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माई लिटिल मास्टर....

  मास्टर ब्लास्टर....

(ब्र. रमन चैतन्य)

   क्या आपने कभी कोई ऐसा व्यक्ति देखा है जिसके चेहरे पर बाल सुलभ मुस्कान हो, निपट भोलापन, निर्मल हृदय और हर क्षण - हर जगह वह प्रसन्नता से भरा रहे ? केवल इतना ही नहीं बल्कि असीम शक्ति से ओत-प्रोत और अनवरत् उत्साह से भरे होने के बावजूद वह महासागर सी गम्भीरता और आकाश की तरह विस्तृत दृष्टिकोण का धनी हो । दिन में करीब-करीब बीस घण्टे काम करने के पश्चात् भी वह सदैव तरो-ताजा व स्फूर्ति युक्त दिखे । किसी को मार्गदर्शन देना है तो कहीं यात्रा, किसी समस्या से निपटना है तो कहीं व्यवस्था ठीक करनी है, किसी की शंका समाधान करना है तो किसी को सहानुभूति, कभी डाँटना है तो कभी दुलारना है । जब वह मिलने वाले व्यक्ति को उसके नाम से सम्बोधित करता है तो आत्मीयता के बोध से वातावरण महक उठता है  और जब वह गहन-गम्भीर विषय की विवेचना करते हुये बिल्कुल प्रासंगिक चुटकियाँ लेता है तो लोगों के ठहाके गूँजने लगते हैं । इतना सब कुछ अपने आप में समेटे हुये भी वह एक सामान्य और साधारण इंसान की तरह व्यवहार करता है । इतनी व्यस्तताओं के बावजूद वह एकदम खाली व फुरसत दिखलाई देता है - न कोई चिन्ता और न परेशानी ।

मैंने तो न केवल ऐसा व्यक्ति देखा है, बल्कि उसके सानिध्य में काफी समय व्यतीत भी किया है । मैंने उसके साथ यात्रा भी की है, अपने सुख-दुःख बाँटे हैं और कभी-कभी अपने प्रश्नों से उसे परेशान भी किया है । परन्तु मुझे उससे पवित्र प्रेम की ठण्डी फुहारों के अतिरिक्त कभी कुछ नहीं मिला। उसके नन्हे कोमल चरणों में बैठकर मैंने न जाने कितना कुछ सीखा है । उसकी दिव्य आभा में सराबोर उन आनन्दमय क्षणों की न विस्मृति संभव है और न वर्णन।

आप सोच रहे होंगे कि ऐसा वह व्यक्ति कौन है? वह कोई और नहीं बल्कि मेरे और हम सबके प्यारे स्वामी तेजोमयानन्दजी हैं - माई लिटिल मास्टर...मास्टर ब्लास्टर ।

कौन कहता है कि पूज्य गुरुदेव स्वामी चिन्मयानन्द जी ने कोई चमत्कार नहीं दिखाया? उनके प्रिय शिष्य स्वामी तेजोमयानन्द जी ही उनके सबसे बडे चमत्कार हैं । मैंने अपने जीवन में इतना विशिष्ट व प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति कोई और नहीं देखा । उनकी महानता की झलक उनके सरल जीवन में दिखलाई पड़ती है । कभी-कभी तो वे इतना ज्यादा सरल और साधारण रहते हैं कि लोगों को धोखा हो जाता है । सांसारिक जगत में लोगों की भीड़ वहीं आकर्षित होती है जहाँ दिखावा, ऊपरी ताम-झाम और बड़बोला पन होता है । जो वास्तव में महान होते हैं वे बहुत सरल और साधारण होते हैं और इसीलिये भौतिकवादी लोग उन्हें पहचान नहीं पाते । स्वामी तेजोमयानन्द जी की तो बात ही निराली है - उनका बाह्य वेष, अभिव्यक्ति व व्यवहार सब कुछ निपट साधारण है । सच पूछो तो वे सरलता के मूर्तिमान रूप हैं ।

सर्व सुलभ

 जब वे किसी विषय को समझा रहे होते हैं तब विचार के क्रमवार विकास में उनकी दक्षता देखकर आश्चर्य होता है। वे बड़ी सहजता से कठिन से कठिन विषय को चुटकुलों व शब्दों के सुन्दर अन्य अर्थों के द्वारा रोचक बना देते हैं । उनके व्याख्यानों में कभी न तो कोई ऊबता है और न ही थकान महसूस करता है । ये व्याख्यान नदी के मन्द प्रवाह की भाँति विद्वानों व भक्तों दोनों को समान रूप से समृद्ध व सन्तुष्ट करने वाले होते हैं ।

मैंने उन्हें संदीपनी में ब्रह्मचारियों से मिलते हुये, यज्ञशाला में गृहस्थों से बात करते हुये, सतसंग में शंका-समाधान करते हुये और शिवरों में गम्भीर साधकों से चर्चा करते हुये बहुत निकट से देखा है । वे हर परिस्थिति में तथा उपस्थिति की अनुकूलता के अनुसार सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं । चाहे बच्चों या युवाओं से बात कर रहे हों या शिक्षकों से, व्यवसायिक मेनेजरों से या ग्रहणियों से, या फिर कमेटी सदस्यों से सब जगह वे बड़ी सहजता से हिल-मिल जाते हैं । इतनी विविधताओं में उनकी एकता देखकर बहुत आश्चर्य होता है ।

स्वाभाविक गुरू

आध्यात्मिक विषयमें उनकी गहरी पकड़ व स्पष्टता अतिविशिष्ट है । किसी भी विषय की शिक्षा ग्रहण करते समय जो बात सबसे महत्वपूर्ण होती है वह है - शिक्षक में विषय की स्पष्टता । मैं तो वेदान्त शास्त्र का विद्यार्थी रहा हूँ और मैंने हमेशा स्पष्टता का आदर, प्रशंसा और पूजा की है। इसीलिये केवल मैं ही नहीं बल्कि हर वह व्यक्ति जो गुरूजी से मिला है और उनके प्रवचनों को सुना है, उनकी स्पष्टता और विशिष्टता का प्रशंसक है । चाहे उनके द्वारा लिखित उपदेश सार की व्याख्या पढिये, आर्थिक समस्याओं पर उनके विचार सुनिये या बच्चों के लालन-पालन पर उनके गहन निष्कर्ष - सभी में उनकी पूर्ण स्पष्टता झलकती है ।

वे माण्डुक्य कारिका और योग वशष्ठि जैसे गूह्य विषय को भी उसी सरलता और सहजता से समझाते हैं जितना श्रीमद्भागवत् गीता और पंचदशी जैसे प्रचलित ग्रन्थों को । उनके द्वारा रस पूर्ण ग्रन्थ रामायण और श्रीमद्भागवत् के भावयुक्त विवेचन की तो बात ही निराली है । श्रोताओं को अत्यन्त सहजता से वेदान्त के उच्च शिखर पर आसीन करने के साथ-साथ भक्ति की दिव्य लहरों से आप्लावित कर देना उनकी विलक्षण प्रतिभा का प्रमाण है ।

उनका आचार्यत्व स्वाभाविक है । वे विराट अर्न्तदृष्टि के धनी हैं । बाह्यरूप में वे जितनी सादगी व सरलता से रहते हैं उतनी ही सरल, सुबोध और तर्कसंगत उनकी शिक्षायें भी होती हैं ।

विरले महात्मा

वे बहुत सुरीली आवाज में भजन पूरे भक्ति भाव से गाते हैं । उनसे परिचित सभी लोग जानते हैं कि वे परम भक्त के साथ-साथ महान ऋषियों शुक व ज्ञानदेव की श्रेणी के ज्ञानी भी हैं । वे करुणा सागर हैं । वे बहुत भावुक हैं परन्तु अन्तरतम की गहराई में जड़ भरत व शिव के समान दृढ़ वैराग्य संजोये रहते हैं ।

भगवान रमण महर्षि के सदृश उनके निकट बैठकर आप दिव्य शान्ति का अनुभव कर सकते हैं। उनमें आदि शंकराचार्य की तरह वेदान्त की प्रमाणिकता सिद्ध करने की क्षमता भी है और बाल सुलभ हास-परिहास की सरलता भी । वे सही मायने में परमहंस हैं ।

बहुमुखी व्यक्तित्व

कल्पना करिये एक व्यक्ति संस्कृत का विद्वान, एक अच्छा शिक्षक, वेदान्त मर्मज्ञ, उच्चकोटि का प्रशासक, प्रबंधक, संगठन कर्ता, जनहित के लिये वृहद चंदा एकत्र करने वाला और पूरे विश्व में सतत भ्रमण कर गुरू के दृष्टिकोण से जन-जन को लाभान्वित करने वाला है । हाँ! ऐसी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं हमारे स्वामी तेजोमयानन्द जी । कितना असाधारण व आश्चर्यचकित करने वाला व्यक्तित्व है उनका ?

एक गाँव का बालक

यह कहानी मध्यप्रदेश के एक छोटे से गाँव में रहने वाले बालक की है । एक साधारण हिन्दी स्कूल में पढने वाला बालक बिना किसी उच्च डिग्री व संसाधनों के व्यक्तित्व की इतनी ऊँचाइयों को छू सकता है क्या संभव है? हाँ! ऐसा हुआ है, परन्तु कैसे हुआ है यह जानना भी हमारे लिये प्रेरणास्पद है । इस गांव के बालक को एक दिन अचानक एक साधु मिल गये । वे एक असाधारण साधु थे और बस यह चमत्कार हो गया । इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि उस साधु ने अंजलि में पवित्र जल लिया और मंत्रोच्चार के साथ बालक को अभिसिंचित करने से कायाकल्प हो गई।

उस बालक ने अन्य वेदान्त छात्रों की तरह साधु की छत्रछाया में कई वर्षों तक गहन अध्ययन किया । उसमें भी अन्य विद्यार्थियों की भाँति प्रारम्भ से ही ईश्वर में अटूट श्रद्धा व भक्ति थी । सभी की तरह वह भी कड़ी मेहनत व लगन से अध्ययन करता । क्या आप जानना चाहेंगे कि उस बालक में ऐसी क्या विशेषता थी जिसने उसे स्वामी तेजोमयानन्द बना दिया ? वह विशिष्ट गुण था -

उसका अपने गुरू के प्रति अटूट प्रेम !

और ......

अपने गुरू के प्रति प्रेम !

और ......

अपने गुरू के प्रति प्रेम !

इसी असीम प्रेम ने उसे अतिविशिष्ट बना दिया । एक साधारण बालक सुधाकर से स्वामी तेजोमयानन्द बन गया और आज अर्न्तराष्ट्रीय चिन्मय मिशन प्रमुख के रूप में अपने परम प्रिय गुरू के संदेश को विश्व के कोने-कोने में पहुँचाने के लिये समर्पित है ।

ज्ञान का प्रकाश

स्वामी जी न तो अपने साथ लेपटाप या मोबाइल फोन रखते हैं और न ही कमंडल या योग दण्ड । उनका यात्रा का सामान एक छोटे सूटकेस में समाया रहता है जो अगले पडाव के लिये हमेशा तैयार रहता है ।

चिन्मय मिशन परिवार कोई छोटा-मोटा परिवार नहीं है । इसमें "243 से अधिक मिशन केन्द्र करीब-करीब विश्व के 20 देशों में फैले हुये हैं " । इसके अतिरिक्त कई आश्रम, मंदिर, शिक्षण संस्थायें, चिकित्सा केन्द्र व सेवा उपक्रम भी हैं जो चिन्मय मिशन के तत्वाधान में संचालित होते हैं । परिवार का मुखिया होने के नाते स्वामी जी बडी कुशलता से इनका प्रबंधन करते हैं । परिवार के सदस्यों के रूप में लगभग 200 आचार्य, जो अलग-अलग पृष्ठभूमि व क्षेत्रों से आये हैं तथा अनगिनित भक्तों के साथ व्यक्तिगत संबंध स्थापित करना और उनकी कुशलता का ध्यान रखना किसी साधारण व्यक्ति के वश की बात नहीं है । स्वामी तेजोमयानन्द जी न केवल इस उत्तरदायित्व को बखूबी निभा रहे हैं बल्कि आश्चर्य की बात यह है कि हर आचार्य और भक्त उनसे निकटता का अनुभव करता है । वे अधिकतर लोगों को नाम से सम्बोधित करते हैं । स्मृति की यह पराकाष्ठा चौकाने वाली है ।

उनमें त्वरित व सही निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता है । नई-नई कार्य योजनायें बनाना और उन्हें पूर्णता के साथ कार्यान्वित करना उनकी विशिष्टता है । गुरूदेव के कार्य व दृष्टि को विश्व के कोने-कोने में पहुँचाने का भागीरथी कार्य जिस सक्षमता के साथ स्वामी जी ने किया है वह असाधारण है । पूर्व वर्षों में सम्पन्न विश्व सम्मेलन उनकी दूरदृष्टि व प्रबंधन का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है । इन सब में जो निराली बात है वह है कि इतना सब कुछ करते हुये भी स्वामी जी हमेशा तरोताजा, प्रसन्न व सहज बने रहते हैं । सब करते हुये भी अकर्ता की स्थिति का वे उत्कृष्ट  उदाहरण हैं ।

हमेशा केन्द्रित

स्वामी जी एक स्थान पर एक हफ्ते से ज्यादा कभी नहीं रुकते । हर हफ्ते किसी नये स्थान या नये देश की तरफ प्रस्थान होता है । एक के बाद एक यात्रा, सुबह-शाम प्रवचन और इनके बीच चलता है बैठकों का सिलसिला, समस्याओं का निराकरण, पत्र व्यवहार, समझाना, प्रेरित करना और सान्त्वना देना। स्वामी जी कभी बच्चों से घिरे रहते हैं तो कभी युवाओं से, कभी बड़ों से तो कभी आचार्यों और ब्रह्मचारियों से । उनका विशाल हृदय सबको समेटे रहता है । उनमें धैर्यपूर्वक दूसरों को सुनने की भी अद्भुत क्षमता है ।

स्वामी जी की दिनचर्या आश्चर्यचकित कर देने वाली है । यदि हम कभी भूल से भी उसकी नकल करने लगें तो महीना क्या हफ्ते भर में ही पागल हो जायेंगे । मैंने स्वामी जी को बहुत निकट से देखा है । वे पूरी एकाग्रता से गुरूदेव के कार्य के प्रति समर्पित हैं । इसके अतिरिक्त उनका ध्यान कहीं और रहता ही नहीं है । मैंने उन्हें न तो कभी दर्शनीय स्थलों का भ्रमण करते देखा और न ही पिकनिक मनाते । चिन्मय मिशन ही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है । गुरू के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा अनुकरणीय है ।

बस चलना .... और चलना

कोई नहीं जानता कि इतनी व्यस्त दिनचर्या में स्वामीजी कितना कुछ दे देते हैं, कितना सहते हैं और कितना क्षमा करते हैं । विभिन्न अनुकूलताओं व प्रतिकूलताओं में वे इतनी सहजता से सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं कि बाहर से देखने वाले कुछ समझ ही नहीं पाते । चाहे कितनी ही बड़ी उलझन हो, निन्दा हो, अवहेलना या अवमानना हो, स्वामी जी के समत्व में सेंध लगाना नामुमकिन है ।

उनमें असीम सहनशीलता है । अपने गुरू के ये शब्द उनके कानों में अनवरत् गूँजते रहते हैं- सब कुछ स्वीकार करो चाहे अच्छा हो या बुरा परन्तु अपने पास संजो कर कुछ मत रखो । प्रशंसा और निन्दा दोनों परिस्थितियों में एक फूटे घड़े की तरह हमेशा खाली रहो । यही कारण है कि वे अच्छा-बुरा सब कुछ वहीं उसी समय झाड़कर आगे बढ जाते हैं । बस आगे....आगे....और आगे। हमेशा मुस्कराते, प्रसन्नचित्त और उत्साहित । हमेशा देने को तत्पर और क्षमा पूर्ण ।

इतना सब कुछ किसलिये....? क्यों.....?

केवल एक ही उत्तर है - अपने गुरू से प्रेम, प्रेम और असीम प्रेम ।

उनकी महानता अवर्णनीय है - एक महान त्यागी, महान दृष्टा और महान शिष्य । हम सब के लिये इतना कुछ करते हुये भी वे हमसे बस एक ही अपेक्षा रखते हैं और वह है - कुछ नहीं । उनका कहना है कि - अपने आप के प्रति सच्चे बनो । गुरू प्रेम से अपने आपको आप्लावित कर दो । जन सेवा में समर्पित जीवन ही सच्चा व सार्थक जीवन है । यह सब कुछ पाने के लिये मत करो बल्कि स्वयं को पूर्णरूप से खिलाने के लिये करो । पूर्ण विकास के लिये । सुगन्धित पुष्प की तरह अपने आस-पास के वातावरण को महका दो । इसी में जीवन की पूर्णता है ।

ऊँ तत्सत्

तपोवन प्रसाद से साभार

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