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ध्यान विधि

( परम पूज्य स्वामी तेजोमयानन्द जी )

 

 

 

     लोग प्राय: ध्यान की विभिन्न विधियाँ जानना चाहते है । वे पूछते हैं,  " हमें किस आसन पर बैठना चाहिए, किस दिशा में मुँह करके बैठे ? "  किन्तु जब वे ध्यान करने बैठते हैं  तो भुला देते हैं । गीता में भगवान कहते हैं -

योगी युञ्जीत सततं आत्मानं रहसि स्थित:

 

"  साधक को शान्त एकान्त स्थान में सतत ध्यान करना चाहिए । "  हमारे मन को विषयों की ओर भागने का दीर्घकालीन स्वभाव है । जन संकुल स्थान में शोरगुल के बीच अपने मन को इधर-उधर भागने से बचाना कठिन ही नहीं वरन् एक प्रकार से असंभव है । आवश्यक लौकिक कार्य तभी हो सकते हैं जब हम एकान्त में हों । ध्यान से कार्य करते समय हम अपने बच्चों को भी डाँटते और भगा देते हैं । सायकिल की सवारी सीखते समय भी हम सुनसान खुली जगह तलाशते हैं । सायकिल चलाने का अभ्यास हो जाने पर हम भीड़-भरी सड़क पर भी दौड़ सकते है । सायकिल का चलाना इसलिए सीखा भी जाता है कि हम उसे सड़क पर चला सकें । मैदान में सायकिल चलाते रहना व्यर्थ है । इसी प्रकार, साधक को ध्यान करने के लिए प्रारम्भ में एकान्त स्थान और उपयुक्त समय चुनना चाहिए । बाद में वह घने जंगल या भीड़ भरे रेलवे स्टेशन पर भी ध्यान कर सकता है ।

ध्यान के लिए उपयुक्त स्थान और समय साधक को स्वंय चुनना होगा ।  "  शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य " शुद्ध पवित्र स्थान में बैठ कर ध्यान करना चाहिए । वहाँ दुर्गन्ध न हो, मच्छरमक्खी, चींटी आदि न हों । उनके कारण मन में विक्षेप न होने पाये । स्थान की सुन्दरता से मन प्रसन्न और शान्त रहें । इसलिए ऋषि लोग नदियों के तट पर ध्यान करना पसन्द करते थे ।

" आसन चैलाजिनकुशोत्तरम् "  आसन ऐसा हो जिसमे पहले कुशासन बिछाकर उसके ऊपर मृगचर्म और वस्त्र बिछाया गया हो । यदि कोई इसके लिए हिरन को मारने निकलेगा तो सरकार उस पर कानूनी कार्यवाही करेगी । कुश घास का प्रयोग सीढ़न से बचने के लिए किया जाता था, मृगचर्म कीड़ों को रेंग कर ऊपर नहीं चढ़ने देता था, कोमल वस्त्र से मृगचर्म से होने वाली खुजली से बचा जा सकता था । आजकल एक तह किए हुए कंबल पर कोमल वस्त्र बिछाकर अपना प्रयोजन पूरा किया जा सकता है ।

"  समं काय शिरोग्रीवं " साधक को आसन पर बैठकर अपना शरीर,गर्दन और सिर एक सीध में लम्बवत रखना चाहिए । अपने हाथों को घुटनों पर तनावरहित अवस्था में रखना होगा ।

दिशश्चानवलोकयन् संप्रेक्ष्य नासिकाग्रंस्वम् ।

"   दृष्टि इधर-उधर न घूमने देकर सरलता से सामने की ओर रखें मानो नासिका के अग्रभाग पर देख रहा हो । "   यदि कोई नासिका के अग्रभाग पर जोर लगाकर देखेगा तो उसकी आँखे टेड़ी हो सकती हैं या सिर में दर्द होने लगेगा । इसलिए नासिका पर ध्यान करने का कोई प्रयोजन नहीं है । प्रारम्भ में, शरीर सीधा रखकर एक आसन पर पाँच मिनट बैठना प्रारम्भ करें और फिर धीरे-धीरे समय बढ़ाकर पैंतालीस मिनट कर दें तो आसन सिद्ध हो जाता है । इस अवस्था में मन शरीर से सुखपूर्वक हटाया जा सकता है । शरीर की व्यवस्था कर लेने पर अपने प्राण पर ध्यान देना चाहिए । अपने नासिका -छिद्रों से आती-जाती श्वांस का मानसिक निरीक्षण बड़े सहज भाव से करना चाहिए । इससे मन शान्त हो जाता है ।

इसके बाद श्रोत्र, त्वक्, नेत्र, रसना और श्रवण इन पाँच इन्द्रियों को नियंत्रित रखना अपेक्षाकृत सरल हो जाता है । इनमें भी नेत्र, त्वक् और जिह्वा का नियंत्रण तो स्वत: हो जाता है । आँखे बंद कर लो तो रुप-रंग नहीं दिखाई देगा । ध्यान करते समय मुँह में मसाला या कम्पट न डाले । शुद्ध स्थान में अकेले बैठे होने पर त्वचा में भी कोई स्पर्श न होगा । किन्तु कान और नाक बन्द नहीं किए जा सकते । इसलिए उनसे विक्षेप हो सकता हो सकता है । लक्ष्मणजी ने जैसे सूर्पनखा के नाक-कान काट लिये थ, वैसे हम तो नहीं  कर सकते । हम केवल इतना कर सकते हैं कि इनके द्वारा आने वाला विषयों को हम अपने मन से ग्रहण न करें । यदि शब्द सुनाई दे तो उसे नाम देना, उसका अर्थ लगाना,  शब्द  उत्पत्ति स्थान से उसे जोड़ना या उस पर प्रतिक्रिया करना उचित नहीं है ।  "  कौआ बोल रहा है । उसकी आवाज इतनी तेज क्यों  है ? शायद वह रसोई में घुस गया है । वहाँ उसे रोटी मिल गयी है । इसलिए वह इतना प्रसन्न होकर बोल रहा है । " किसी व्यक्ति को यह भी नहीं बताना चाहिए कि मैं कल सवेरे 5 बजे ध्यान करुँगा । वह सवेरे 5 बजे ही आपको फोन करेगा और पूछेगा, " क्या आप ध्यान कर रहें हैं या सो ही रहे हैं ?  "

ध्यान की एक अनुपम विधि यह है कि जब यह-वह कुछ करने को कहा भी जाता है तो व्यक्ति धीरे से निष्क्रिय अवस्था में पहुँचा जाता है । प्राचीन काल के ऋषि बड़े चतुर थे । वे मनुष्य के मन की प्रकृती को भली-भाँति जानते थे । हमारा मन कुछ न कुछ करने में सदा लगा रहता है । हमारा ऐसा स्वभाव बन गया है कि हम शरीर के कार्यों में व्यस्त रहते हैं और मन से कुछ सोचते रहते हैं । कहा जाता है कि खाली मन शैतान का घर है । यदि कुछ न करने को कहा जाये तो बात समझ में नहीं आती ।  पूछा जाता है कि, " हम कुछ नहीं कैसे करें । " इसलिए हमसे कुछ न कुछ करने को कहा जाता है । किन्तु यह करना वस्तुत:  कुछ करने जैसा नहीं है । जब किसी आसन पर बैठने को कहा जाता है तो अन्य सब क्रियायें बन्द हो जाती हैं । आँखे बन्द करने को कहा जाय तो देखना और आँखो को इधर-उधर घुमाना बन्द हो जाता है । उसके बाद हम अपने मन पर ध्यान देते हैं । अभी यह बड़ा चंचल, दृढ़ और प्रबल है ।

यदि मैं अपने कमरे में बैठा हूँ तो मुझे बाहर जाने के दो कारण हो सकते है ( अ) एक तो कोई मुझे बाहर से बुलाये और (ब) दूसरे यदि हम उकता गये हैं और बाहर से कुछ प्राप्त करना चाहते हैं । इसी प्रकार यदि हम देखें कि हमारा मन बाहर क्यों जाता है तो उसके दो ही कारण मिलते हैं (1) इन्द्रियों को बाहर से विषय प्राप्त होते हैं और मन उस ओर ऐसे चल देता है जैसे बाहर से कोई बुला रहा है । ध्यान के समय इन्द्रियाँ संयमित रहती है, इसलिए उनके कारण अधिक विक्षेप नहीं होता । (2) मन में इच्छा, कामना, पूर्वकाल की स्मृतियाँ, चिन्तायें, भय, अपने अपमानित होने का तनाव आदि उमड़ते रहते हैं । कुछ लोग सोचते हैं -  " मैंने पिछले शनिवार को जो चित्र देखा था वह बहुत अच्छा था । इसमें पात्रों की एक्टिंग बढ़िया थी और संगीत मनोहारी था, इसे हम फिर देखेंगे, अगले शनिवार को । "   दूसरे लोगों के मन में विचार आता है,      " ध्यान करते मैं समाधि में चला जाऊँगा । फिर सब लोग मेरी पूजा करेंगे । वे मुझे महात्मा कहेंगे । " क्या ऐसा विचार लाकर कोई समाधि में जा सकता है । गीता में भगवान कहते हैं -

संकल्प प्रभावन्कामांन् त्यक्त्वा सर्वान् अशेषत:

मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्तत:

शनै:  शनैरुपरमाद् बुद्धया धृति गृहीतया ।

"   इन्द्रियों को मन से नियंत्रित करें ओर मन की कामनाओं आदि को मन में न आने दें । " दृढ़ संकल्प करें कि अभी कुछ देर के लिए मुझे संसार से कोई काम नहीं है । इस प्रकार मन शान्त और असंग होकर ध्यान के लिए तैयार हो जाता है । " मैं सभी विचारों का साक्षी हूँ    " - ऐसी एकाग्रता आने पर आत्मभाव प्राप्त हो जाता है । साधक पूछेगा, " मुझे इसके बाद क्या करना होगा ?  "

आत्मसंस्थं मन: कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ।

मन आत्मस्थित होने पर अन्य कोई विचार न करें ।

यदि कोई पूछे, " मैं कैसे सोऊँ ?  "   तो उससे कहा जायेगा, " तुम शयन कक्ष में जाओ अपना बिस्तर ठीक करों, उस पर लेटो और सो जाओ ।   "   वह पूछेगा, " सोने के बाद मैं क्या करुँ ?  " उससे कहेंगें, " सोते  रहों"  ऐसा प्रश्न तभी पूछा जा सकता है जब वह जाग रहा हो । सोने के बाद प्रश्न पूछने वाला ही नहीं रह जाता ।

ध्यान करने वाले की मानसिक दशा भी ज्ञात होनी चाहिए । (अ) प्रशान्तात्मा -उसका चित्त शान्त और सुस्थिर रहे । (ब) विगतभी:  भय रहित , यदि किसी के मन में यह भय बना रहा, " मेरा क्या होगा, मेरे पुत्र -कलत्र का क्या होगा, मेरे व्यापार का क्या होगा, यदि मैं समाधि में चला गया और फिर उठा नहीं , तो सब राग बिगड़ जायेगा,  "  ऐसा विचार रखने वाला व्यक्ति ध्यान नहीं कर सकता । (स) ब्रह्मचारिव्रते स्थित: - ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित रहें । सामान्य रुप से  ब्रह्मचर्य का अर्थ अविवाहित जीवन माना जाता है , किन्तु यहाँ इसका अर्थ है- "   ब्रह्मणि चरितुं इच्छति " जो सत्य को जानना चाहता है वह ब्रह्मचारी है । यह बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है कि ध्यान करते समय आप अपने को क्या समझते हैं । यदि आप अपने को पति समझते हैं तो आप अपनी पत्नी का ध्यान करेंगे, यदि व्यापारी समझते हैं तो व्यापार का स्मरण करेंगे । जब मैं कैलीफोर्निया में था तो मुझे अपना भोजन स्वंय बनाना पड़ता था । ध्यान के समय भी मैं बैठे हुए यही सोचता था कि आज क्या भोजन बनाना है ?  अन्त में, मैंने निश्चय किया कि मेरे सामने जो कुछ आयेगा वही खा लूँगा, तो भोजन पकाने के सारे विचार समाप्त हो गये । उसके बाद मैं शान्ति के साथ ध्यान करने लगा । वस्तुत:  उस समय विचार करने वाला कोई नहीं रह जाता ।

 

 

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  यह लेख चिन्मय मिशन की हिन्दी मासिक पत्रिका "चिन्मय चन्द्रिका" के माह  अक्टूबर  2003  के अंक में प्रकाशित हुआ था। पत्रिका  डाक द्वारा मंगवाने

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