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विषयों में अनुराग रखने
वाला पुरुष ही बन्धन में
होता
है। विषय पांच हैं - शब्द,
स्पर्श,
रूप,
रस और गंध। ये पाँच
महाभूतों की तन्मात्रायें हैं आकाश,
वायु,
अग्नि,
जल और पृथ्वी पाँच
महाभूत हैं।
शब्दादि इसकी तन्मात्रायें ही हमारी इन्द्रियों के लिए विषय हैं।
स्वभावतः ये विषय सुखदायी लगते हैं और इनमें हमारा राग-द्वेष होता है। अनुकूल
होने पर विषय सुखदायी लगते हैं और उनमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति के कारण
हम विषयों के अधीन हो जाते हैं,
उनके बिना हम अपना जीवन
निरर्थक समझने लगते हैं और विषय हमें अपने बन्धन में बाँध लेते हैं।
बार-बार विषयों का सुख लेते
रहने पर चित्त में उनका संस्कार निर्मित होता है। संस्कार दृढ होकर वासना का
रूप धारण कर लेता है। वासना के कारण मनुष्य की विषय-सुख की इच्छा बार-बार
होती है। वह उन्हें प्राप्त करने और भोगने का प्रयास करता है। आसक्ति युक्त
भोग से वासना बार-बार दृढ होती रहती है। जीवन के अन्त तक वह बहुत बढ जाती है।
वासनाओं की तृप्ति के लिए जीव को बार-बार शरीर धारण करना पडता है। यह जीव के
लिए विवशता है। इसे बंधन कहते हैं।
इस प्रकार जीव विषयासक्ति के
बंधन में पड़कर पुनर्जन्म के दुःख भोगता है। किसी पुण्यकर्म के कारण सत्संग
प्राप्त होता है तो जीव को अपनी समस्या का बोध होता है। वह अपने बंधन से
छूटना चाहता है। उसके लिए वह परमात्मा का सहारा लेता है। निरन्तर प्रयासरत
रहने पर जीव मुक्त हो सकता है।
यदि विषयों में अनुराग नहीं रह
जाता,
मनुष्य विरक्त हो जाता है तो वह
मुक्त ही है। विषयों में राग न रहना ही वैराग्य या विरक्ति है।
विषयों का राग या आसक्ति स्वतः
समाप्त नहीं हो जाती। वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ शिथिल और दुर्बल हो जाने पर
अनासक्त हो जाने का भ्रम होता है। वस्तुतः वासनायें बडी सूक्ष्म और गहन होती
हैं। वे वृद्धावस्था में सूक्ष्मस्प से बीज के समान चित्तभूमि में पडी रहती
हैं। मरने के बाद जब अगला शरीर मिलता है,
तो इन्द्रियाँ फिर सशक्त
होने लगती हैं और पूर्व जन्म की वासनाऍ अंकुरित होकर जीव को पुनः भोगों में
प्रवृत्त कर देती है। इस प्रकार जीव का बंधन जन्म-जन्मान्तर चलता है वह स्वतः
कभी मुक्त नहीं होता।
मुक्त होने के लिए जीव को
प्रयास करना होता है। उसके लिए एक सुनिश्चित क्रमबद्ध रास्ता है। उस पर धैर्य
के साथ आगे बढते रहने से अन्त में आत्मा और परमात्मा का ज्ञान होता है। उसे
अनुभव हो जाता है । फिर वह विषयों का सुख झूठा समझकर त्याग देता है। विषयों
का यह वैराग्य ही मुक्ति का लक्षण है।
(मणिरत्नमाला से)
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