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लेख

शंकराचार्यजी एक महान् धर्म - प्रचारक

(परम पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द)

 

 

 

      पिछले कुछ सालों से " शंकराचार्य जयन्ती " मनाने की प्रथा बढ़ रही है । अब यह भारत का राष्ट्रीय त्योहार होता जा रहा है । दिल्ली के प्रबुद्ध सरकारी अधिकारियों के बीच यह त्योहार मनाया जाता है, वैसे ही कलकत्ते के उद्योगपति इसे मनाते हैं । मुम्बई के व्यापारी और मद्रास तथा केरल के बहुत लोग इसे मनाते हैं । दक्षिण के केप कुमारी से उत्तर भारत तक गाँव-गाँव में शंकराचार्य जयन्ती हर वर्ष मनायी जाती है। 

 

एक में सब

           हिन्दू दर्शन के अध्येता दर्शन में शंकराचार्य जी का योगदान की उपेक्षा नहीं कर सकते । शंकराचार्य जी ने इतने भक्ति स्तोत्र लिखे हैं कि कोई भक्त भी उन्हें भुला नहीं सकता । आत्मज्ञान का कोई जिज्ञासु शंकराचार्य की सहायता के बिना अपनी यात्रा पर आगे नहीं बढ़ सकता । शंकराचार्य जी ने इस विषय पर अपने ग्रन्थों में बहुत कुछ लिखा है। उनके अनुसार साधक अपनी पूर्णावस्था में आत्मा -परमात्मा के एकत्व का अनुभव करता है। समस्त उपनिषदों के भाष्य में उन्होंने यही सिद्ध किया है ।

  उनके जीवन की मुख्य शिक्षा 

    शंकराचार्य जी  के जीवन में एक ही लक्ष्य रहा और सारे जीवन उसी कार्य में लगे रहे, वह था धर्म-प्रचार का उत्साहपूर्ण कार्य । उसी के लिये उन्होंने भाष्य लिखे, स्तोत्र रचे, शास्त्रार्थ किये और अपने बत्तीस वर्ष के छोटे से जीवन का प्रत्येक क्षण इसी कार्य के लिये लगा दिया । हमारे देश में इस लक्ष्य को अधिक महत्व नहीं दिया गया है । अद्वैत वेदान्त के अनेक मन्त्र हैं, किन्तु अधिक श्रद्धा और भक्ति के साथ यह कार्य नहीं किया जा रहा है।

   समन्वय की दृष्टि                       

 वेदों की रचना के विषय में हिन्दुओं में दो विचारधारायें प्रचलित हैं । एक सम्प्रदाय का विश्वास है कि यह अमर साहित्य ईश्वर कृत है और दूसरा सम्प्रदाय कहता है कि वेद ऋषि - प्रोक्त है ।

यदि हिन्दुओं के वेद ईश्वर कृत हैं तो वे निश्चय ही अमर और शाश्वत हैं और यदि उन पर कोई संकट आता है तो उनकी रक्षा का दायित्व ईश्वर पर ही है । किन्तु यदि यह माना जाता है कि वेद ऋषि -प्रणीत हैं तो समाज पर यह दायित्व आता है कि वही उनकी रक्षा करे । अधिक से अधिक लोग वैदिक धर्म का पालन करे और समाज  में उसका प्रचार करें । शंकराचार्य ने अपने जीवन में प्रथम मत को स्वीकार किया । भारत उसी को आदर्श मानकर उसका अनुसरण करे ।

धर्म-प्रचारक शंकराचार्य जी  ने वैदिक ज्ञान को समझा और उसके मर्म को जाना । वे निरन्तर उसी ज्ञान के प्रकाश में जीवन जीते रहे और उसी की शिक्षा देते रहे । उन्होंने सिद्ध कर दिया कि हमारे राष्ट्रीय जीवन का आधार यही पवित्र दर्शन है । यह कहीं बाहर से उधार नहीं लिया गया है वरन् भारतीय मनीषियों की उपज है ।

हमारी आवश्यकता

यह मिथ्या धारणा है कि केवल औद्योगिक विकास से ही राष्ट्रीय जीवन की संरचना हो सकती है । कृषि या औद्योगिक उत्पादन बढ़ जाने से ही सच्ची सम्पन्नता नहीं आ जाती । बड़े आर्थीक ज्ञान से उत्पादन करने और सम्यक् वितरण कर देने से न मनुष्य सुखी हो सकता है और न ही समाज संघठित । उसके लिये देशवासियों को उचित ढँग से जीवन जीने का विधान अपनाना होगा । जब इतिहास के किसी युग में लोग किसी निश्चित विधि से दार्शनिक जीवन जीते हैं तो वही उनकी संस्कृति बन जाती है । इस दृष्टि से देखने पर ज्ञात होता है कि शंकराचार्य जी ने जो धर्म- प्रचार का कार्य किया उसके मूल में अपने देश के सांस्कृतिक उत्थान की योजना किस प्रकार सन्निहित थी ।

भूतकाल का योगदान

भारत के सच्चे पुत्र होने के नाते हमें शास्त्रों का तर्क ठीक से समझ में आ जाना चाहिये । उसके अनुसार हम जीवन जियें और उससे प्राप्त होने वाले अपने आन्तरिक विकास का अनुभव करें । उस अनुभव के आधार पर शास्त्रों की व्याख्या करें और आगे आने वाली पीढ़ी को उसकी शिक्षा दें । अपने पूर्वजों के द्वारा हमारे हाथ में दी गई ज्ञान -ज्योति को हम प्रज्ज्वलित रखते हुए अगली पीढ़ी के हाथों में  सौंप जायें । जीवन जीने के परीक्षित विधान के अनुसार स्वंय जीवन जीने का संकल्प जितना प्रबल होगा सामाजिक सम्बन्धों के प्रामाणिक मूल्यों की और यथार्थ जीवन के उच्च मूल्यों की जितनी ही रक्षा होगी, राष्ट्र के सांस्कृतिक जीवन को जितनी ही समझदारी के साथ संवारा जायेगा, उतना ही हमें अपने पूर्वजों का योगदान प्राप्त होगा । उसी के बल पर हमारी योजनायें बनेंगी, सफलता प्राप्त होगी और राष्ट्र का भावी गौरव उज्जवल होगा ।

      यदि शंकराचार्य जी ने इतने उत्साह से धर्म -प्रचार न किया होता तो अब तक हिन्दू धर्म गढे में चला गया होता । नाना प्रकार के कुतर्क उसे नष्ट कर देते । शंकराचार्य जी ने ही अपने समय में उत्पन्न नाना प्रकार के अंधविश्वासों की जड़े उखाड़ फेंकी और ऋषियों के प्राचीन दर्शन की पुन: स्थापना की ।

शंकराचार्य जी की तकनीकि  

                  शंकराचार्य जयन्ती के अवसर पर राष्ट्र को भारतीय संस्कृति के गंभीर अध्ययन की आवश्यकता समझनी चाहिए । हम सबका कर्तव्य है कि जो कुछ हम जानते हैं वह हम अपने आस-पास के लोगों को बतावें, केवल शब्दों से नहीं वरन् अपने कर्मों की शुद्धता से, अपने त्याग से, अपने प्रेम से और अपने जीवन के उज्जवल रुप से उन्हें प्रभावित करें ।

देश में मानवीय मूल्यों का पुनरुद्धार करने के लिये इससे अच्छी कोई तकनीक नहीं हो सकती, हम इसे " शंकर तकनीक " कह सकते हैं ।

 हमारे देश के सांस्कृतिक इतिहास में वही परम् पवित्र क्षण होगा जब भारत के स्वंय निष्कासित पुत्र वापस आकर भारतीय जीवन -दर्शन का आनन्द लेंगे । हिन्दू धर्म के प्रथम सशक्त प्रचारक आदि शंकराचार्य जी के प्रति यही हमारा सर्वोत्कृष्ट अभिनन्दन होगा ।

एकमात्र उपचार  

   शंकराचार्य जी को अपने सामने कोई कठिनाई बड़ी नहीं प्रतीत होती थी । उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य सत्य का ज्ञान सबके ह्दय में स्थापित कर देना था । उन्होंने अपने देश को ही नहीं वरन् समस्त जगत को यही शिक्षा दी कि जीवन एक है और वह सब अवस्थाओं में सर्वत्र और सदा विद्यमान है । ऐसे समर्पित आचार्य को ईसी बात में सन्तोष हो सकता है कि समाज में सब लोग एक लय के साथ जीवन जीयें । वही हमारे आदर्श और पथ-प्रदर्शक होने चाहिए । हमारे कन्धों पर यह दायित्व आता है कि हम उनकी शिक्षा विश्व के कोने -कोने में पहुँचाये । वर्तमान में समस्त विश्व अशान्त है, अपनी ही रची हुई समस्याओं से ग्रसित और दु:खी है । हमारे इस अंधकारपूर्ण परमाणु युग में शंकराचार्य जी का दर्शन ही एकमात्र उपचार है, जिसके प्रचार से विश्व में शान्ति और एकता स्थापित की जा सकती है ।

 

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  यह लेख चिन्मय मिशन की हिन्दी मासिक पत्रिका "चिन्मय चन्द्रिका" के माह  मई  2003 के अंक में प्रकाशित हुआ था। पत्रिका  डाक द्वारा मंगवाने

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