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शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ

मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ ।

सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं

    सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ।25।

दूसरे लोगों से लडने में अथवा उनसे मित्रता करने में अपनी शक्ति का अपव्यय न करो। अपने बन्धु-बान्धवों से राग-द्वेष मत रखो। सर्वत्र अपने ही स्वरूप को देखो, भेद बुद्धि का त्याग करो और अज्ञान से छुटकारा पाओ।

(भज गोविन्दं से)

 

 

कब किया गया इस वेबसाइट का संपादन

01-10-2007 07:19:44 AM

नया

 

 

"ध्यान, ध्यान, ध्यान और ध्यान - यही पूर्णता का एकमात्र सीधा, सरल और सच्चा रास्ता है।"

ब्रह्मलीन परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी के र्निदेशन में वेदान्त के प्रचार प्रसार के लिए इस वेबसाईट का र्निमाण सन् 2002 में हुआ। चिन्मय मिशन को और वेदान्त ग्रन्थ के हिन्दी प्रकाशन में उनका बड़ा योगदान रहा है। 10 सितम्बर को स्वामी शंकरानन्द जी की जन्मतिथी और 29 सितम्बर को र्निवाण दिवस है। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी हम ध्यान पर उनके प्रवचन की एम पी थ्री सी ड़ी तथा स्वामी तेजोमयानन्द जी द्रारा लिखे "दृग्दृश्य विवेक" पुस्तक का निःशुल्क वितरण कर रहे है। अपने पते के साथ ई मेल करे - vedantijeevan@gmail.com

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भगवान शंकराचार्य द्वारा लिखे गये ग्रन्थ "तत्त्वबोध" की हिन्दी मे व्याख्या परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी ने अपनी पुस्तक तत्त्वबोध में की है । यह वेदान्त दर्शन का ज्ञान कराने वाली प्रथम पुस्तक है। वेदान्त के सभी साधको को इस पुस्तक का अध्ययन अवश्य़ करना चाहिए। हम साधकों को तत्त्व का ज्ञान कराने के लिए इस पुस्तक को अंशो में प्रस्तुत कर रहे है।

अंश संख्या -19 

वाचो विषयः भाषणम् । पाण्योर्विषयः वस्तुग्रहणम् ।

पादयोर्विषयः गमनम् । पायोर्विषयः मलत्यागः ।

उपस्थस्य विषयः आनन्द इति ।

वाणी का विषय भाषण, हाथ का वस्तुग्रहण, पैर का चलना, गुदा का मल त्याग और उपस्थ का विष प्रजनन सुख है।

व्याख्या- कर्मेन्द्रियों के कर्म ही उनके विषय हैं। वाणी एक कर्मेन्द्रिय है। उसके द्वारा बोलने का काम होता है। हाथ दूसरी कर्मेन्द्रिय है। उसके द्वारा कोई वस्तु पकडते हैं। इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों के अपने काम समझने चाहिए।

सूक्ष्म शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण तथा मन और बुद्धि बताये गये हैं। इनमें से ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का वर्णन यहाँ कर दिया गया । प्राण, मन और बुद्धि का वर्णन यहाँ नहीं करते हैं। उनका विवरण पंचकोश विवेक में किया जायेगा।

यहाँ अब कारण शरीर का वर्णन करते हैं।

पिछला अंश

सर्वाधिकार सुरक्षित - वेदान्तीजीवन (काँ) 2002