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लेख

अवस्थात्रय विवेक

(स्वामी शंकरानन्द)

           जीव की तीन अवस्थायें हैं - जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति । जब शरीर में स्थित होकर इंद्रियों से बाह्य जगत का ज्ञान हो तो वह जाग्रदावस्था है । जब इंद्रियाँ मन में लय हो जाती हैं और मन में विषयों का ज्ञान होता है तो उसे स्वप्नावस्था कहते हैं । मन के भी लीन होने पर जब विषयों का ज्ञान नहीं होता तो वह सुषुप्ति अवस्था है । 

      पहले जाग्रत अवस्था में हो रहे ज्ञान का विचार करें । इस समय श्रोत्र, त्वक, नेत्र, जिझ और नासिका से क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध पाँच विषयों का ज्ञान होता है । जगत की समस्त वस्तुओं का ज्ञान इन्हीं पाँच रूपों में होता है । विषयों के पाँच रूप होने के कारण ज्ञान भी पाँच प्रकार का होता है - जैसे शब्द ज्ञान, स्पर्श ज्ञान आदि । इसमें ध्यान देने योग्य बात यह है कि शुद्ध ज्ञान सदैव एक ही है । वही एक ज्ञान शब्द ग्रहण करने पर शब्द ज्ञान है और स्पर्श ग्रहण करने पर स्पर्श ज्ञान है । हम अपने अनुभव से जानते हैं कि हमारे एक ज्ञान में ही शब्द आदि विषय एक के बाद एक आते रहते हैं । विषय बदलते रहते हैं, किन्तु उनको ग्रहण करने वाला एक ही रहता है । विषय के बदलने के साथ ज्ञान नहीं बदलता । जैसे एक किलो बॉट से एक किलो गेहूँ तौलने के बाद एक किलो चीनी और फिर एक किलो दाल तौलते हैं, तो तौली हुई वस्तु बदलती जाती है किन्तु एक किलो का बॉट वही रहता है । इसी प्रकार एक ही ज्ञान से सब विषय जाने जाते हैं । विषयों के बदलने पर ज्ञान नहीं बदलता ।

      विषयों की अनेकता देखकर हम कह सकते हैं कि विषय विभक्त हैं, उनमें भेद है, किन्तु ज्ञान अविभक्त है उसमें भेद नहीं है । नाना रूप विषय ज्ञान की उपाधि हैं, जैसे घर, मठ, घट आदि आकाश की उपाधि हैं । एक अविभक्त आकाश घट की उपाधि से घटाकाश और मठ की उपाधि से मठाकाश कहलाता है । इसी प्रकार एक ही अविभक्त ज्ञान शब्द की उपाधि से शब्द ज्ञान और रूप की उपाधि से रूप ज्ञान समझा जाता है । तात्पर्य यह है कि जाग्रत अवस्था में विषयों का अनुभव करते समय विषयों की अनेकता, परिवर्तनशीलता और उनके गतागत स्वभाव को पहचान कर ज्ञान की एकता, अपरिवर्तनशीलता और नित्यता को समझने का प्रयास करना चाहिये । इसी ज्ञान की डोर को पकड़कर ही हम आगे आत्म ज्ञान की ओर अग्रसित हो सकते हैं । इस ज्ञान के शुद्ध स्वरूप का ज्ञान ही आत्मज्ञान है ।

      स्वप्नावस्था में भी विषयों की अनेकता और ज्ञान की एकता उसी प्रकार है जैसे जाग्रत अवस्था में । स्वप्न में भी जाग्रत के समान शब्द, स्पर्श आदि विषयों का ज्ञान होता है । विषयों की उपाधि से वह  नाना प्रकार का भासित होने पर भी ज्ञान तत्वतः एक ही है । प्रत्येक विषय के साथ ज्ञान परिवर्तित या विक्रत नहीं होता ।

      यदि जाग्रत व स्वप्न दोनों अवस्थाओं में विषयों की भिन्नता तथा ज्ञान की एकता है, तो फिर दोनों में अन्तर क्या है? अन्तर यह है कि जाग्रत अवस्था के विषय स्थिर हैं और स्वप्न के नहीं। सोकर उठने पर हम नित्य अपना वही कमरा, वही मेज और वही कुर्सी पाते हैं जो हमने सोने से पहले छोड़ी थी। इनमें स्थिरता दिखाई देती है । ऐसी स्थिरता स्वप्न की वस्तुओं में नहीं है । हर बार स्वप्न में अलग-अलग वस्तुयें दिखाई देती हैं । आज हमने स्वप्न में जो वस्तु जिस रूप में देखी है वह वैसी ही कल भी दिखाई देगी यह निश्चित नहीं है । इसके अतिरिक्त स्वप्न की वस्तुयें देखते-देखते गायब हो जाती हैं और नई-नई प्रकट भी होती रहती हैं । तात्पर्य यह है कि स्वप्नावस्था के विषय जाग्रत की अपेक्षा अस्थिर और क्षणिक होते हैं । यही दोनों अवस्थाओं के अनुभव का अन्तर है ।

      स्वप्न की वस्तुओं का अस्थिर स्वभाव देखकर ही हम स्वप्न को मिथ्यता कहते हैं । जाग्रत की वस्तुयें उसकी अपेक्षा अधिक स्थिर हैं, इसलिये उन्हें हम सत्य समझते हैं । अब प्रश्न उठता है कि क्या विषय वस्तुओं की भिन्नता के कारण दोनों अवस्थाओं का ज्ञान भी एक-दूसरे से भिन्न है? क्या स्वप्न का ज्ञान दूसरा है और जाग्रत का ज्ञान दूसरा है? क्या स्वप्न का ज्ञान भी स्वप्न की वस्तुओं के समान अस्थिर और नश्वर है? यद्यपि स्वप्न के विषय भिन्न-भिन्न प्रकार के और अस्थिर हैं, तो भी उनका ज्ञान एकरूप और स्थिर है । स्वप्न मिथ्या समझा जाता है, किन्तु स्वप्न का ज्ञान मिथ्या नहीं होता । एक ही ज्ञान से हम स्वप्न व जाग्रत की पृथक अवस्थाओं का अनुभव करते हैं । जो जाग्रत का दृष्टा है वही स्वप्न का भी दृष्टा है । अपने एक ही ज्ञान से हम दोनों अवस्थाओं को आते-जाते देखते हैं । इसलिये ज्ञान की एकता जाग्रत से स्वप्न तक एक समान है।

      स्मृति ज्ञान का साक्षात् साधन नहीं है । वह किसी प्रमाण से प्राप्त पूर्व ज्ञान की पुनरावृत्ति है। पहले कभी देखी हुई वस्तु यदि कालान्तर में पुनः बुद्धि में आती है तो उसे 'स्मृति' कहते हैं । स्मृति ज्ञान यह सिद्ध करता है कि हमने वह ज्ञान पहले कभी प्राप्त किया था ।

      सोकर जागने पर हमें स्मृति होती है कि अभी कुछ देर पहले इतनी नींद में सोते रहे कि कुछ भी पता न चला । सोते समय कुछ भी न जान पाने की स्मृति यह सिद्ध करती है कि कुछ काल पहले यही हमारा अनुभवजन्य ज्ञान था । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सुषुप्ति में कुछ न ज्ञात होने का ज्ञान रहता है। सुषुप्ति में ज्ञान का अभाव नहीं होता बल्कि ज्ञान के विषय का अभाव होता है । जैसे  जाग्रत अवस्था में ज्ञान के विषय स्थिर होते हैं, स्वप्नावस्था में ज्ञान के विषय अस्थिर होते हैं वैसे ही सुषुप्ति में ज्ञान का विषय 'कुछ भी भासित न होना' होता है। कहने का तात्पर्य है कि विषय के अभाव का ज्ञान ही सुषुप्ति का ज्ञान है । ज्ञान सुषुप्ति में भी है किन्तु वह विषय के अभाव को प्रकाशित करता है । यह ज्ञान जाग्रत और स्वप्न अवस्थाओं के ज्ञान से पृथक नहीं है । ज्ञान तीनों अवस्थाओं में एक ही है ।

      विषय भेद से हमारी तीन अवस्थायें हैं । जब हमें स्थिर विषयों का ज्ञान होता है तो वह जाग्रत अवस्था है । जब अस्थिर विषयों का ज्ञान होता है तो वह स्वप्नावस्था है । जब स्थिर-अस्थिर किसी भी विषय का बोध नहीं होता तो वह सुषुप्ति अवस्था है । इन तीनों की जानकारी ज्ञान में ही होती है । इससे सिद्ध होता है कि एक ही ज्ञान तीनों अवस्थाओं में विद्यमान रहता है । उसमें भेद और पृथकता कभी नहीं होती । वह निरन्तर, शाश्वत और नित्य है ।

      तीनों अवस्थाओं में शुद्ध ज्ञान सतत बना रहता है । इस शुद्ध ज्ञान की निरन्तरता पहचाननी चाहिये। इसका न तो अभाव होता है और न ही यह बदलता है । ज्ञान के एक होने और उसके अपरिवर्तनीय होने का बोध उसी ज्ञान से होता है । ज्ञान एक प्रकार का दिव्य प्रकाश है । जैसे सूर्य का प्रकाश स्वयं अपने को प्रकाशित करता है, उसे प्रकाशित करने के लिये दीपक आदि किसी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही ज्ञान स्वयं अपने को प्रकाशित करता है । उसे प्रकाशित करने के लिये किसी अन्य ज्ञान की आवश्यकता नहीं है । यह ज्ञान स्वयं प्रकाशरूप है ।

श्री पञ्चदशी व्याख्या से उद्धृत 

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