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जीवन
में यह प्रथम अवसर था,
जब भिक्षा
माँग कर अन्न ग्रहण करना था और शायद नये होने के कारण पहले ही दिन असफलता हाथ
लगी। अन्तत:
उसे भिक्षुओं के चल रहे एक अन्न क्षेत्र से अपनी क्षुधा शान्त करनी पडी।
भिक्षा मांगते समय कुछ क्षणों के लिये वह हतोत्साहित भी हुआ उसे लगा जैसे वह
पेशेवर भिखारियों की जमात में शामिल हो गया है। किन्तु अगले ही क्षण उसने
अपने आपको सँभाल लिया। उसने विचार किया कि भिक्षा ग्रहण करने की प्रथा उच्च
कुल,
योग्यता और
विद्वता जैसे अभिमानपूर्ण भावों से मुक्त होने में सहायता करती है परन्तु कई
बार बजाय विनम्रता व सरलता आने के सन्यासी स्वयं को परमहंस और अति-विशिष्ट
समझने लगते हैं। उनसे अनजाने में जन-सामान्य की उपेक्षा होने लगती है। साधक
का अहंकार बजाये घटने के दिनों-दिन बढने लगता है। इसलिये एक तरफ हीन भावना और
दूसरी तरफ विशिष्टता या उच्चता का गर्व दोनों घातक हैं और अवरोध उत्पन्न करते
हैं। सच्चे साधक को दोनों से बचना चाहिये।
यद्यपि
त्यागानन्द ने परमहंस के उच्चतम व असाधारण पद को प्राप्त कर लिया था,
किन्तु फिर भी वह पहले की तरह सरल और सहज था। वह सभी के साथ बिना किसी भेदभाव
के बडी विनम्रता व आदर के साथ व्यवहार करता था। उसने अपने मन को अहंमन्यता से
कभी मलिन नहीं होने दिया। वह जितना आदर और सम्मान साधु-सन्यासियों का करता था
उतना ही गृहस्थों का भी। धर्म की भिन्नता और सामाजिक स्तर के कारण उसके
व्यवहार में कोई अन्तर नहीं आता था। चाहे कोई बौद्ध,
जैन,
क्रिश्चियन या इस्लाम धर्म का अनुयायी हो या फिर भक्त,
सन्यासी या गृहस्थ सभी के प्रति उसका आदर एक समान रहता था। त्यागानन्द के
अनुसर एक सच्चा सन्यासी विवेकशील,
विरक्त,
इन्द्रिय-निग्रह से सम्पन्न,
प्रसन्नचित्त,
प्रेम
अहिंसा,
सन्तोष व
भक्ति से परिपूर्ण होता है। उसमें आध्यात्मिक व लौकिक दोनों व्यवहारों की
निपुणता रहती है। धर्म,
सम्प्रदाय
और जाति से निरपेक्ष सभी लोग उसकी वन्दना करते हैं। उसके विचार में अपने-अपने
धर्म को दूसरे की तुलना में ज्यादा श्रेष्ठ निरूपित करना मन्द-बुद्धि का
कार्य है। इन्हीं दुर्बुद्धिपूर्ण विचारों के कारण समाज में द्वेष बढता है,
जिसके कारण साम्प्रदायिक दंगे व खून-खराबा होता है। स्वामी त्यागानन्द जी इस
सच्चाई को भली-भाँति जानते थे और इसीलिये प्रारम्भ से ही सर्वधर्म व परस्पर
सद्भाव के प्रबल समर्थक रहे।
चलिये! अब
हम अपने मूल कथानक पर वापस आ जाते हैं। पवित्र नर्मदा जी के किनारे अपने जीवन
की एकमात्र अभिलाषा को सानन्द पूर्ण कर त्यागानन्द वापस जबलपुर आया और ट्रेन
से प्रयाग के लिये रवाना हुआ। तीन पवित्र नदियों के संगम में उसने विधिपूर्वक
स्नान किया और फिर गंगा जी के पवित्र तट पर बैठकर श्रद्धा व भक्ति के साथ
भगवान् की स्तुति व जप करने लगा। उसका मन बडी सरलता से एकाग्र हो गया और वह
शीघ्र ही समाधिस्थ हो गया। संगम तीर्थ बडे-बडे ऋषियों की तपस्थली रहने के
कारण दिव्यता से दैदीप्यमान हैं। स्थान की पवित्रता व दिव्यता के योगदान से
दुःसाध्य समाधि की अवस्था शीघ्र व सहज ही प्राप्त हो जाती है। अपने नित्य
कर्मों से निवृत होकर वह नदी के दूसरे तट पर चला गया। वहाँ पर एक सन्यासी मठ
में उसने पाँच छः दिन भजन पूजन करते हुए बिताये।
मठ में रहते
हुए उसकी भेंट एक चित्रकार से हुई जो प्रतिकृतियाँ बनाने में निपुण था। उसने
सन्यासी वेष में अपनी भी एक प्रतिकृति बनवाई और उसे अपने घर भेज दी। उसके
पूर्वकाल के अनेक छायाचित्र घर पर थे इसलिये उसने विचार किया कि सन्यासी वेष
में भी एक चित्र होना चाहिये। चित्र के साथ उसने अपने छोटे भाई को एक प्यार
भरा पत्र भी लिखा ताकि वियोग की पीडा कुछ कम हो सके। उसने लिखा
"केवल
ईश्वर की कृपा से ही कोई विरला साधक ऐसे महिमापूर्ण सन्यास जीवन को धारन
कर पाता है।
यह जीवन विलक्षण प्रतिभा से सम्पन्न साधकों के लिये ही सुलभ है। यदि मुझे
सन्यासी बनने का सौभाग्य मिला है तो निश्चित ही यह ईश्वर की महान अनुकम्पा व
पूर्वजन्म के पुण्यों का प्रतिफल है। इसलिये न तो किसी प्रकार की चिन्ता करो
और न दु:ख।केवल
मूर्ख ही ऐसी उत्कृष्ट व महान् उपलब्धि पर अज्ञानवश दु:ख
करते हैं। वर्षों से मेरे अन्दर सन्यास वरण करने की तीव्र इच्छा थी और इसी के
अनुरूप मैने कठिन साधना करके स्वयं को तैयार किया था। अपने लक्ष्य को प्राप्त
कर मैं अति प्रसन्न हुँ। मैं आशा करता हुँ कि तुम व अन्य सम्बन्धी भी मेरी इस
उपलब्धि पर प्रसन्न होंगे। उनसे कहो कि मेरे बारे में व्यर्थ की चिन्ता व दु:ख
त्याद दें। तुम भी अब मेरे बारे में विचार करना छोड दो और व्यर्थ ही मेरे
बारे में पता लगाने का प्रयास मत करना। अपने जीवन को पूर्णता के साथ व्यतीत
करने का प्रयत्न करो। सत्यनिष्ठा के साथ स्वधर्म का पालन करते हुए प्रत्येक
को अपने कर्तव्य-कर्म करने चाहिए। ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण व विश्वास के
साथ कर्तव्य-कर्म करने से ही जीवन सफल होता है।"
स्वामी जी
ने पत्र व्यवहार का क्रम रोकने के उद्देश्य से पत्र में अपना पता नहीं दिया।
इसके पश्चात फिर कभी उन्होंने घर का विचार नहीं किया। उन्होंने कभी यह भी
जानने का प्रयत्न नहीं किया कि पत्र व चित्र मिलने से घर के सदस्य का दुःख कम
हुआ या फिर और अधिक बढ गया।
प्रयाग में
पाँच छः दिन रुकने के बाद स्वामी जी ट्रेन से अयोध्या चले गये। पवित्र सलिला
सरयू के तट पर बसी यह पावन भूमि कभी भगवान श्रीराम व माता सीता के पवित्र
चरणों से धन्य हुई थी। यहाँ का पवित्र वातावरण व प्राकृतिक सौन्दर्य सहज ही
भगवान श्रीराम की कथा का स्मरण करा देता है। इस मनोरम तीर्थ में सुन्दर
मन्दिर आश्रम सन्त-महात्माओं की उपस्थिति व भक्तों की बहुलता देखकर
त्यागानन्द का हृदय आनन्द से भर गया। यहाँ पर रामानन्द सम्प्रदाय के एक भव्य
व सम्पन्न आश्रम में ठहरने का अवसर मिला। इस आश्रम में वैष्णव भिक्षु रहते
थे। आश्रम के महन्त बहुत उदार व सरल हृदय थे। उन्होंने बडे प्रेम व सम्मान से
स्वामी त्यागानन्द को आश्रम परिसर में स्थित एक मकान में ठहराया। वास्तव में
यह सभी सुविधाओं से युक्त एक आलीशान बँगला था तथा इसके चारों ओर बहुत सुन्दर
बगीचा था। पूरा बँगला खाली पडा था। इसका एक हिस्सा ऐसा था जो बाहरी शोर-शराबे
व चहल-पहल से दूर बिल्कुल एकान्त में पडता था। त्यागानन्द ने अपना अधिकांश
समय इसी हिस्से में ईश्वर-चिन्तन में निमग्न हो व्यतीत किया। प्रत्येक सुबह
वह सरयू में स्नान करके वहाँ स्थित विभिन्न मन्दिरों में भगवान् की
पूजा-अर्चना करता और शेष समय वहीं स्थायी रूप से रह रहे साधु-सन्तों व
धर्मपरायण नागरिकों के साथ सत्संग में बिताता। अयोध्या में भक्तिभाव की
परिपूर्णता थी। सभी भगवान् राम व सीता जी की भक्ति में ओत-प्रोत बहुत आनन्द
के साथ जीवन व्यतीत कर रहे थे। यहाँ पर त्यागानन्द को बाहर भिक्षा के लिये
नहीं जाना पडता था। महन्त जी ने भोजन की सुव्यवस्था आश्रम मे ही कर रखी थी।
महन्त जी के
मार्गदर्शन में एक संस्कृत विद्यालय भी चलता था। विद्यालय के प्राचार्य
दर्शनशास्त्र में बहुत रुचि रखते थे। वे बहुत निकृष्ट व मतावलम्बी थे। जब
उन्हें पता चला कि कोई परमहंस सन्यासी आश्रम में ठहरे हुए हैं तो वे तत्काल
मिलने चले आये। उनका उद्देश्य सन्यासी की योग्यता की परीक्षा ही मुख्य था।
परस्पर अभिवादन के पश्चात प्राचार्य जी स्वामी जी के निकट बैठ गये और धार्मिक
चर्चायें करने लगे। कहते हैं-
"बोद्धारो
मत्सरग्रस्ता:"
अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति ईर्ष्या से ग्रस्त होते हैं। यह कहावत हमेशा की
तरह आज भी सटीक है।
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