------वेदान्त अध्ययन विधि


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प्रश्न

मणिरत्नमाला 

माया से अज्ञान, अज्ञान से प्रेय मार्ग, प्रेय मार्ग पर पाप कर्म और नरक का दुःख प्राप्त होता है। नरक के बारे में हम चौथे प्रश्न में विचार कर आये हैं वहां आचार्य ने कहा था कि अपने शरीर में अहंकार और आसक्ति की नरक है। वह इसी जीवन में अनुभव होता है। अब यहा नरक में पडने का कारण कहते है। आचार्य का कहना है कि जब तक हम स्त्री-सुख की कामना करते रहेंगे, नरक में पडे रहेंगे। स्त्री ही नरक का द्वार है। तात्पर्य यह है कि काम-वासना अन्य सब वासनाओं की अपेक्षा प्रबल है और उसी की पूर्ती के लिए जीव को बार-बार शरीर धारण करना पडता है। शरीर प्राप्त होने पर उसमें आसक्ति रहती है और उसी में नारकीय पीडा और दुःख भेगना पडता है। इसलिए सरल शब्दों में यह कह दिया गया कि नारी ही नरक का द्वार है। --------शेष भाग

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"तत्त्वबोध"

 - वेदान्त दर्शन का ज्ञान कराने वाली प्रथम पुस्तक है। वेदान्त के सभी साधको को इस पुस्तक का अध्ययन अवश्य़ करना चाहिए।   -  शरीर-मन-बुद्धि अनात्मा हैं। उनके आवरण में हम स्वयं अपने को नहीं देख रहे हैं। आचार्य का आदेश है कि इन आवरणों को हटाकर अपने को जानने का प्रयास करना चाहिये। - शेष भाग

 

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पञ्चदशी

हम अपने अनुभव से जानते हैं कि हमारे एक ज्ञान में ही शब्द आदि विषय एक के बाद एक आते हैं। विषय बदलते रहते हैं, किन्तु उनको ग्रहण करने वाला एक ही रहता है। विषय के बदलने के साथ ज्ञान नहीं बदलता। जैसे एक किलो बाँट से एक किलो गेहूँ तौलने के बाद, एक किलो चीनी और फिर एक किलो दाल तौलते हैं, तो तौली हुई वस्तु बदलती जाती है किन्तु एक किलो का बाँट वही रहता है, वैसे ही एक ही ज्ञान से सब विषय जाने जाते हैं। विषयों के बदलने पर ज्ञान नहीं बदलता। इस प्रकार विषयों की अनेकता देखकर हम कह सकते हैं कि विषय विभक्त हैं, उनमें भेद है, किन्तु ज्ञान अविभक्त है उसमे भेद नहीं है।-शेष भाग


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"दानशीलता -  इसके जरिए मैं दूसरों की जरुरतों को उतना ही महत्त्वपूर्ण मानने की कोशिश करता हूँ जितनी कि मेरी खुद की जरुरतें--------पूज्य गुरुदेव स्वामी चिन्मयानन्द


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03-01-2009 09:58:11 AM

 

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