वेदान्त - जीवन जीने की कला
वेबसाइट का उद्देश्य
अधिक से अधिक लोगों को अधिक से अधिक समय के लिए अधिक से अधिक सुख पहुँचाना ही हमारा धमॅ है। अतः इस वेबसाइट का उद्देश्य हिन्दी वेबसंसार को भली भाँति परीक्षा किए हुए वेदान्ती जीवन दशॅन का ज्ञान कराना है। इसका अनुसरण करने से संसार का कोई भी व्यक्ति क्रमशः विकास करते हुए आनन्द के उच्च स्तर का श्रेष्ठतम् जीवन जी सकता है।
वेदान्तिक जीवन क्यो ?
वेदान्तिक जीवन का लक्ष्य मनुष्य को ईन्द्रियों की गुलामी, मानसिक कमजोरी और बौद्धिक नपुंसकता से ऊपर उठाकर इस पृथ्वी पर ऐसा भगवान बनाना है जो सभी श्रेत्र में स्वतंत्र और कुशल हो, सभी कार्य में महान और दिव्य हो, सभी स्थिति में शांतिपूर्ण और निर्मल हो, सभी अवस्था में प्रफुल्लित और शांतचित्त हो – हमेशा अपनी भावनाओं और इच्छाओं का मालिक हो, कभी अपनी भावनाओं और विचारों का गुलाम न हो।
-गुरुदेव स्वामी चिन्मयानन्द जी
वेदान्त क्या है ?
वेदान्त का अर्थ है वेदों का अंतिम निर्णीत सिद्धान्त । वेद चार है ऋग, साम, यजुर और अथर्व। प्रत्येक वेद के चार भाग हैं- मंत्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् । मंत्र भाग सूक्तों का संग्रह है। इसमें प्रकृति के सौन्दर्य का वर्णन है, जीवन के सुखद रुप का गुणगान है और देवताओं की स्तुतियाँ है। ब्राह्मण भाग में कर्म-सिद्धान्त का निरुपण है। शुभाशुभ कर्मो का विवेचन, उनके फलस्वरुप होने वाले पाप-पुण्य और सुख-दुःख का वर्णन यहीं किया गया है। कर्मानुसार प्राप्त होने वाले उच्च नीच लोक और जीव के पुनर्जन्म का रहस्य भी यहीं बताया गया है । इसी भाग में यज्ञों का विधान है और उत्कृष्ट भौतिक जीवन जीने की लिए प्रेरणा दी गयी है। आरण्यक भाग में परमात्मा का ज्ञान प्राप्त करने और अपनी आंतरिक शक्तियों को जाग्रत करने के लिए प्रेरित किया गया है । इसके साधनभूत त्याग, वैराग्य और तपस्या करने के लिए कहा गया है । उपनिषदों में परम तत्त्व का ज्ञान है । इस ज्ञान के बल पर हम शारीर और जीव भाव से ऊपर उठकर आत्मभाव या परमात्मभाव को प्राप्त कर सकते हैं। यह हमारी पुर्नावास्था है। इस स्थिति को प्राप्त कर परम शांति, विश्राम और आनंद प्राप्त की जाती है।
यह उपनिषद जो वेदों का अंतिम भाग है और ज्ञान आधारित है, वेदांत ज्ञान की नीव है। हम वेदों को दो भागों में भी बाँट सकते है। पहला भाग जो कर्मकांड पर आधारित है पूर्वमीमांसा कहते है और दूसरा भाग जो ज्ञान पर आधारित है उत्तरमीमांसा कहते है। सही अर्थो में उत्तरमीमांसा ही वेदों का सार है। यहीं वेदान्त है। वेदान्त के जो तीन मुख्य ग्रन्थ है वो है उपनिषद, श्रीमद्भागवद्गीता और ब्रह्मसूत्र । इन तीनों को प्रस्थानत्रय ग्रन्थ भी कहते है। उपनिषद जो वेदों का भाग है उसे श्रुति कहते है। श्रुति इसलिए क्योंकि वे प्राचीन कल में लिखित रूप में उपलब्ध नहीं थे । उन्हें स्मृति पटल पर याद रखा जाता था । याद रखने वाले व्यक्ति से कोई दूसरा व्यक्ति सुन कर सीखता था और स्वयं भी याद कर लेता था । श्रीमद्भागवद्गीता और ब्रह्मसूत्र स्मृति ग्रन्थ कहलाते है । स्मृति ग्रन्थ श्रुतियो का स्मरण दिलाते है। इन तीनों ग्रंथो के अलावा दूसरे ग्रन्थ भी है जो प्रकरण ग्रन्थ कहलाते है । उपनिषद, श्रीमद्भागवद्गीता और ब्रह्मसूत्र जैसे प्रस्थानत्रय ग्रंथो को सीधे समझना कठिन है , इसलिए इनको समझने के लिए कुछ दूसरे सहायक ग्रंथो की रचना की गयी। इन ग्रंथो को प्रकरण ग्रन्थ कहते है। पंचदशी, तत्वबोध, आत्मबोध, विवेक चूडामणि आदि ग्रन्थ प्रकरण ग्रन्थ है।
इन ग्रंथो की गणना संसार के प्राचीन और सर्वश्रेष्ठ साहित्य में की जाती है। इसमें प्रतिपादित सत्य सार्वभौमिक और सार्वकालिक है । सभी देशों के मूर्धन्य विद्धानों ने इसे स्वीकार किया है । इस ज्ञान से मनुष्य मात्र को परिचित कराना हमारा सबसे बडा धर्म है । वेदान्त -दर्शन का विवेचन अनेक आचार्यों ने देश काल के अनुरुप सर्व सुलभ रुप में किया है । हम यहाँ भगवान आदि शंकराचार्य की व्याख्या का अनुसरण करेंगे।उनका जीवन काल 1200 वर्ष पूर्व माना जाता है । उन्होंने वेदान्त ग्रन्थों पर भाष्य लिखे और मधुर भाषा में छन्दबद्ध स्वतन्त्र ग्रन्थ भी लिखे।
वेदान्ती जीवन दर्शन का ज्ञान प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विषयों का अध्ययन करना चाहिए ।