन ट्रस्ट के नाम कानपुर के किसी बैंक मे देय

अपने पते के साथ निम्नलिखित पते पर भेजे

चिन्मय मिशन, 4 / 284, नवशील सदन, फ्लैट न0 -202, पार्वती बागला रोड, कानपुर,

उत्तर प्रदेश-208002

    फोन - 0512- 2553313

अधिक जानकारी के लिए ई मेल करे - vedantijeevan@gmail.com

     ऊँ परमात्मने न