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लेख

मनुष्य जीवन की सफलता क्या है ?

(स्वामी सुबोधानन्द)

     

यह मनुष्य जीवन जो आपको मिला है, यह एक अवसर है। शास्त्र मनुष्य जीवन को अवसर ही समझते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं- "कबहक करि करुना नर देही , देत ईस विनु हेतु सनेही।" शंकराचार्य जी कहते हैं- "जन्तूनां नर जन्म दुर्लभं।" शास्त्र की दृष्टि में यह जो मनुष्य शरीर है वह एक अवसर है। भगवान की दया से इतनी बात सबने स्वीकार कर ली है कि जो मनुष्य का शरीर है वह सृष्टि का सबसे अच्छा शरीर है। सबसे विकसित शरीर यही है। इसमें बुद्धि का सबसे अधिक विकास है। लेकिन यह परं तत्त्व की प्राप्ति का अवसर है, यह मानना लौकिक ज्ञान-विज्ञान के बस की बात नहीं है।

    लौकिक ज्ञान इतना ही कहता है कि मनुष्य शरीर एक ऐसा प्राणी है जो विपरीत से विपरीत परिस्थिति में अपने आपको बचा सकता है। सूखा पड गया तो वह अपने को बचा लेगा। अति वृष्टि हुई तो भी बचा लेगा। भूकम्प आये तो भी बचायेगा। जंगल में आग लग गई तो भी बचायेगा। अन्य प्राणी तो बेचारे थोडा बहुत प्रयत्न करते हैं। जंगल खडा है और हमारे महापुरुष लोग आग लगा देते हैं। उसमें जितने जीव-जन्तु हैं , थोडे बहुत इधर-उधर उडते हैं और स्वाहा हो जाते हैं। लेकिन उसमें मनुष्य होगा तो वह बचने का इन्तजाम कर लेगा।

    लेकिन शास्त्र इतनी बात नहीं बोलता। वह कहता है-"इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति" -इह माने इस मनुष्य शरीर में। मनुष्य के शरीर में अगर आपने तत्त्व को पहचान लिया तो आप समझो कि आपका मनुष्य जन्म सफल हो गया। सत्यं अस्ति- मनुष्य का शरीर सार्थक हो गया। हमारी सफलता की परिभाषा क्या है और वेद की सफलता की परिभाषा क्या है, जरा देख लो और मिला लो।

    कोई बडा-बडा कार्य करें, जिस क्षेत्र में उसने कदम रखा है, उसके शिखर पर वह पहुँच जाये, इन्द्र बन जाये, प्रधानमंत्री की बात छोडो, धर्मराज युधिष्ठिर बन जाये, गंधर्व बन जाये तो भी ये सब छोटे पद हैं। अभी जो छोटे-छोटे पद हैं उनको ही हम अन्तिम गति समझ बैठते हैं। जब पुराण पढते हैं तो पता चलता है कि इनके बाद लोग ऊपर बैठे हैं। अब देखिये, निर्णय हुआ अयोध्या के दरबार में कि कल भगवान् श्रीराम को युवराज पद दे दिया जायेगा। ऊपर बैठक हुई तो उस दरबार में निर्णय हुआ कि इनको वन भेजा जाये। उसके लिये तत्काल सरस्वती माता की नियुक्ति हुई और उन्हें अयोध्या भेजा गया। उन्होंने आते ही सबकुछ उलट दिया। यहाँ का जो पद है अधिकार है वह कुछ नहीं है। उससे बडे-बडे पद हैं। भागवत आदि ग्रन्थ पढये, पूरा प्रशासन तंत्र का वर्णन है। अत:  इन्द्र भी बन जाओगे तो तुम सफल नहीं हो। मनु भी बन जाओ तो भी सफल नहीं हो। सफलता का मापदण्ड कौन तय करेगा? हम तो कहते हैं शास्त्र को ही करने दो, अच्छा है।

    अवसर बीतने पर पछताना पडता है। जब हड्डियाँ इस शरीर को संभालने में असफल होती हैं तब अकस्मात याद आता है कि हमने क्या गलती की। हम सोचते थे यहीं रहना है। यह शरीर तो गडबडा गया। इस शरीर को तो ये हड्डियाँ भी नहीं संभाल पा रही हैं। जो शरीर दुनियाँ को संभालने की चेष्टा कर रहा था, वही लकडी के सहारे चलने लग गया। उसके तीसरी टाँग लग गई। यह भी भाग्यशालियों को याद आता है कि अरे हमने कोई तैयारी नहीं की, गडबड हो गई, जाने का समय आ गया। अब इतने कम समय में मैं क्या करूँ ? जल्दी-जल्दी गीता पढते हैं, सत्संग में जाते हैं। बाकी लोगों के लिये शंकराचार्य जी लिखते हैं- "तदपि न मुंचति आशा पिण्डं"

    ऐसे लोगों के लिये महाभारत में बहुत सुन्दर दृष्टान्त है। बोले, एक मेढक था। उसको सांप ने निगल लिया आधा निगल गया, कीं, कीं कर रहा था। पीडा में था। इस बीच उस मेंढक के सामने एक पतंगा गुजरा। उस मेंढक ने एक दम जीभ बढायें और पकड लिया। देख लो आप। फिर दूसरा पतंगा उधर से आया तो उसका ध्यान गया, उसको भी लपका। अब तक मेंढक का आधा शरीर सर्प के मुख में जा चुका था। बोले, यह काल सर्प में हमारा आधे से ज्यादा शरीर जा चुका है और फिर भी यदि पतंगा गुजरे, तो बांछें खिल जाती हैं। महती विनष्टि:। यह तो बहुत बडी हानि है। महाराज, पछताओगे। मनुष्य का शरीर केवल विकसित शरीर है। ऐसा समझना पूरी समझ नहीं है। मनुष्य का शरीर सबसे अच्छा शरीर है, ऐसा समझकर क्या करोगे?

    शास्त्र कहता है, अवसर है। इसे मत जाने दो। यह मनुष्य शरीर एक ऐसी गली है कि यदि उसे छोड गये तो आप भटक जाओगे। इसी शरीर में आत्मदर्शन कर लो। कठोपनिषद् में कहते हैं-

    यथाऽदर्शे तथाऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके।

    यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपोरिव ब्रह्मलोके ।।५।।

    इस मनुष्य देह में आत्मज्ञान इतना स्पष्ट होता है जैसे आप अपने को दर्पण में देखते हो। पितृलोक में यह ज्ञान वैसे ही होता है जैसे आप अपने को स्वप्न में अनुभव करते हो। गन्धर्वलोक में कैसा आत्मज्ञान होता है? सुन्दर दृष्टान्त है। जैसे जल में आप अपनी परिछाहीं देखते हो। स्थिर हुआ जल तो बन गई बात और जहाँ चंचल हुआ जल, सारी चीज बिखर गई। ब्रह्मलोक में आत्मज्ञान छाया की तरह होता है। आप धूप में खडे हैं और आप की ही छाया पड रही है। इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्य लोक में जो बोध होता है वह निर्मलतम है।

    इस मनुष्य शरीर में वही लोग सफल हैं, जिन्होंने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया। उनके चित्त में समता आकर बैठी है। उनमें द्वन्द्व सहन करने की अगम्य सामर्थ्य है। वे भूत-भूत में, कण-कण में, क्षण-क्षण में तत्त्व को देखते हैं। केवल हृदय में नहीं, केवल बाहर नहीं, केवल जाग्रति में नहीं, केवल स्वप्न में नहीं, केवल सुषुप्ति में नहीं, केवल समाधि में नहीं, विक्षेप में भी दृष्टि का विपरीत लोप नहीं होता। वह महापुरुष यहीं अपने अमृतत्व का, अपने नित्यत्व का, अपने रसत्व का, अपने आनन्द का अनुभव कर लेता है।

विद्युच्चलं किं ? धनयौवनायुः

विद्युत के समान क्षणिक क्या है? धन, यौवन और आयु।

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