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लेख

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि

(डा. दुर्गादत्त पाण्डेय)

नाली का कीडा इत्र की शीसी में घुटन महसूस करता है। हम परमात्मा की सृष्टि में नहीं रहना चाहते। हम तो अपनी वासनाओं की सृष्टि में रहना पसन्द करते हैं। हमारी सृष्टि अज्ञान का प्रसार है - कर्तव्य और भोक्तृत्व के मध्य का लम्बा विस्तार। प्रपन्च का आरम्भ कर्ताभाव से होता है और अन्त में उसकी परिणति भोक्ताभाव में हो जाती है। अकर्ता-अभोक्ता जीव अविद्या के कारण बुद्धि में प्रतिबिम्बित निज स्वरूप आत्मचैतन्य में कर्तृत्व भोक्तृत्व का धर्म आरोपित करके स्वयं अपने को कर्ता और भोक्ता समझने लगा है। वास्तव में यह सब शरीर का धर्म है, जिसे देहाभिमान के नाते जीव भूल से अपना स्वरूप समझ लेता है। जैसे अग्नि का स्वरूप उष्णता है वैसे ही जीव का स्वरूप सच्चिदानन्द है। सच्चिदानन्दस्वरूप आत्मा नित्य एकरस बना रहता है। कर्तृत्व और भोक्तृत्व मनोकल्पित होने के कारण एकरस नहीं है। शरीर में रहते हुए सन्त अपने सहज स्वरूप में बना रहता है। भीतर कर्तव्य की वृत्ति न बनने से वह सुख-दुःख से निर्लिप्त "समत्वभाव" में स्थित रहता है। बनना-बिगडना शरीर का धर्म है। आत्मा का सहज स्वभाव न बनता है और न ही बिगडता है। "अहेयमनुपादेयं यत् तत् स्वरूपं" आत्मज्ञानी यमराज सबको मारता है, किन्तु उस पर हत्या का अभियोग नहीं लगता है। ईश्वर ने सृष्टि का ढांचा बना दिया। उसने देश, काल और पंचमहाभूतों की रचना करके उसमें गति भर दी। मनुष्य को सृष्टि का सिरमौर मानकर उसे विवेक का वरदान दे दिया। विवेक का सदुपयोग या दुरुपयोग करना मनुष्य के संकल्पस्वातंत्रय पर छोड दिया। कृतघ्नी जीव ने अपने अज्ञानजनित कर्मों से इस प्रपंच का जाल बुन दिया। योग, वियोग, भोग, हित और अहित इस जाल के फन्दे हैं। मूढ जीव मकडी की तरह स्वनिर्मित जाल में फंस जाता है। यह जाल मन पर फंदा डालता है और बडी निर्ममता से उसे प्रपंच की ओर खींचता है। यह सृष्टि राग-द्वेष का ही ताना-बाना है। इस दृष्टि से हर जीव अपने द्वारा निर्मित सृष्टि में रहता है। जहाँ ममत्व है वहाँ योग से हर्ष, वियोग से विषाद और भोग से दु:खवर्धक सुख का अनुभव होता है। कर्मानुसार सृष्टियाँ हैं और जीवों की अपनी-अपनी अनुभूतियां हैं। जहाँ ममता नहीं है वहाँ सृष्टि भी नहीं। ममतासहित सृष्टि कुछ और है और ममतारहित सृष्टि कुछ और। जो सृष्टि हमारे सामने पसरी है वह ईश्वर द्वारा सृष्टन होकर जीव द्वारा सृष्ट है। सारा संसार मोहमूलक है और यहाँ कुछ भी परमार्थ नहीं है।

ईश्वर साक्षात् आनन्दस्वरूप है। यदि ईश्वर प्रपंचात्मक सृष्टि का कर्ता होता तो यह सृष्टि आनन्दरूपा होती। परन्तु ऐसा नहीं है। ईश्वर स्वभाव से निष्पक्ष है। वह न तो सुख का प्रदाता है और न ही दु:ख का प्रदाता। सुख-दु:ख हमारे कर्मों का प्रतिफल हैं। हमारे कर्मों से ही परिस्थिति बनती है। अनुकूल परिस्थिति सुख का कारण है और प्रतिकूल परिस्थिति दु:ख का कारण है। राग-द्वेष जीव के धर्म हैं, जिनसे सृष्टि में विषमता आती है। इस विषमता का उत्तरदायी जीव है। ईश्वर तो राग-द्वेष से मुक्त साक्षात् "समत्व" है। अत: सृष्टि वैचित्रय की सिद्धि ईश्वर से नहीं हो सकती। मनुष्य का निजकृत कर्म ही सृष्टि वैचित्रय के मूल में है।

राग और द्वेष चित्त को पक्षपाती बना देते हैं। धृतराष्ट्र दुर्योधन में कोई दोष नहीं देखता है। पक्षपाती होने से जीवन का सत्य हाथ से फिसल जाता है। यानी सत्य का वनवास हो जाता है। श्रीराम (सत्य) का वनवास कैकेयी के मन के पक्षपात का ही परिणाम था। सत्य से पृथक होते ही हम झूठ की दुनिया में आ जाते हैं और जीवन का अशिव के साथ गठबंधन हो जाता है असत्यं अशिवं।

जीवन जीने के दो सिद्धान्त हैं- 1) परिस्थितिवाद ऐर 2) परमार्थवाद। अविवेकी जीव परिस्थिति को पूर्वनियत मान लेते हैं और उसको बदलने में सारा जीवन लगा देते हैं। बुढापे तक वे परिस्थितिवाद से जूझते रहते हैं। उनकी दुरास्था है कि परिस्थिति को सुधार कर सुख प्राप्त किया जा सकता है। यहाँ तक कि वे गलत कर्म करके उसे सजाना-सँवारना चाहते हैं। उन्हें ज्ञात नहीं है कि परिस्थिति उनके कृत कर्म का ही परिणाम है। संसारी व्यक्ति अपनी परिस्थिति की व्याख्या तीन तरह से करता है। प्रथमत: परिस्थिति का कारण ईश्वर है। ईश्वर ने मुझे विषम परिस्थिति में फँसा दिया, अन्यथा मैं भी इस दुनिया का सफल व्यक्ति होता। द्वितीयत: मेरी विषम परिस्थिति का कारण मेरा पडोसी है, अन्यथा मैं भी विकास के क्षेत्र में बहुत ही आगे निकल जाता। तृतीयत: परिस्थिति के मूल में अपना पूर्व जन्मार्जित कर्म है। इस प्रकार विभ्रमित व्यक्ति अपनी परिस्थिति की एक निश्चित व्याख्या नहीं कर पाता है। अज्ञ व्यक्ति यह सोचता है कि देश बदलने से परिस्थिति बदल जायेगी। उसने गाँव छोडकर नगर में आवास बना लिया। परिस्थिति ज्यों की त्यों बनी रही। फिर उसने निर्णय लिया कि समय अभी बहुत गडबड है, अत: काल के बदलने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। सुखमय परिस्थिति के लिये उसने घर, परवार, न्यायालय, सैन्यबल आदि का ठाट बनाया। भरपूर सावधि जमा और जीवन बीमा कराया। इतना सब करने के बाद भी वह भयावह स्थिति और असुरक्षित भविष्य से नहीं बच पाया। विवेक जगते ही मनुष्य परिस्थितिवाद के कारणस्वरूप कर्मवाद की ओर झुकता है। कर्मवाद में प्रवेश करते ही भीतर का विकास होना शुरू हो जाता है। तब मनुष्य परमार्थवादी हो जाता है। उसे यह बोध होने लगता है कि परिस्थिति अपनी रचना है और इसे सत्कर्म से बदला जा सकता है। "कर्मवाद में आस्था" सही ढंग से जीवन को संचालित करती है। "गलत कर्म का नतीजा गलता होगा" ऐसी दृढ धारणा से मनुष्य कुकर्म से बच सकता है। परमार्थवादी श्रीराम ने वनवास की व्याख्या करते हुए कहा कि वनवास मेरे लिए वरदान है। इससे पिता का वचन पूरा हो रहा है, माता का हित हो रहा है, राजनीति में दक्ष भाई भरत को राज मिल रहा है और मुझे सन्तों के दर्शनों का सुअवसर मिल रहा है। ये सब मेरे पुण्य कर्म का प्रभाव है। परिस्थिति को श्रीराम की दिव्य दृष्टि से देखने पर ही जीवन का सुधार हो सकता है। दर्शन की यह उत्तम विधि है। ऐसा दर्शन हृदय को सींचता है- जीवन को मूल्यों से जोडता है।

परिस्थिति प्रवाही है। अत: उसका गोमुख (उद्गमस्रोत) भी होना चाहिये। इसे ज्यामिती विधि से समझा जा सकता है। अज्ञान से देहाभिमान, देहाभिमान से कर्ताभाव, कर्ताभाव से कर्मसंस्कार, कर्मसंस्कार से परिस्थिति, परिस्थिति से सुख-दु: और सुख-दु:ख से भोक्ताभाव का जन्म होता है। इस प्रकार कर्तृत्व और भोक्तृत्व के मध्य जीव की सृष्टि का प्रसार है। कर्त्त्व से भोक्तृत्व, और भोक्तृत्व से कर्तृत्व का चक्र ही जन्म-मरण का चक्र है। इस वर्तुल में जीव निरंतर नाचता रहता है। मनुष्य की नियति देखिये कि वह पुण्य नहीं करना चाहता और पुण्य का फल पाना चाहता है-"पुण्यस्य फलमिच्छन्ति नेच्छन्ति पुण्य मानव:" इसी तरह वह पाप का फल नहीं चाहता, किन्तु निरंतर यत्नपूर्वक पाप कर्म करता रहता है। "पापस्य फलं नेच्छन्ति पापं कुर्वन्ति यत्नत: "। इस प्रकार परिस्थितिजन्य समस्याओं को सुलझाने में पहले अज्ञ जीव न्यस्त होता है, फिर व्यस्त हो जाता है, तदनंतर अस्त-व्यस्त हो जाता है और फिर पूरी तरह से त्रस्त होकर अन्त में ध्वस्त हो जाता है। इस विनाश से बचने के लिये बुद्धि में विवेक जगाना होगा। विवेक के जगते ही राग-द्वेष (मधु-कैटभ) की मलिनता से चित्त निर्मल होने लगता है। जगदार्थी जीव परमार्थी बनने लगता है। तब उसके वरण का विषय बदल जाता है। अब वह "विषय-सुख" के स्थान पर "आनन्द-रस" का वरण करता है। जब राम-रस का स्वाद मिल जाता है तो "षट्रस" फीका लगने लगता है। जब भीतर आनन्द का स्रोत फूट रहा हो तो बाहर के भोग की क्या जरूरत?

जब धर्म आश्रय बनता है तब विहित-निषिद्ध सभी विषयों के त्याग के उपरान्त 'आत्मरति' का लाभ मिलता है। सारी परिस्थितियाँ सारा प्रपंच स्वप्नवत लगने लगता है। जब कल्पित सृष्टि ढह जाती है तो तरने का प्रश्न ही मिट जाता है। मीरा कहती भी है- "भवसागर तो सूख गयो है फिकर नहीं मोहिमें तरनन की।" जगने की पहचान यही है कि मिथ्या प्रपंच के भ्रामक सुख से सम्बंध टूट जायें। अविद्या विचार को सहन नहीं कर पाती। "अविद्या विचारं न सहते।" विवेक से मोह का भ्रम छँट जाता है और प्रभु के प्रति अनुरक्ति दृढ हो जाती है।

मशीन चलाने के लिये मैनुवल की जरूरत होती है। परमात्मा ने जीवन की मशीन के रूप में शरीर दिया है और इस शरीर को सम्यक संचालन हेतु शास्त्रों का मैनुवल दिया है। यह शरीर मोक्ष का द्वार है और नरक का भी द्वार। शास्त्रसम्मत जीवन जीने से मोक्ष का द्वार खुलता है और जीवन में शान्ति और आनन्द की बहार आ जाती है।

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