|
जीवन के समस्त
अनर्थों का कारण विस्मृति या अज्ञान है । अज्ञान के कारण ही हम अपने वास्तविक
स्वरूप को भूल कर,
जो हम नहीं हैं उसी को अपना रूप
समझने लगते हैं । अपने स्वरूप की विस्मृति अज्ञान का विचित्र उदाहरण है ।
अपनी ही जेब में पड़े हुये धन
को कभी अल्मारी और कभी बक्सों में खोजते फिरना क्या अज्ञान नहीं है?
धन के खो जाने
से व्यक्ति बहुत दुःखी होता है । किन्तु जब किसी ने याद दिलाई कि जरा अपना
जेब भी तो देख लो,
तो धन मिल जाता है और खुशी से
चेहरा खिल उठता है । धन न कहीं गया था न खोया था । केवल जरा सी विस्मृति ने
समस्या उत्पन्न कर दी थी जिससे चिन्ता व दुःख उत्पन्न हुआ । दृष्टि स्वभावतः
बाहर की ओर ही जाती है । ध्यान संसार में भटकता रहता है और बाहरी वस्तुओं व
व्यक्तियों में हम इतना उलझ जाते हैं कि स्वयं को जानने का समय ही नहीं मिलता
। यही बंधन या माया है ।
आत्म विस्मृति के विषय में एक
कथा बहुत प्रचलित है । कोई दस मूर्ख पुरुष किसी कार्यवश अपने गाँव से दूसरे
गाँव जाने के लिये निकले । उन्हें रास्ते में जाते हुये एक नदी पड़ी ।
वर्षाकाल होने से नदी भरपूर बह रही थी,
फिर भी कार्य आवश्यक
होने के कारण उन्हें तैरकर नदी पार करनी पड़ी । पार पहुँचने पर उन्हें शंका
हुई कि कहीं उनका कोई साथी गुम तो नहीं हो गया है । उनमें से एक समझदार मूर्ख
समूह से बाहर निकला और गिनती करने लगा । उसने शेष नौ को तो गिना किन्तु अपने
आपको गिनना भूल गया । बार बार गिनती करने पर नौ व्यक्ति ही मिले तब उसने कहा
-
"हममें
से एक व्यक्ति नदी में डूब गया है,
इसलिये दसवां आदमी दिखाई
नहीं देता है"।
यह अपने स्वरूप की अज्ञानता है । इसे जीव की पहली अवस्था कहते हैं ।
नौ आदमियों ने पूछा - दसवां
कैसे नहीं है ?
गणना करने वाला
बोला - दसवाँ आदमी दिखाई नहीं देता,
इसलिये दसवाँ नहीं है ।
यह आवरण का स्वरूप है । इसे जीव
की दूसरी अवस्था कहते हैं । यह सुनकर सभी नौ लोग रोने लगे । उन्हें रोता
देखकर गणना करने वाला व्यक्ति भी रोने लगा । यह विक्षेप का स्वरूप है। इसे
जीव की तीसरी अवस्था कहते हैं ।
उन लोगों को रोता हुआ देखकर एक
अन्य राहगीर उनके निकट आया और पूछने लगा -
'भाई
तुम क्यों रोते हो?'
गणना करने वाला बोला -
'हममें
से एक आदमी नदी में डूब गया है,
इसलिये हम रो रहे हैं।'
राहगीर बोला -
'कौन
मर गया है?'
गणना करने वाला बोला -
'हम
दस लोग घर से निकले थे । नदी पार करने के बाद केवल नौ शेष बचे हैं,
इसलिये दसवाँ डूब गया ।'
गणना करने वाले ने फिर से गिनती
करके राहगीर को बताया कि ये नौ हैं,
दसवाँ गायब है। यह देखकर
राहगीर तुरंत समझ गया कि ये सब मूर्ख हैं । यदि इन्हें मैं युक्तिपूर्वक नहीं
समझाऊँगा तो ये रो-रो कर प्राण दे देंगे । इसलिये वह बोला -
'तुम
लोग रोओ मत,
तुम्हारा दसवाँ आदमी मरा
नहीं है। वह जीवित है और यहीं है ।'
यह परोक्ष ज्ञान का
स्वरूप है और जीव की चौथी अवस्था है ।
दस पुरुषों में से सभी पूछने
लगे कि वह हमारा साथी कहाँ है
?
राहगीर ने कहा कि तुम सब
बैठ जाओ,
मैं दसवाँ आदमी बताता हूँ ।
राहगीर ने नौ आदमियों को गिनने के बाद दसवें से कहा कि तुम दसवें आदमी हो ।
यह अपरोक्ष ज्ञान का स्वरूप है । इसे जीव की पाँचवीं अवस्था कहते हैं ।
इस प्रकार जब दसवें पुरुष ने
जाना कि वह अज्ञान के कारण अपने आपको नहीं गिन पा रहा था और दसवाँ पुरुष वह
स्वयं है,
तो उसने कहा -
'दसवाँ
मैं हूँ,
अहं दशमोऽस्मि'
और उसका शोक निवृत हो
गया । यह शोक निवृत्ति का स्वरूप है और जीव की छठी अवस्था है।
उसे हँसता देखकर शेष सभी लोग भी
हँसने लगे । यह निरंकुश तृप्ति का स्वरूप है । इसे जीव की सातवीं अवस्था कहते
हैं । इसके बाद वे दस पुरुष अपने काम के लिये चल दिये । राहगीर भी अपने गाँव
चला गया ।
इस दृष्टांत से स्पष्ट है कि
समस्त दुःखों का कारण अज्ञान है । यह अज्ञान आत्म विस्मृति रूप है। अज्ञान के
निवृत्त होते ही सभी दुःख और समस्यायें समाप्त हो जाती हैं । पुरुष अपने सहज
आनन्द को प्राप्त कर सदा के लिये तृप्त हो जाता है । अज्ञान अनादि भले ही हो
किन्तु अनन्त या शाश्वत नहीं है । ज्ञान होते ही अज्ञान उसी प्रकार विलीन हो
जाता है जैसे प्रकाश होते ही अन्धकार।
ज्ञान का पाना किसी भौतिक वस्तु
के पाने से भिन्न है । भौतिक वस्तु पहले हमें अप्राप्त रहती है । उसको पाने
की इच्छा होने पर हम प्रयत्न करते हैं । यदि प्रयत्न काल और दैव अनुकूल हुये
तो वह वस्तु हमें प्राप्त हो जाती है । उसका उपभोग होने पर या कुछ काल के बाद
वह वस्तु नष्ट हो जाती है।आत्मज्ञान किसी अप्राप्त वस्तु को प्राप्त करने
जैसा नहीं है । आत्मज्ञान तो अपना ज्ञान है,
अपने यथार्थ स्वरूप की
स्फुरणा है,
अनुभूति है । दसवें पुरुष की
तरह अपनी स्मृति है ।
जिसे जो वस्तु पहले से प्राप्त
है उसके लिये अलग से प्रयत्न करने की क्या आवश्यकता है और न ही किसी अन्य
द्वारा उसे देने का प्रश्न उठता है । आत्मा का अर्थ है अपना अस्तित्व । वह
अस्तित्व तुम्हें पहले से प्राप्त है । उसके पाने का प्रश्न ही नहीं उठता और
न ही उसके लिये किसी प्रयत्न या कर्म की अपेक्षा है । उसकी स्मृति ही
पर्याप्त है । स्मरण आते ही हम कह देते हैं
-
अहं दशमोऽस्मि,
अहं ब्रह्मास्मि ।
गुरू या अधिकारी व्यक्ति से
श्रवण करते ही जो अपने अस्तित्व की स्मृति होती है,
उसे परोक्ष ज्ञान कहते
हैं । यह स्थिति आते ही दुःख तो दूर हो जाता है किन्तु अभी सुख की अनुभूति
नहीं होती। दसवें व्यक्ति ने जब राहगीर से सुना कि डूबा कोई नहीं है,
तो उसने रोना बन्द कर
दिया। किन्तु वह दसवें की प्रतीति न होने तक सुख अनुभव नहीं करता । इससे
स्पष्ट होता है कि अपने स्वरूप की प्राप्ति किसी कर्म के द्वारा नहीं बल्कि
ज्ञान द्वारा होती है ।
ज्ञान से हमें अपने विस्मृत
स्वरूप की प्राप्ति होती है । ज्ञान के लिये यह शर्त है कि वह प्रमाणित हो।
सामान्यतः प्रामाणिक ज्ञान तीन प्रकार का होता है - प्रत्यक्ष,
अनुमान और शब्द ।
इन्द्रियों से जो ज्ञान होता है वह प्रत्यक्ष ज्ञान कहलाता है । ज्ञान का
दूसरा साधन अनुमान है - जैसे धुयें को देखकर अग्नि का अनुमान लगाना ।अपने
स्वरूप का ज्ञान न प्रत्यक्ष से होता है और न अनुमान से । इसके लिये शास्त्र
आगे आते हैं । उन्हें शब्द प्रमाण कहते हैं ।
शास्त्रों को इसी अर्थ में
अपौरुषेय कहा जाता है । उनसे हमें वह ज्ञान प्राप्त होता है जिसे मनुष्य अपनी
भौतिक शक्तियों से नहीं जान पाता । मानवीं पहुँच के बाहर का ज्ञान शास्त्रों
से ही प्राप्त होना संभव है । यदि शास्त्रों को अप्रमाणिक मानकर उपेक्षित कर
दिया जाय तो हम उस अलौकिक ज्ञान से वंचित रह जायेंगे जिसकी खोज विज्ञान भी
कभी नहीं कर सकता । जैसे प्रेम व सहानुभूति जैसे भावों का कोई विज्ञान नहीं
होता,
वैसे ही धर्म का भी विज्ञान
नहीं होता । अपने यथार्थ स्वरूप का ज्ञान धर्म करा सकता है,
विज्ञान नहीं । धर्म का
निरूपण शास्त्रों में किया गया है,
इसलिये शास्त्रों की
महत्ता निर्विवाद सिद्ध है।
कैवल्य
उपनिषद् व्याख्या से उद्धृत
**********
|