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सच्चा
गुरु अपनी कृपा का प्रसाद भक्तों में कम-ज्यादा नहीं बांटा
करता । सच पूछा जाये तो गुरु की कृपा गुरु द्वारा
देने की नहीं वरन् शिष्य द्वारा पाने या लेने की पात्रता
पर निर्भर करती है । जो सिद्ध पुरुष होता है, आत्मभाव में
डूबा हुआ वह तो सर्वत्र और सर्वदा
आनन्द और कृपा की वर्षा करता रहता है । अब यह लेने वाले
पात्र पर निर्भर करता है कि उसने कितना समेटा । जो जितने
का अधिकारी होता है उसको उतना ही मिलता है ।
सागर कहाँ रोक सकता है कि मुझसे इतना
पानी ले जाओ । रोक उसके ओर से नहीं है। यह आपके पात्र की
सिमा है। उसमे कितना पानी आता है। सूर्य अपना प्रकाश जब
विखेरता है तो कहाँ कोई कैद लगाता है कि यहाँ इतना प्रकाश
जाये और वहाँ इतना। वहाँ तो दीवारें रुकावट बनकर आती हैं
और प्रकाश को कक्ष विशेष में प्रविष्ट होने से रोक देती
हैं। इसी प्रकार सरिताएँ अजस्त्र बहती रहती हैं। अब यह आप
पर निर्भर करता है कि अपने खेतों में पानी ले जाने के लिए
आप ने कैसी नहरें काटी हैं।
इसी प्रकार गुरु तो ज्ञान के समुद्र
हैं। वे अपना अनुभुत ज्ञान भाषा के माध्यम से देते हैं।
साधक अपने अधिकार, अपनी पात्रता के अनुकूल उस ज्ञान का लाभ
प्राप्त करता है।
इसका तात्पर्य़ यह हुआ कि जब साधक ने
अपने आप में विवेक, वैराग्य और
षट् सम्पत्ति को विकसित कर
लिया हो तो उसमे मुमुक्षुत्व स्वयमेव तीव्रतर होता जायेगा।
और जो इन चारों
से सम्पन्न हो गया उसे गुरु का अधिकाधिक लाभ मिलेगा। जिस
अनुपात में वह साधन-चतुष्टय सम्पन्न होगा उसी अनुपात में
वह गुरु के उपदेशों को आत्मसात् कर पायेगा। ज्ञान के
अधिकारी शिष्य को गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के लिए उसकी
सेवा में उपस्थित होना चाहिये। गुरु की सेवा न तो
"गुलामी"
और न तो शिष्य के मन में उठने वाले असन्तोष का दर्द है।
यहाँ तो शिष्य गुरु के प्रति श्रद्धा और प्रेम भाव के कारण
अपने को, अपने अहं को भूल जाता है और हर समय तरीके से हर
क्षण गुरु-सेवा करने को तत्पर रहता है। इस सेवा के कारण ही
वह गुरु के उदात्त गुणों और गौरव को निरन्तर याद रखता है।
यह जो उसके मन में गुरु के रुप में अपने इष्ट का सतत्
ध्यान बना रहता है वही उस शिष्य को क्रमश:
ऊपर उठाता है, जिसे विकसित होने में सामान्यत:
बरसों लग जाते हैं।
ब्रह्मनिष्ठ गुरु के अगणित लक्षण
गिनाये जाते है जिनपर ध्यान देने से यह स्पष्ट होता है कि
हर जीवनन्मुक्त और ज्ञानी पुरुष आध्यात्मिक गुरु बनने की
पात्रता नहीं रखता। गुरु का पद ग्रहण करने पर उसे शिष्य को
ऐसे निर्देश देने होते है जिनसे वो अपना मोह दूर कर सके और
अपनी ह्रदय-ग्रन्थि का उच्छेदन कर सके। विचारों के
सम्प्रेषण की कला हरेक को नहीं आती। इसलिये आत्मनुभूति के
अतिरिक्त उसे श्रुतियों का सम्यक् ज्ञान होना चाहिए।
ब्रह्मनिष्ठ और श्रोत्रिय होने के
अतिरिक्त गुरु को आत्मसंयमी और उदारचेता भी होना चाहीए।
फिर उसमें अपार करुणा होनी चाहिए जिसे वह अपने शरणागतों पर
बरसाता रहे। दया की इस वर्षा के लिए कोई कारण उपस्थित हो
यह बिल्कुल आवश्यक नहीं है।
जिसको सत्य की अनुभूति हो जाती है वह
सम्पूर्ण विश्व को प्यार करने लगता है। जैसे बसन्त ऋतु
अपने आगमन मात्र से सहज ही पुष्पों को विकसित कर देता है,
उसी प्रकार से सन्त भी बिना किसी हेतु के सबको प्यार करने
लगते हैं। बात ये है कि जिसने यह अनुभव कर लिया कि उसकी
आत्मा सर्वव्यापी परमात्मा से भिन्न नहीं है, बल्कि अभिन्न
और अद्वितीय है, उसे अपने चारों ओर उस सर्वात्मा को
पहचानने में देर नहीं लगती।
जब उसने एक बार इस अभिन्नता का,
एकात्मभाव का अनुभव कर लिया तो वह सबको उसी भाव से प्यार
किये बिना नहीं रह सकता, जिस भाव से स्वयं को चाहता है। यह
सार्वजनीन प्रेम उसके लिए एकदम सहज हो जाता है। किसी
प्रकार की औपचारिकता का अथवा दिखावे का प्रश्न नहीं है। एक
दृष्टान्त द्वारा इस बात को और स्पष्ट कर सकते हैं। ऐसा
कभी नहीं हो सकता कि आप अपने ही शरीर के किसी एक अवयव के
प्रति स्थायी घृणा-भाव बनाये रख सकें। आपका हाथ या पैर कभी
आपको किसी प्रकार का कष्ट पहुँचाये भी तब भी आपका आक्रोश
उसी क्षण दूर हो जाता है जिस क्षण आप महसूस करते है की वह
अवयव आपका अपना ही तो है। मान लीजिए आपके दाहिने हाथ की
अंगुली धोखे से आपकी दाहिने आँख में जा लगती है और दर्द के
कारण आपको क्षोभ होता है, पर तत्क्षण ही यह महसुस करने के
साथ कि दोषी अंगुली आपकी है आप उसे दण्डित नहीं करते। अपने
दोनों अवयवों को समझा लेते है, शान्त कर लेते है। यह ठीक
भी है क्योंकि यदि आप अंगुली को दण्डित करते है तो पुन:
अपने को ही तो दर्द होगा। ठीक इसी
प्रकार जब कोई यह अनुभव कर लेता है कि उसमें निहित सत्य ही
सम्पूर्ण विश्व का सत्य है, उसकी आत्मा ही परमात्मा है, जो
सबमें व्याप्त है, तो यह स्वाभाविक ही है कि उसके ह्रदय
में सम्पूर्ण विश्व के लिए करुणा और प्रेम की धारा
प्रवाहीत होने लगे।
ज्यों ही सत्य वस्तु की अनुभूति होती
है मनुष्य अपने को मुक्त अनुभव करता है।
मन-बुद्धि-इन्द्रियों के साथ तादात्म्य होने के कारण जो
बन्धन अब तक प्रतीत होता था, वह समाप्त हो जाता है। फिर
तो, किसी भी परिस्थिति में ऐसा जीवन्मुक्त विचलित नहीं
होता। इसी लिए यह कह सकते है की सन्त वस्तुत:
उदारचेता होता है। करुणा, दया,
तितिक्षा आदि से युक्त।
यह कहना भ्रामक होगा की आत्म साक्षात्कार पाने के बाद कोई
महापुरुष संसार का परित्याग कर हिमालय की अंधेरी गुफाओं
में अपने जीवन के शेष दिन काटने जायेगा। वह गुफावासी हो भी
सकता है और भरे बाजार में घूम भी सकता है। वह कहाँ रहे यह
उसकी सोच का विषय नहीं रह जाता है। वह
जहाँ रहे-चाहे जेल में अपराधियों के बीच, चाहे मन्दिर में
भक्तों के बीच, वह अपने चारों ओर ज्ञान, आहलाद व शान्ती का
एक प्रभा- मण्डल बना लेगा। यह उसका मूल स्वभाव हो जाता है,
जैसे अग्नि का स्वभाव दाहकता है।
महात्माओं का आगमन तो बसन्तऋतु की तरह
होता है। जब बसन्त का आगमन होता तब वह किसी वृक्ष से
निवेदन करने नहीं जाता कि तुम फुल खिलाओ। वह चन्द्रमा के
पास जाकर यह नहीं कहता कि हे चन्द्रदेव तुम अधिक
ज्योतिर्मय हो जाओ। वह आकाश को निर्मल, स्वच्छतर होने अथवा
घास को परिपुष्ट हो जाने अथवा किसी मानव ह्रदय को
प्रफुल्लित हो उठने के लिए भी नही कहता। यह तो बसन्त की
उपस्थिति-मात्र से सब कुछ स्वयमेव अनायास ही हो जाता है।
ठीक उसी प्रकार महात्मागण अपने चारों
ओर ज्ञान और आनन्द सहज ही बिखेरते चलते है और जब कोई
अधिकारी जिज्ञासु उनके निकट पहुँच जाता है तब तो वे मानों
बरबस ही उसे अपनाकर उसके व्यक्तित्व को निखार देते है। आशय
यही है की महात्मा या सन्त वही है जो आत्मानन्द में डूबा
स्वतन्त्र विचरण करता है और स्वभावत:
दूसरों को मोह व शोक के भव सागर से पार उतरने में सहायता
पहुँचाता है। इसलिए ऐसे महात्मा की शरण लेना स्वयं को
मुक्ति-पथ पर आरुढ़ करना है।
आध्यात्मिकता कोई ऐसी वस्तु नहीं है
जिसकी चर्चा खाली समय बिताने के लिए आपस में करने लगें ।
इसके लिए तो परम प्रशान्त वातावरण चाहिये। गुरु के उपदेश
देते समय उनके ह्रदय के गहराई से निकले, निष्ठा में डूबे
उन शब्दों का हमें शाब्दिक अर्थ में नहीं लेना है बल्कि
उनका गूढ़ाशय समझना चाहिए। इसलीए यह जानना आवश्यक है कि हम
गुरु के पास कैसे जायें और उनसे कैसे शिक्षा ग्रहण करें।
सबसे पहले गुरु के प्रति प्रेमपूर्ण श्रद्धा उपजायें, फिर
भक्तिपूर्वक उनकी सेवा करें। इस प्रकार उनके निकट पहुँचने
पर हम उन्हें जानेंगे और उनके उपदेश हमारे ह्रदय में सीधे
प्रवेश कर सकेंगे। गुरु-शिष्य का मधुर सम्बन्ध ही वांछित
परिणाम लाता है।
अपने गुरु की लम्बे समय तक सेवा करके
और उनके साथ मानसिक तालमेल स्थापित कर लेने के बाद शिष्य
को गुरु से आत्मज्ञान सम्बन्धी प्रश्न करना चाहीए। उससे
ज्ञात होगा कि शिष्य ने चिन्तन-मनन किया है और तर्क-संगत
निष्कर्षों पर पहुँचा है। उसने जीवन जिया है नानाविधि
अनुभवों से गुजरा है और वह विभिन्न कठिनाईयों से न तो
निराश हुआ है, न ही सत्य के साथ किसी भी प्रकार का समझौता
करने को तैयार है। उसने अपने अनुभव से जान लिया है कि जगत्
की नश्वर वस्तुएं केवल क्षणिक सन्तोष दे सकती हैं। अपने
भीतर उसने अच्छी तरह झांका है और जान लिया है कि उसे तो
पूर्णता, अनन्तता, शाश्वत शान्ति और आनन्द ही चाहिए। इसलिए
वह गुरु से पूछता है कि वह किन उपायों से देश-काल-वस्तु से
अतीत उस असीम और अनन्त की अनुभूति का लाभ पा सकता है।
यह
लेख चिन्मय मिशन की हिन्दी मासिक पत्रिका
"चिन्मय चन्द्रिका"
के माह जुलाई 2002 के अंक में प्रकाशित हुआ था।
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