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लेख

प्रार्थना

( स्वामी सुबोधानन्द जी)

 

      "  अर्थयते अनया इति प्रार्थना "  इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिन शब्दों से हम अपने इष्ट देव के सामने अपनी कामना प्रकट करते हैं उसी को प्रार्थना कहा जाता है । समाज में कई बार ऐसा सुनने को मिलता है कि हमें भगवान से कुछ माँगना चाहिये, उसे निष्काम होना चाहिये, इन वाक्यों से कभी-कभी हमारी अन्तस् चेतना में इस प्रकार की ग्रन्थि का निर्माण हो जाता है कि यदि हमने प्रभु से कुछ मांगने की सोची तो ह्रदय में ग्लानि होने लगती है, जबकि गीता जी में स्वंय श्रीकृष्ण परमात्मा ने ऐसे कामना करने वाले व्यक्ति को भक्त की संज्ञा दे दी है, अर्थार्थी को भी भक्त कहा है और आर्त को भी भक्त कहा है ।

चतुर्विधा भजन्तों मां जना: सुकृतिनोर्जुन ।

  आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।।( गीता)    

उक्त भक्त जब अपनी कामना को प्रभु के सामने रखता है तो एक तो यह कि हमारे प्रभु सर्व समर्थ हैं और वे हमारी कामना पूरी करेंगे, ऐसा निश्चय होता है । जब हमारी कामना पूरी होती है तो वह विश्वास घनीभूत हो जाता है । जिसकी थोड़ी सी पूँजी के रुप में हम प्रभु का सम्मुख हुये थे । अब भगवान की कृपा के कारण ह्रदय में प्रभु से प्रेम का सहज अंकुरण हो जाता है । श्री राम चरित मानस में जानकी जी ऐसे कई चरित्रों में कामना करती हुई देखी जाती है और इसी से हमारे समाज में मनौती की प्रथा पर एक मुहर भी लग जाती है । चाहें वह पुष्प वाटिका में हो या फिर वन गमन में गंगा जी के पार उतर कर सकुशल वापसी पर दर्शन करने के लिये ही मनौती हो । वह कामना समादरणीय है जो भगवान की भक्ति और फिर भगवान तक ले जाती है । सच ही कहा गया है कि सरिता सागर को खोज लेती है और प्रार्थना प्रभु को ।

निष्काम भक्ति तो सकाम भाव का ही प्रतिफलन है, एक परिणाम है । प्रार्थना की तन्मयता का आनंद ही प्रेम है । कुछ या किसी के मिलने या न मिलने से उसका सम्बन्ध फिर खत्म हो जाता है, शेष रह जाता है, प्रेम और समर्पण । 

 महाभारत में द्रोपदी के साथ ऐसा ही हुआ, पाँच पति और पितामह के होते हुए जब उसने अपनी लाज बचाने के लिये प्रभु से कामना की तो उसके कारण द्रौपदी की श्रीकृष्ण से जो प्रेमाभक्ति थी उसकी शरणागति पहले से और अधिक बढ़ गयी।

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  यह लेख चिन्मय मिशन की हिन्दी मासिक पत्रिका "चिन्मय चन्द्रिका" के माह  जनवरी 2004  के अंक में प्रकाशित हुआ था। पत्रिका  डाक द्वारा मंगवाने

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