|
आज के
शिक्षित प्रतीत होने वाले लोग धर्म के प्रति इसलिये उदासीन नहीं हैं कि धर्म
का विज्ञान ही खोखला है या उसकी कोई उपयोगिता ही नहीं है,
बल्कि सारे संसार में सर्वत्र इनका एकमात्र कारण यही है कि लोगों में धर्म की
पुस्तकों को समझने की क्षमता ही नहीं है। यह बात हिन्दुओं में ही नहीं सभी
धर्म के लोगों में पायी जाती है। सारे भूमण्डल पर जितने धर्म हैं उसमें
निष्ठा रखने वाले लोग नई विचारधारा के साथ पुराने सिद्धान्तों का तालमेल
बैठाने में सर्वत्र कठिनाई का अनुभव कर रहे हैं।
सच्चा धर्म
कभी नष्ट नहीं होता। हिन्दुत्व भी मरा नहीं है। यदि हम सडक के किनारे कोई
वृक्ष बिना पत्ती व फूल के नंगा खडा देखें तो संभव है कि जल्दी में यह समझ
बैठें कि जो पेड कभी हरा-भरा था वह सूख गया है। अब इसकी छाया में कोई यात्री
विश्राम नहीं करता है। वनस्पतिशास्त्री हुआ और उसे वृक्षों से प्रेम रहा तो
वह समझ लेगा कि इस मुरझाये वृक्ष पर कोई परजीवी वृक्ष उग रहा है।
वनस्पतिशास्त्री परोपजीवी को ही देखकर समझ सकता है कि वृक्ष में अभी रस-धारा
प्रवाहित है,
मृत प्रतीत होने वाले वृक्ष में अभी जीवन है। तने को काटकर यह देखने की
आवश्यकता नहीं है कि वृक्ष में रस है या नहीं।
इसी प्रकार
आज हिन्दुत्व भी उतना व्यापक नहीं है कि वह समस्त देश को छाया प्रदान कर सके।
उसकी पत्रहीन शाखायें श्मशान की विभीषिका उत्पन्न करती हैं। किन्तु हिन्दुत्व
के विशाल वृक्ष पर अनेक परोपजीवी पादप लहराते देखकर धर्म संरक्षक समझ सकता है
कि यह मृत नहीं है,
उसमें रस प्रवाहित है। उसे पुन:
जीवित किया जा सकता है।
जैसे कोई
कृषक मृत वृक्ष को जीवित करने के लिये उसके परोपजीवियों को निर्दयता के साथ
साफ कर देता है,
उसकी डालों पर अनावश्यक बोझ न रखने के लिये उन्हें काट-छाँट देता है,
उसकी जमीन पोली करता है और उसे ताजे पानी से सींचता है वैसे ही धर्म का वृक्ष
भी विवेक की खाद व विचार के जल से परिपुष्ट किया जा सकता है। उनके ऊपर उगने
वाले अँधविश्वासों
को साफ किया जा सकता है।
ऐसा होने पर
आजकल के बच्चे प्राचीन शास्त्रों का विधिवत अध्ययन कर समझ सकेंगे कि आधुनिक
विज्ञान और प्राचीन धर्म में ऐसा कोई विरोध नहीं है जैसा वे प्राय:
समझते हैं।
जब मैं धर्म कहता हुँ तो इसका अभिप्राय केवल हिन्दू धर्म तक सीमित नहीं है।
यह बात जितनी हिन्दू धर्म के लिये सत्य है उतनी ही आज संसार के किसी भी धर्म
के लिये सत्य हो सकती है। दुर्भाग्य से हम मन्दिर और मस्जिद,
चर्च और साइनागाँग (यहूदियों का देवालय),
पेगोडा और गुरुद्वारा की पाषाण भित्तियों को ही धर्म समझ बैठे हैं। हमने
विभिन्न कर्मकाण्डों को और उनके नाम पर होने वाले झगडों को घृणा व विद्वेष को
ही धर्म समझा हुआ है। इसका मूल कारण धर्म की वास्तविक अनभिज्ञता है।
धर्म को
तत्त्वत:
जीवन का
विज्ञान समझना चाहिये। इसके द्वारा हम जीवन के मूल्य पहचान सकते हैं और उनके
ऊपर हम व्यावहारिक जीवन का निर्माण बुद्धिमानीपूर्वक कर सकते हैं। यदि
वर्तमान धर्म बहुत पुराना है और उसमें निर्धारित जीवन के मूल्य आज की
समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते हैं तो हमें बिना किसी सँकोच के उसके समस्त
सिद्धान्तों का त्याग कर जीवन के नये नियमों और नये सिद्धान्तों की रचना करनी
होगी। यदि धर्म में किसी जीवन योजना के लिये आदेश दिये गये हैं और हमारे
नित्य प्रति के व्यवहार से उनका कोई सम्बंध नहीं है,
हमारी समस्याओं का उसमें कोई समाधान नहीं है तो हम पुराने धर्म को त्याग
देंगे और नई संस्कृति और नई मान्यताओं को स्वीकार कर लेंगे क्योंकि मनुष्य का
प्रथम प्रयोजन परलोक की अपेक्षा वर्तमान जीवन से अधिक है और वास्तव में यही
होना चाहिये।
यह पूछना
उचित दिखाई देता है कि मनुष्य स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाले इन्द्रियों के
अनुभव जगत् के परे किसी महान् सत् या महान् शक्ति का ज्ञान प्राप्त करने के
लिये क्यों प्रयत्न करे?
वस्तुत:
हम देखते
हैं कि पशुओं में धर्म नाम की कोई वस्तु नहीं है। केवल मनुष्य ही अपने हृदय
की गहराई में धर्म की आवश्यकता या आध्यात्मिक मुक्ति की चाह अनुभव करता है सो
भी यह चाह सभी लोगों में नहीं होती। हर एक पीढी में कुछ मुट्ठी भर लोग परम
सत् की जिज्ञासा अनुभव करते हैं। इस महत्वपूर्ण समस्या का सामना करने की चाह
केवल थोडे से विशिष्ट पुरुषों में ही क्यों देखने में आती है?
इसका उत्तर
हमारे प्राचीन ग्रन्थों में बडे विस्तार से दिया गया है। डार्विन ने भी अपने
उद्विकास के सिद्धान्त में इसकी ओर अस्पष्ट संकेत किया है। वह हमें समझाना
चाहता है कि जीवन यद्यपि यकायक प्रारम्भ हो गया किन्तु वह विकसित होता हुआ और
उद्विकास के विभिन्न स्तरों से ऊपर उठता हुआ
'विचारवान
जीवन'
की श्रेणी तक पहुँच गया। अब इसे मनुष्य कहते हैं। इसके बाद डार्विन अपने
पाठकों को सहसा काल्पनिक युग में उछालकर यह आशा करता है कि विकास आगे चलते
रहकर अति मानव के रूप में पूर्णता प्राप्त करेगा।
यदि इस
प्राणिविज्ञानी देवदूत का निर्णय ठीक है तो हमें यह स्वीकार करना पडेगा कि
वनमानुष की पुछ किसी प्रकार गायब हो गयी और वह नित्य क्षौरकर्म कर मनुष्य बन
गया। इस प्रकार पशु स्तर से विकास आगे बढता रहा और पूर्ण मनुष्य की रचना हो
गई। किन्तु यहाँ भी स्पष्टत:
एक
संक्रमणकाल रहा है जिसमें पाशविक प्रवृत्तियाँ मनुष्य रूपधारी प्राणी में भी
वर्तमान में दिखाई देती हैं। उनका कार्य व्यापार पशुओं से किसी प्रकार अच्छा
नहीं है। ऐसे प्राणी मनुष्यो के रूप और आकार में दिखाई पडने पर भी पशुओं जैसे
ही रहते हैं। उनमें पशु जगत् के सामान्य स्तर से ऊपर उठना कठिन दिखाई देता
है। ऐसे लोगों पर धार्मिक प्रेरणा का प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पडता है।
किन्तु जिन
लोगों ने इस स्तर को बहुत पहले पार कर लिया है और जीवन की परिवर्तनशील
परिस्थितियों से ऊपर उठकर मानसिक और बौद्धिक विकास कर लिया है,
उसके सामने चुनौती के रूप में दो प्रश्न अवश्य उठने लगते हैं,
कि ये सब वस्तुयें कहाँ से आयी हैं?
ये कहाँ और
क्यों चली जाती हैं?
क्या जीवन
का कोई लक्ष्य या उद्देश्य है अथवा जीवन एक अहेतुक घटना मात्र है?
उन्नत
प्राणियों के लिये धर्म एक सार्थक सिद्धान्त है उसका एक उद्देश्य है। वह
लक्ष्य निर्धारित करता है और उसके लिये पथ-प्रदर्शन करता है। दर्शन के लिये
कोई धर्म संसार में सम्भव नहीं है। दर्शन इस संसार की व्याख्या करता है
जिसमें हम रहते हैं और उसका कारण भी बताता है। यहाँ हमें समझ लेना चाहिये कि
पूर्व और पश्चिम में दर्शन की मौलिक अवधारणाओं के बीच कुछ मौलिक भेद है।
स्वभाव से
वर्हिमुखी होने के कारण पश्चिमी लोगों का दर्शन बहुत कुछ एक विषयगत विज्ञान
है। पूर्व में दर्शन जीवन का एक दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के अतिरिक्त कुछ और
भी प्रयोजन रखता है क्योंकि आर्य लोग अत्यन्त व्यावहारिक थे। वे चाहते थे कि
दार्शनिकों द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त और आदर्श व्यवहार में आने योग्य होने
चाहिये। अत:
हर दार्शनिक
आदर्श संसार का महिमावान चित्र अंकित करने के अतिरिक्त उस तक पहुँचने
के लिये एक मार्ग निर्धारित करता था और उसका विस्तृत विवरण देना अनिवार्य
समझता था।
जीवन का
दृष्टिकोण इंगित करने वाला दर्शन निश्चय ही वैज्ञानिक होगा किन्तु उसमें
तकनीक का अभाव होगा। तकनीक के बिना विज्ञान बच्चों के पढने के लिये कहानी
मात्र होगा। इस दृष्टिकोण से संसार के सभी धर्मों की परीक्षा करने पर हम
देखते हैं कि सभी वर्तमान धर्मों में हिन्दू धर्म का वेदान्त दर्शन ही एक ऐसे
सुदृढ आधार का केवल वर्णन ही नहीं करता बल्कि वह इस बात का एक संतोषजनक तर्क
भी प्रस्तुत करता है कि यह मूल्य निरपेक्ष और मूलभूत क्यों हैं?
**********
|