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संसार समुद्र से उद्वार का उपाय

(परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द)

     हर मनुष्य सुख, सुरक्षा और स्वतंत्रता चाहता है। और उसके लिए आजीवन प्रयास भी करता है, किन्तु जीवन के अन्त में भी वह अपने को जहॉ का तहॉ पाता है। वह दु:खरहित आनन्द की अवस्था में नहीं पहुँच पाता। किसी भी दशा में उसे सुरक्षा और स्वतंत्रता का अनुभव नहीं होता। सब के सामने यह प्रकट सत्य है। अन्तर केवल इतना दिखाई देता है कि कुछ लोग असुविधा के साथ दु:, असुरक्षा और परतंत्रता भोगते हैं। सृष्टि के आदि काल से मनुष्य के सामने यह चुनौती रही है। यह समस्या सार्वभौमिक है। इसलिए सभी देशों के विद्वानों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और समस्या का निधान खोजने में व्यस्त रहे हैं। उसके फलस्वरूप नाना प्रकार के दर्शन और धर्मों का उदृभव हुआ।

भारत के प्राचीनकालीन ऋषियों ने इस चुनौती को स्वीकार कर जो प्रयास किये, वे सब से अधिक सराहनीय हैं। उन्होंने जीवन का वह सुनिश्चित मार्ग खोज लिया जिस पर चलकर विश्व का कोई मनुष्य समस्त दु:खों से छुटकारा पा सकता है। ऋषियों का मत है कि मनुष्य की सभी समस्याओं की जड अपने आत्मस्वरूप का अज्ञान है। अपने आपको भूलकर वह अपने शरीर को ही आत्मा मान लेता है और शरीर से उत्पन्न होने वाली समस्याओं में वह फॅस जाता है। देहाभिमानी मनुष्य का मन राग-द्वेष से ग्रस्त हो जाता है और उससे प्रभावित मन एक काल्पनिक संसार की रचना कर लेता है। जैसे सोते समय मनुष्य स्वप्न की रचना कर उसे सत्य मानता है, उसमें होने वाले लाभ-हानि से सुखी-दु:खी होता है, वैसे ही जाग्रत अवस्था में वह अपना काल्पनिक संसार रचता है, उसे सत्य मानता है और उसके सुख-दुख से पीड़ीत रहता है। संसार हर मनुष्य की व्यक्तिगत रचना है। वह जगत् से भिन्न है। जगत् ईश्वर की रचना है और सब प्राणियों के लिए एक समान उपलव्ध है। हर व्यक्ति उस जगत् को अपने राग-द्वेष की दृष्टि से देखता है और उसे वहॉ अपना संसार दिखाई देता है। इसे स्पष्ट करते हुए अपनी पुस्तक आत्मबोध में शंकराचार्य कहते है -

संसार: स्वप्नतुल्यो हि रागद्वेषादिसंकुल:

स्वकाले सत्यवदृभाति प्रबोधे सत्यसदृभवेत् ।।

संसार स्वप्न के समान है। वह रागद्वेषादि से युक्त है। अपने समय में वह सत्यवत् भसित होता है, किन्तु जागने पर असत् हो जाता है।

संसार से जागने का तात्पर्य है संसार से निवृत्त हो जाना और मनुष्य का जगत् से सीधा संबंध बन जाना। यदि जगत् को इश्वर की रचना और उसी की वस्तु मान कर हम व्यवहार करते रहें तो हमारे सुख-दु:ख की कोई समस्या नहीं रह जाती। जब तक हम संसार में घिरे हैं, हमारी स्थिति वही है जैसे किसी समुद्र में डूब रहे हों, या कुऍ में गिर गये हों या किसी शिकारी के जाल में फॅस गए हों। इस दु:खदायी संसार से बाहर निकल जाना ही मुक्ति है।

इतना सब जान लेने पर सम्भव है कि हम संसार समाप्त कर मुक्त होने का प्रयास करने लगें, किन्तु देखेंगे कि यह कार्य इतना सरल नहीं है। संसार हमारी मानसिक कल्पना है किन्तु हम उसे सहसा नष्ट नहीं कर सकते। इसलिए अनुभवी सदृगुरु से पूछना पडता है कि इससे मुक्ति कैसे मिले ?

गुरु का कथन है कि जैसे समुद्र  से पार जाने के लिए जहाज उपयोगी है वैसे ही हमें संसार से पार होने के लिए इश्वर के चरण-कमलों का सहारा लेना चाहिए। "विश्वेश" विश्व का ईश अर्थातृ स्वामी है। उसने अपनी माया शक्ति से जगत की रचना की है और प्राणियों के शरीर में प्रविष्ट हो कर वही जीव बना है। वह जीव और जगत् दोनों का नियन्ता है। यदि हम अपने आप को ईश्वर से जोडते हैं तो संसार से हमारा सम्बन्ध समाप्त हो जाता है। जैसे हम धन-सम्पत्ति और परिवार पर आश्रित रहते हैं, उसे सत्य मानते हैं और उससे अपनी सुरक्षा समझते हैं, वैसे ही हम अपने हृदय में चिदानन्द रूप में विराजमान परमात्मा को ही सत्य समझें, उसी को सुखस्वरूप माने और उसी पर आश्रित रहें। इसी में हमारा निस्तार है।

(मणिरत्नमाला से)

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