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स्वस्थ शरीर
(अ)
सात्विक भोजन - बिना
स्वस्थ शरीर के कोई भी लौकिक या पारलौकिक कार्य
करना सम्भव ही नहीं है।
इसके लिए शुद्ध और सात्त्विक आहार आवश्यक है। मिर्च,
इमली,
प्याज,
लहसुन,
खटाई,
तेल,
मसाले,
हींग आदि त्याज्य हैं।
बहुत अधिक न खाना चाहिए। मिताहार रोगों से बचाता है। ध्यान रखो भोजन स्वाद के
लिए नहीं स्वास्थ्य के लिए है। एकादशी आदि किसी दिन उपवास भी कई दृष्टि से
उपयोगी है।
(ब)
नियमित व्यायाम -
स्वस्थ शरीर के लिए नित्य व्यायाम भी आवश्यक है। इसके लिए प्रात:काल
कुछ शारीरिक श्रम करना चाहिए। बगीचे में काम,
टहलना,
तैरना,
आसनों का अभ्यास आदि कुछ
व्यायाम हैं। आसन और प्राणायाम साधना में अधिक सहायक हैं।
(स)
स्वच्छता - स्वस्थ
वायु का सेवन,
नित्य स्नान,
साफ कपडे और रहने के
स्थान की सफाई शरीर को स्वस्थ और चित्त को प्रसन्न रखती है।
2 -
स्वस्थ मन
(अ)
स्वाध्याय - जैसे
स्वस्थ शरीर के लिए नित्य शुद्ध और पौष्टिक भोजन की आवश्यकता है,
वैसे ही स्वस्थ मन के
लिए सद्-ग्रन्थों का नित्य अवलोकन आवश्यक है। अन्यथा मन दुर्बल हो जाता है और
उसे मानस रोग घेरने लगते हैं। दुश्चिन्तायें,
चिडचिडाहट,
व्यग्रता,
भय,
द्वेष आदि मानसिक रोगों
के लक्षण हैं। गीता,
रामायण,
भागवत,
उपनिषद्,
योगवासिष्ठ,
बाइबिल,
जेन्दावस्ता,
कुरान,
त्रिपिटक,
ग्रन्थसाहिब आदि में से
किसी ग्रन्थ का अध्ययन करना चाहिए ।
(ब)
सन्तोष और शान्ति -
ये दोनों स्वस्थ मन के लक्षण हैं। विवेक और वैराग्य के व्यायाम से सन्तोष और
शान्ति बढती है। स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन से आत्मबल बढता है। इसी बल से
आध्यात्मिक सफलतायें प्राप्त की जाती हैं।
(स)
सद्-विचार -
सद्-विचार जीवन को सही दिशा में ले जाते हैं। असद् विचारों से मनुष्य का पतन
होता है। सत्संग और सद्ग्रन्थों के अवलोकन से सद्-विचार दृढ होते हैं। कुसंग
और कुचेष्टायें छोडकर सत्संग का आश्रय लो। संसार में जितने भी महापुरुष हुए
हैं और उन्होंने जब जो कुछ पाया है वह सत्संग के कारण ही।
3
- नैतिक साधना
नैतिक
साधना के बिना आध्यात्मिक साधना कठिन ही नहीं वरन् असम्भव हो जाती है। इसके
लिए निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए -
(अ)
ब्रह्मचर्य और सत्य -
वीर्य की रक्षा बडी सावधानी से
करनी चाहिए। शरीर स्तर पर वीर्य ही ईश्वर है। जीवन की यह एक बहुत बडी विभूति
है। यह जीवन,
विचार और बुद्धि का सार
है। संचित वीर्य ओज में परिवर्तित होता है और ओज आत्मशक्ति में।
हर कीमत पर सत्य,
मधुर और मित भाषण का
अभ्यास करना चाहिए। मिथ्या भाषण दुर्बलता,
भय और अज्ञान का परिणाम
है। नित्य एक-दो घण्टे का मौन रहना चाहिए। उस समय संकेतों का प्रयोग भी न
करना चाहिए।
(ब)
सद्-गुणों का विकास -
नियम की पाबन्दी,
समय का उपयोग,
मधुर भाषण,
उदारता करुणा,
स्नेह,
सद्-पुरुषों का आदर,
सहनशीलता,
क्षमा,
धैर्य,
सन्तोष,
निरभिमानता आदि सद्-गुण
हैं। यदि ये गुण सहज ही प्राप्त न हों तो अभ्यास के द्वारा प्राप्त किये जा
सकते हैं। सब गुणों का एक साथ अभ्यास नहीं हो सकता,
किन्तु एक गुण के आते ही
उसके सहयोगी अनेक गुण स्वयं आने लगते हैं। किसी एक गुण का अभ्यास करने का
संकल्प करो और नित्य सोने के पहले अपनी सफलताओं-असफलताओं पर विचार करो। कुछ
समय में वह अभ्यास आदत बन जायेगा और आदत स्वभाव ।
(स)
दुर्गुणों का त्याग -
प्रायः लोग कुसंग के कारण
दुर्गुणों में पड जाते हैं। आध्यात्मिक क्षेत्र में जल्दी सफल होने के लिए
दुर्गुणों को शीघ्रातिशीघ्र छोडना होगा। मद्यपान,
आलस्य,
मांसभक्षण,
क्रूरता,
कठोरता,
कुटिलता,
छल,
प्रपंच,
परनिन्दा,
लोभ,
परिग्रह आदि अनेक
दुर्गुण हैं। यदि साधक में ऐसे कोई दुर्गुण है तो उन्हें एक-एक कर छोडने का
प्रयत्न करना चाहिए। दुर्गुण बडे हठी होते हैं। इनके त्यागने के लिए संकल्प
करना पडता है। यदि एक दुर्गुण छोडने में सफलता मिली तो आत्म-विश्वास बढ जाता
है और दूसरे दुर्गुण छोडना सरल हो जाता है।
(द)
सम्यक आजीविका - आज
के आर्थिक युग में धन संचय की हवस बढ रही है। इसके लिए बेईमानी और छल-प्रपंच
का सहारा लिया जा रहा है। कारण केवल यह है कि हमारी आवश्यकतायें बढ गई हैं।
शुद्ध आजीविका के लिए आवश्यक है कि आवश्यकतायें घटाई जायें। श्रम और ईमानदारी
से कमाया हुआ धन मनुष्य की आवश्यक आवश्यकतायें पूरी कर सकता है। आलसी और
दुर्बल व्यक्ति ही आसानी से प्राप्त होने वाले धन की इच्छा करते हैं। यदि
आपकी बुद्धि और शरीर शक्तिसम्पन्न है तो आप पराये पैसे को विष्टा के समान
समझेंगे। सबल बनो और श्रम से धन कमा कर सन्तोष का जीवन बिताओ।
4 - आसन और प्राणायाम
उपर्युक्त
तथ्य आध्यात्मिक साधना की भूमिका तैयार करने के लिए है। उन्हें साधना का
परोक्ष अंग कह सकते हैं। आसन यथार्थ साधना की पहली सीढी है। कुछ आसन तो
व्यायाम की दृष्टि से उपयोगी होते हैं,
जिनका उल्लेख ऊपर किया
जा चुका है। कुछ आसन ध्यान के लिए बताये गये हैं। पझ,
सिद्ध और सुख आसन में से
कोई एक अपनी सुविधा और रुचि के अनुसार चुन लेना चाहिए। उत्तर या पूर्व दिशा
की ओर मुख करके उस आसन पर लगभग तीन घंटे अविचल बैठने का प्रयास करना चाहिए।
उसी आसन पर ध्यान और जप करना होगा। इसके लिए स्थान और समय निश्चित होना
चाहिए। इस कार्य के लिए एक अलग कमरा ताले से बन्द रखना चाहिए।
प्रात:काल
4 बजे उठ कर शौचादि से निवृत्त और पवित्र होकर आसन,
प्राणायाम और ध्यान करना
चाहिए।
आसन पर
बैठते ही कम से कम बीस बार प्राणायाम करना चाहिए।
अपने
इष्टदेव के ध्यान के लिए कुछ श्लोक याद कर लो। प्राणायाम के बाद उनका पाठ
करके भगवान् का चिन्तन करना चाहिए।
5
- प्रत्याहार और धारणा
भगवान् का
ध्यान करते ही वाह्य संसार से मन को हटा कर अन्तर्मुखी कर लेना चाहिए। यह
प्रत्याहार है। जप इसमें सहायक होगा। ऊँ या ऊँ नमो नारायणाय आदि किसी मन्त्र
का जप प्रारम्भ कर देना चाहिए। 108 मन्त्र की एक माला होती है। एक या
तीन माला मन्त्र जपना चाहिए। अधिक भी हो सकता है। मन्त्र-जाप करते ही मन
भगवान् के सामने जा पहुँचता है। भगवान् का निरन्तर चिन्तन ही धारणा है।
जप-माला
भी उपयोगी है। रुद्राक्ष या तुलसी की माला रखना चाहिए। जप के अतिरिक्त उसे
गले में पहना जा सकता है,
जेब में रखा जा सकता है
और सोते समय तकिया के नीचे भी डाल सकते हैं। किन्तु माला सदा साथ रखनी चाहिए।
6 - ध्यान
एक
निश्चित आसन पर बैठकर अपने इष्टदेव का तैल धारावत चिन्तन ही ध्यान है।
शरीर-मन-बुद्धि के द्वारा भगवान् के निकट पहुँच उन्हें पीछे छोड देना समाधि
है। ध्यान के अभ्यास की सफलता समाधि के लाभ में निहित है।
समाधि में
परम तत्व का अपरोक्ष अनुभव होता है। ध्याता और ध्येय एक हो जाते हैं।
समाधि ही
तुरीयावस्था और जीवन्मुक्ति है। यह योगी की पूर्णावस्था है।
7 -
नि:स्वार्थ
सेवा
आध्यात्मिक साधना केवल ध्यान के
कमरे तक ही सीमित नहीं है। यह तो समग्र-कालिक साधना है। हिन्दू धर्म का यह एक
बडा अभिशाप है कि हम केवल कुछ बातों को पवित्र और धार्मिक मान बैठे हैं। शेष
व्यावहारिक जीवन धर्म और आध्यात्मिक से परे समझ लिया गया है। यह बडी भूल है।
साधक को अपना समग्र जीवन साधनामय बनाना होता है।
भगवान् की शरणागति का भाव
निरन्तर रहना चाहिए। सारा जीवन उन्हीं की सेवा है। उन्हीं की प्रेरणा से हर
कार्य हो रहा है। आध्यात्मिक साधना की सारी सफलता उन्हीं के हाथ में है।
प्राणीमात्र से प्रेम-भाव रखना
भगवान् के प्रेम का व्यावहारिक रूप है । भगवान् के भक्तों को सभी लोग प्रिय
दिखाई दते हैं। दूसरे के दोषों को देखने के बजाय अपने दोष देखना और उन्हें
दूर करना भगवत् सेवा का श्रेष्ठ मार्ग है।
दीनों को
दान देना,
रोगियों की सेवा करना,
निरक्षरों को पढाना,
पीडतों की सहायता करना,
मोहान्ध भटकते लोगों को
राह दिखाना आध्यात्मिक साधना का अन्तिम किन्तु महत्वपूर्ण अंग है। कर्मयोग के
अन्तर्गत इसकी महिमा के गुण गाये गये हैं।
यदि साधना
के उपर्युक्त निर्देशों का दृढतापूर्वक पालन किया जाये तो जीवन में निश्चय ही
सफलता,
सुख और मुक्ति का लाभ होगा। सभी
सन्त-उपदेशों का सार यही है।
इस दिशा में सतत अग्रसर रहने के
लिए सन्तों महात्माओं का मार्ग-दर्शन लेते रहना आवश्यक है। वर्तमान काल में
पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी के अनुयायियों द्वारा स्थापित संस्था
'चिन्मय
मिशन'
आपकी सहायता के लिए सदा
उपलब्ध है।
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