मुख्यपृष्ठ  

लेख

सांसारिक अनुराग

(परम पूज्य स्वामी तपोवन महाराज)

 

 

 

     इस जगत् में जो कुछ भी है, जहाँ भी है सब ईश्वरमय है । जब किसी साधक को यह परम सत्य उदघाटित होता है तब मैं और मेरा का भाव उसी तरह समाप्त हो जाता है जैसे सूर्य उदय होते ही जुगुनू गायब हो जाते हैं । मैं और मेरा का भाव अज्ञान जनित है इसलिए ज्ञान के प्रकाश में इसका अन्त स्वाभाविक है । जिसे ब्रह्मज्ञान में निहित परमानन्द मिल गया वह अस्थाई और सतही भौतिक सुखों के पीछे क्यों आयेगा ?  

उपाधिग्रस्त परिच्छिन्न आत्मा अर्थात् जीवभाव से मुक्त हो जाने पर सर्वत्र वही एक आत्मतत्त्व परिलक्षित होने लगता है । इस अवस्था में मैं, मेरा और तू तेरा की दुर्भावना से ग्रसत होना सम्भव ही नहीं है । ऐसा साधक तो घर-गृहस्ती, मित्र -सम्बंधी, धन-वैभव और देश-गाँव की सीमाओं को तोड़कर स्वतंत्र पक्षी की तरह आत्मानन्द के विस्तृत क्षितिज में उड़ान भरने लगता है । हर काल में ऐसे साधक होते रहते है और होते रहेंगे जो भौतिकवाद की सीमाओं को जानकर सत्य के अनुसंधान के लिये वैराग्य और विरक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ गये । ये लोग सांसारिक क्रिया-कलाप और व्यवहार से स्वंय को विलग कर लेते हैं किन्तु अन्त:करण के प्रति उदासीन नहीं होते । मन-बुद्धि के परिमार्जन व परिष्करण का प्रयास जीवन पर्यन्त चलता रहता है । पूर्व में ऐसा हो सकता है कि अज्ञानवश वे इन्द्रिय सुख के लिये विषयों के पीछे भागते रहे हों , किन्तु वैराग्य धारण करने के पश्चात वे एकनिष्ठा व समर्पण के साथ अपनी आन्तरिक वृत्तियों से मुक्त होने मात्र के लिये ही प्रयासरत रहते हैं । सन्यासी जीवन पलायनवाद नहीं है । यह वह अवस्था है जब अपने कर्तव्यों का भली भाँति निरवाह करते हुए साधक निवृत्ति मार्ग पर अग्रसित हो जाता है । गौतमबुद्ध, आदिशंकराचार्य, ईसा मसीह और रामानुज जैसे महान सन्त इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं । क्या वे कमजोर और पलायनवादी थे ?    वे महान सन्यासी और युग प्रवर्तक सन्त थे । उनका पूरा जीवन सामाजिक उत्थान, मार्गदर्शन और आत्मसाधना में व्यतीत हुआ । वे पत्थर और चट्टानों की तरह निष्क्रिय कदापि नहीं रहे । किन्तु फिर भी ऐसे महान् सन्त व दिव्य विभूतियों से एक साधारण लकड़हारे और कुएं से पानी भरते मजदूर की तरह शरीरिक परिश्रम की अपेक्षा करते हैं । उनका जीवन तो इससे भी कई गुना ज्यादा महत्वपूर्ण उदेश्यों के लिये समर्पित रहा । योग्यता के अनुरुप कर्तव्य कर्म में भी भिन्नता होती है । इसलिये एक ही मापदण्ड से सभी के कार्यों का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता । सांसारिक राग-द्वेष छोड़कर सन्यासी जीवन की डगर पकड़ना दुष्कर व दुर्गम कार्य है । इसे निष्क्रियता व जड़ता का जीवन समझना अज्ञान है । बल्कि इसके ठीक विपरीत ये सर्वोत्कृष्ट जीवन असीम सक्रियता व अनवरत लोक- संग्रह में व्यतीत होता है ।

सन्यास आश्रम जीवन की चतुर्थ एवं सर्वोच्च अवस्था है । जीवन के परम सत्य का दर्शन कर आत्मानन्द में रमण करना ही सन्यास जीवन का एकमात्र गंतव्य है । सन्यासी जीवन स्वंय ही अन्य साधकों के लिये प्ररेणास्तोत्र बन जाती है। ये सर्वोच्च एवं परम कल्याणकारी अवस्था देवताओं को भी दुर्लभ है । घर बार, सगे सम्बंधियों और मित्रों को छोड़कर ट्रेन में बैठते समय सुब्रमण्यम जीवन की इस सर्वोच्च अवस्था के प्रत्येक पक्ष से पूर्णत: परिचित था । उसने सन्यासी जीवन धारण करने का निर्णय बहुत सोच-विचार करके और अपनी आन्तरिक प्रवृत्तियों के अनुरुप ही लिया था । इसलिये बस कुछ ही क्षणों के लिये छोटे भाई के प्यार व सांसारिक मोह ने उसे झकझोरने की कोशिश की । किन्तु अपनी आन्तरिक दृढ़ता व स्पष्ट धारणाओं के कारण सुब्रमण्यम ने अपने आपको इस मोह से प्रभावित नहीं होने दिया । हमारे ऋषि-मुनियों ने सच ही कहा है कि इस मोह से आवेशित मन अच्छे-अच्छे योग्य साधकों के भी मन हर लेता है । उन्होंने मानव मन का बहुत गहराई से और सूक्ष्म अध्ययन किया था । सांसारिक मोह से उत्पन्न तुच्छ व निर्बल करने वाले विचार उनके मन में भी उठे । कुछ क्षणों के लिये वह अपने प्रियजनों तथा जन्मभूमि के वियोग से व्यथित हो गया । उसकी आँखे भी आँसुओं से भर उठी थी ।

सुब्रमनियम आन्तरिक दृष्टि से बहुत दृढ़ व बलशाली था । सन्यासी जीवन के प्रति उत्साह उसमें कूट-कूट कर भरा था । इसलिये अपने आपको उसने शीघ्र ही सँभाल लिया । किन्तु उस रात उसका मन में बार-बार विरह-वेदना और तरह-तरह के भावोद्वेग उठते ही रहे और वह ईश्वर-चिन्तन के द्वारा इनसे ऊपर उठने का प्रयास करता रहा ।पूरी रात वो सो नही. पाया और अधिकांश समय जप और ध्यान में व्यतीत हुआ । सुबह-सुबह ट्रेन बेंगलौर पहुँची । उसे बेंगलौर में ही उतरना था । बेंगलौर बहुत ही व्यवस्थित सुन्दर और बहुत बड़ा नगर है । सुब्रमनियम दो दिन यहीं रुका रहा । वहाँ भी रामकृष्ण मठ में स्वामी निर्मलानन्द जी से मिला । वे राम-कृष्ण मिशन के बहुत वरिष्ठ सन्यासी थे । उनके साथ आध्यात्मिक साधना व सन्यासी जीवन के संबन्ध में जो विचार विमर्श हुआ वे बहुत लाभदायक था । उन्होंने उत्तर भारत के विभिन्न तीर्थ स्थानों में उपलब्ध निवास व्यवस्थाओं तथा धार्मिक वातावरण के बारे में विस्तृत जानकारी भी दी । ऐसे महान् सन्त का प्ररेणादायी सान्निध्य पाकर सुब्रमनियम को बहुत सन्तोष मिला ।

 बेंगलौर में दो दिन व्यतीत करने के पश्चात वह प्रसिद्ध हरिहर मन्दिर की यात्रा पर निकल पड़ा । इसी सुन्दर मन्दिर को देखने की इच्छा व्यक्त करके वह बड़ी आसानी से गृह त्याग कर सका था । उसके रिश्तेदार व मित्रगण उसकी तीर्थाटन की सहज व स्वाभाविक रुचि से पहले से ही परिचित थे, इसलिये ये कठिन कार्य भी बड़ी सरलता से निर्विघन्न सम्पन्न हो गया । पवित्र तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित यह तीर्थ प्राकृतिक सोन्दर्य से परिपूर्ण है । नदी के पवित्र जल में स्नान कर भगवान की पूजा अर्चना करने में उसे बहुत आनन्द मिला । उसने वहाँ अधिकाँश समय ध्यान व जप में व्यतीत किया । दो दिन हरिहर मन्दिर में रुकने के बाद उसने धीरे-धीरे उत्तर भारत की तरफ बढ़ने का निश्चय किया। ट्रेन से वह पहले पूना पहुँचा फिर वहाँ से नासिक के लिये रवाना हो गया । नासिक एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है । हिन्दू धर्म ग्रन्थ,  "  रामायण " में इसका वर्णन आया है ।

नासिक में पवित्र गोदावरी नदी है जो सीता माता के स्पर्श से महिमामण्डित हुई थी । उसने पावन सलिला में स्नान किया और तट पर स्थित मन्दिर में भगवान रामचन्द्र जी का दर्शन व पूजा की । फिर वह गोदावरी के दोनों तटों पर स्थित कई मन्दिर और मठों को देखने चला गया । शाम को वह पंचवटी देखने गया । यही वह स्थान है जहाँ से दुष्ट रावण ने साधु वेश धारण कर सीता माता का अपहरण किया था । यहाँ की प्राकृतिक छठा बहुत अनुपम थी । सुब्रमनियम का ह्रदय भगवान श्रीराम की पावन कथा का स्मरण कर भक्तीभाव से भर गया । वह बहुत देर तक आनन्द मग्न हो वहीं बैठा रहा ।

पंचवटी नासिक शहर के बाहरी क्षेत्र में स्थित है । सुब्रमनियम नासिक शहर में ही एक मराठा ब्राह्मण के घर में रुका था । वे किसी सरकारी आफिस में कार्य करते थे । पंचवटी के निकट किन्तु शहर की आपाधापी और कोलाहल से दूर एक बहुत सुन्दर व शान्त आश्रम था । यहाँ परम हंस स्वामी ह्रदयनन्द जी रहते थे । वे परम ज्ञानी व बहुत सरल ह्रदय के थे । आश्रमवासियों की संख्या ज्यादा नहीं थी । स्वामी जी ने सुब्रमनियम का बड़े प्यार से अभिवादन किया । उनकी सह्रदयता व स्नेह देखकर सुब्रमनियम को बहुत अच्छा लगा ।उसने निश्चय किया कि कुछ समय ऐसे महान सन्त के सान्निध्य में रहकर ही व्यतीत करेगा । इसलिये दो दिन नासिक शहर में रुकने के बाद वह स्वामी जी से अनुमति लेकर आश्रम में रहने लगा । स्वामी जी के विद्वत मार्गदर्शन में उसने योग-दर्शन, माण्डूक्य कारिका तथा भाष्यों का अध्ययन किया । रोज सुबह-शाम वह पचवटी के पास स्थित वन में विहार के लिये चला जाता और किसी वृक्ष के नीचे ध्यान मग्न हो घण्टों बैठा रहता । जब स्वामी जी से मिलने उनके भक्त और साधक आते तो वह भी स्वामी जी के निकट बैठ कर विभिन्न जिज्ञासाओं और स्वामी जी द्वारा दिये गये समाधान को ध्यान से सुनता । पूरा समय ईश्वर चिन्तन और शास्त्र चर्चा में बड़ी सार्थकता के साथ व्यतीत हो रहा था । आध्यात्मिक साधना, वेदान्त अध्ययन और सन्त महात्माओं के सत्संग में उसने अपने आपको इतना तबदील कर लिया था की अपने सगे-समबंधियों व मित्रों से बिछुड़ने का विचार फिर कभी मन में नहीं आया ।            

            

**********    

  यह लेख चिन्मय मिशन की हिन्दी मासिक पत्रिका "चिन्मय चन्द्रिका" के माह  जनवरी  2003 के अंक में प्रकाशित हुआ था। पत्रिका  डाक द्वारा मंगवाने

 के लिए यहाँ क्लिक करे।