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हमारे धर्मशास्त्रों में मनुष्य
के पवित्र्तम कर्त्तव्य के रुप में ध्यान योग की महिमा गाई गयी है। केवल
मनुष्य ही ये महान प्रयास करने में समर्थ हो सकता है, जिसके द्वारा वह अपने
आत्मविकास में तेजी ला सकता है औक मानव को संकुचित करने वाले मन व बुद्धि की
सीमा से ऊपर उठ सकता है। ज्यों ही एक बार हम अपनी सीमाओं को पार करने में
समर्थ होंगे, त्यों ही उस पूर्णता के क्षेत्र में प्रवेश करेंगे जिसे डार्विन
ने महा-मानव की स्थिति कह कर निरुपित किया है।
परन्तु जब हमें ध्यान करने की
सलाह दी जाती है, तब हम उस सलाह मात्र से लाभान्वित नहीं हो पायेंगे क्योंकि
यह हमारी पीढ़ी का स्वभाव बन गया है कि जब तक कोई बात तर्क पर आधारित न हो तब
तक हम उसे नहीं मानते। पुनश्च, जब तक हम यह न जानें कि ध्यान क्या है तब तक
हम ध्यान कैसे कर सकते है। अत:, ध्यान शब्द की शास्त्रीय मीमांसा समझ पाने के
लिए सुविस्तृत व्याख्या की आवश्यकता है।
यह निर्विवाद सत्य है कि हममें से कोई भी एक क्षण के लिए
भी स्थिर मन से नहीं बैठ सकता। हमारा मन और हमारी बूद्धि अवश्य ही सदैव अपने
विचार - समूहों में विचरण करते रहेंगे। अब प्रश्न यह उठता है कि किस प्रकार
हम विचारों के उद्गम और उनके प्रवाहों का नियन्त्रण व नियमन कर सकते है? हम
लोग अपने आपको पूर्ण समून्नत मनुष्य तभी कह सकते है, जब हम अपने अन्तर में
उठने वाले विचारों की जन्मदर पर दृढ़तापूर्वक काबू पा सकें और उनके प्रवाह को
भी नियन्त्रित कर सकें एवं सही दिशा दे सकें। पशुओं में भी उनका मन और उनकी
बूद्धि
होती है,
भले ही वह पूर्ण विकसित न हो। जिस कारण मनुष्य पशुओं से भिन्न तथा उनसे
श्रेष्ठ है, वह यह है कि मनुष्य अपने सजग प्रयासों के माध्यम से मन और बुद्धि
दोनों के समन्वित एवं विकसित कर सकता है। तत्पश्चात, एक दूसरे का नियमन करते
हुये मन और बूद्धि एक ऐसे पूर्ण विकसित एवं शक्तिशाली व्यक्तित्व का निर्माण
करते हैं जिनका मन सदैव बुद्धि के नियन्त्रण में रहता है। इस प्रकार के
स्वस्थ उपकरण का विकास ही आध्यात्मिकता का प्रारम्भ है।
हमारा मन सदा एक विषय से दूसरे
विषय की ओर भागता रहता है। विचारों का यह प्रयास अनवरत चलता रहता है। यह
स्पष्ट है कि किसी एक विषय पर मन केन्द्रित कर सकने के पूर्व उस मन का
अनुशासित होना आवश्यक है। ध्यानाभ्यास में मन को समस्त इन्द्रिय विषयों से
हटा लिया जाता है। मन पर अंकुश रखने वाली बुद्धि उसे आदेश हाती है कि वह अपने
समस्त विचारों का समाप्त कर केवल सर्वव्यापी चेतना के बारे में सोचे। कठिन
साधना के बाद मन एक समय पर एक ही विषय का चिंतन करने योग्य बन जाता है। ऐसा
मन अवश्य ही शक्ति पुंच बन जायेगा। इतना ही नहीं वह अज्ञेय भी होगा। अपने
वास्तविक स्वरुप को पहचान लेने के पश्चात ऐसा मन संसार के अस्थिर दुखों एवं
क्षणिक सुखों से विक्षुब्ध न होगा। न सम्पन्नता उसे बिगाड़ सकती है और न ही
विपत्ति सपो गिरा सकती है। जिस प्रकार पदार्थ और ऊर्जा की अनश्वरता संबंधी
वैज्ञानिक खोज तन्निर्मित वस्तुओं को नवीन अर्थ प्रदान करती है, उसी प्रकार
मन - बुद्धि के द्वारा
ध्यानावस्था में प्राप्त सत्
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चित् - आनन्द का
साक्षात्कार जीवन को एक नई दिशा प्रदान करती है जिससे दुनिया के चंचल दृश्य
मायावी आकर्षण से रहित होकर अपने नग्न रुप में प्रकट होते है। नित्य
ध्यानाभ्यास के द्वारा शुद्ध चेतना में प्रतिष्ठित मन की अन्तर्भेदी दृष्टि
के सामने से सारे आवरण हट जाते है। सभी जटिलताओं से मुक्त होकर यह मन अब कभी
भी संशय और भय से ग्रस्त न होगा।
(ध्यान और जीवन से)
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