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वेदान्त लेख


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सदगुरुवे नमः

 

सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजित पदाम्बुजः।

वेदान्ताम्बुजसूर्योयः तस्मै श्रीगुरवे नमः।।६।। 

जिनके चरण कमलों में सभी श्रुति रत्न विराजित हैं और जिनके सूर्य सदृश ज्ञानालोक से वेदान्त कमल विकसित होता है उन गुरुदेव को मेरा प्रणाम है।

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लेखक

1

वेदान्त दर्शन

परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी

2

गुरु शिष्य संबंध

परम पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द

3

शंकराचार्यजी एक महान् धर्म - प्रचारक

परम पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द

4

सांसारिक अनुराग

परम पूज्य स्वामी तपोवन महाराज

5

प्रार्थना

परम पूज्य  स्वामी सुबोधानन्द जी

6

उपासना कैसे करें

प्रो . राम औतार शर्मा

7

ध्यान विधि

परम पूज्य स्वामी तेजोमयानन्द जी

8

स्थितप्रज्ञ के लक्षण

राजेश कुमार

9

कुछ महान कार्य अवश्य करें

परम पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द

10

 

शिव गीता (रामचरितमानस बालकाण्ड से उद्धृत)

परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी

 

11

उपासना का मार्ग

परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी

12

तपस्या का अर्थ

परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी

13

माई लिटिल मास्टर....

पूज्य ब्र. रमन चैतन्य

14

आत्म ज्ञान

परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी

15

अध्यात्म की दो मंजिलें

परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी

16

अवस्थात्रय विवेक

परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी

17

सकाम कर्म के दोष

परम पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी

18

श्रीराम कथा का महत्व

परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी

19

आध्यात्मिक जीवन के आवश्यक अंग

स्वाध्याय मण्डल से

20

जीवन तुम्हारा है।

परम पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी

21

मनुष्य जीवन की सफलता क्या है ?

परम पूज्य  स्वामी सुबोधानन्द जी

22

सन्यास का प्रारम्भिक अनुभव

परम पूज्य स्वामी तपोवन महाराज

23

वर्तमान में युवकों के लिये गीता का उपदेश

परम पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी

24

वासांसि जीर्वानि यथा विहाय

परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी

25

   सन्यास क्यों?

परम पूज्य स्वामी तपोवन महाराज

26

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि

डा. दुर्गादत्त पाण्डेय

27

संसार समुद्र से उद्वार का उपाय

परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी

28

बंधन मुक्त

परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी

29

गुरू और शिष्य

परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी

30

स्वर्ग और नरक

परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी

31

परब्रह्म की प्राप्ति

 के साधन

परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी

32

ध्यान और जीवन

परम पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी