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ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने के
पूर्व आत्मज्ञान आवश्यक है। आत्मज्ञान श्रुति सम्मत विचार से प्राप्त होता
है। किन्तु विचार करने का भी साधन खोजो तो उसके लिए वैराग्य और गुरु की
आवश्यकता है। विरक्त पुरुष गुरु के पास जाकर अपनी समस्या रखे। गुरु उसे विचार
करने का मार्ग सुझायेगा। इन्हीं साधनों को सरल रूप में शंकराचार्य चार भागों
में बॉट देते हैं - सत्संग,
दान,
विचार और सन्तोष।
सत्संग से गुरु की प्राप्ति
होती है,
दान से वैराग्य आता है,
विचार से आत्मज्ञान और
सन्तोष उत्पन्न होता है। इन चारों साधनों से आत्मा और ब्रह्म के एकत्व का
ज्ञान हो जाता है। इसी को परमात्मा की प्राप्ति या ब्रह्म प्राप्ति कहते है।
सत्संग का तात्पर्य सत्पुरुषों
के साथ रहना है। उनका उपदेश सुनकर और उनका आचरण देखकर आध्यात्मिक जीवन का
ज्ञान होता है। उसी से धर्म मार्ग पर चलते हुए विवेक,
वैराग्य,
षट्सम्पत्ति और
मुमुक्षत्व के गुण आते हैं। उनसे सम्पन्न साधक को सद्गुरु की प्राप्ति हो
जाती है।
दान दो प्रकार का है - भौतिक
सम्पत्ति का और आध्यात्मिक सम्पत्ति का। मुमुक्षु पुरुष को विरक्त होने के
लिए और धन-सम्पत्ति के भार से हलका करने के लिए उसे दीन-हीन मनुष्यों को बॉट
देना चाहिए। सत्संग से जो भी आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो उसे जिज्ञासुओं को
बॉट कर बढाते रहना चाहिए। ज्ञान देने से घटता नहीं बढता ही है। ज्ञान की
परम्परा भी चलती रहती है। उससे लोक कल्याण भी होता है।
विचार से आत्मदेव के दर्शन होते
हैं। इसका मानसिक लक्षण संतोष और तृप्ति है। इसी को बह्म प्राप्ति कहते हैं।
(मणिरत्नमाला से)
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