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पार्वती जी
शंकर जी की महिमा का बखान करते हुये बहुत विनम्रता व श्रद्धायुक्त भाव से
विनती करती हैं कि - हे सुखराशि भगवान ! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं और हमको
वास्तव में अपनी दासी समझते हैं तो कृपा कर भगवान श्री राम की विविध कथाये
सुनाकर मेरा अज्ञान दूर करें
(जौं
मो पर प्रसन्न सुखरासी
..........दो.
108)
। पार्वती जी ने हृदय की सरलता और अपार श्रद्धा से पूर्ण होकर जो प्रश्न किये
थे उनसे शंकर जी प्रसन्न हो गये ।
इस प्रसंग
में शंकर जी जो मुख्य बात समझाते हैं वह है कि -
"परमात्मा
एक ही है"।
निर्गुण भी वही है
,
सगुण भी वही
है । बुद्धि में भले ही यह शंका लगे कि दोनो एक कैसे हो सकते हैं,
परन्तु सत्य तो यही है कि निर्गुण निराकार परमात्मा सदा विघमान रहने वाला है
और उसी ने रामरूप में अवतार लिया है । इसलिये जब भगवान राम की लीलाओं को
सुनें तो निगुर्ण रूप को भूल न जायें । यह सतत स्मरण रखें कि वही निर्गुण
ब्रह्म सगुण रूप होकर यहाँ पर इस प्रकार की लीलायें कर रहा है।
शंकरजी
बताते हैं-
सगुनहि
अगुनहि नहिं कछु भेदा । गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा ।।
अगुन अरूप
अलख अज जोई । भगत प्रेम बस सगुन सो होई।।
.......
दोहा
116
शंकर जी जो
बात समझा रहे हैं वह रामचरितमानस का मुख्य संदेश है और वहीं वेदों का सार भी
है । वे कहते हैं - परमात्मा दो हों अर्थात् निर्गुण अलग हो और सगुण अलग हो,
ऐसा नहीं है । मुनि लोग बार-बार यही उपदेश करते हैं,
पुराणों व वेदों में भी ऐसा ही कहा गया है और ज्ञानवान व्यक्ति भी यही कहते
हैं कि निर्गुण व सगुण में कई भेद नहीं
,
दोनो एक ही
है ।
जो अगुण है
वह अरूप भी है । इसलिये वह इन्द्रियगोचर भी नहीं है अर्थात्
“अलख”
है । उसका जन्म होने का प्रश्न ही नहीं उठता
,
वह
"अज"
है ,
अनादि
अनन्त है । वही परमात्मा भक्तों के प्रेम के कारण सगुण रूप धारण कर लेता है ।
कोई कहे कि निर्गुण निराकार होकर परमात्मा जब सर्वत्र विद्यमान है तो सगुण
रूप क्यों धारण करता है
?
इसका उत्तर
है कि - जैसे एक बहुत धनी अभिनेता भी नाटक में भिखारी का अभिनय इसलिये करता
है कि लोग उसके अभिनय को पसन्द करें । ऐसे ही निर्गुण निराकार बह्म सगुण रूप
इसलिये धारण करता है कि उनके भक्तों को उनकी लीलायें बहुत अच्छी लगती हैं ।
सगुण
परमात्मा आकार सहित है
,
इन्द्रिय
ग्राह्म है और जन्म लेता (प्रगट होता ) है । अगुण व सगुण दोनो के लक्षण
विपरीत होते हुये भी दोनो एक ही है । इस बात को समझने के
लिये
अन्तर्मुखी बुद्धि चाहिये । बहिर्मुखी बुद्धि इस विपरीत बात को समझ नहीं
पायेगी । जो निर्गुण है वही सगुण कैसे है
?
इसे समझाते
हुये शंकर जी कहते हैं कि यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे पानी व बर्फ । पानी
बिना आकार का है और बर्फ का आकार होता है । पानी कठोर नहीं है
,
लेकिन बर्फ
कठोर है । बर्फ और पानी में तत्वतः अंतर कुछ नहीं है,
दोनो पानी ही पानी है । पानी ने ही एक रूप धारण किया तो बर्फ बन गया । ऐसे ही
परमात्मा जो बिना आकार का (अरूप) है उसने अवतार के रूप में आकार धारण किया तो
सगुण बन गया । कितने ही काल तक अवतार की लीलायें की उसके बाद रूप मिट कर के
फिर निर्गुण रूप में आ गया । लेकिन निर्गुण ब्रह्म सारा का सारा सगुण नहीं बन
जाता । उस परमात्मा का मानो एक अंश सगुण रूप में प्रगट हुआ । परब्रह्म
परमात्मा तो सदा निर्गुण रूप में सर्वत्र विद्यमान रहता है । इसलिये कहा गया
है कि सगुण व निर्गुण में कोई भेद नहीं है
,
दोनो एक ही
हैं ।
भगवान राम
सच्चिदानन्द स्वरूप हैं । सत्
,
चित और
आनन्द ये तीनों लक्षण
निर्गुण ब्रह्म के कहे जाते हैं । तीनों लक्षण एक दूसरे
पर आश्रित हैं- जो सत् स्वरूप है उसी में चेतना है और बिना चेतना के आनन्द
नहीं हो सकता । इस प्रकार ये तीनों लक्षण एक ही समझो । जैसे सूर्य सबको
प्रकाशित करता है
,
ऐसे ही
परमात्मा सारे जगत को प्रकाशित करता है । परमात्मा चेतन स्वरूप है और चेतना
से ही जगत का ज्ञान होता है । जैसे सूर्य में कभी अंधकार नही होता ऐसे ही उस
परमात्मा को कभी अज्ञान नहीं होता । भगवान सहज प्रकाशरूप है । सूर्य जैसे सदा
एक समान स्वयं चमकता रहता है
,
ऐसे ही
भगवान राम स्वयं प्रकाश चैतन्य है । जहां अज्ञान रूपी रात्रि असंभव है वहाँ
विज्ञान रूपी सवेरा कहना भी अप्रासांगिक है । भगवान तो नित्य ज्ञान स्वरूप है
।
हर्ष
,
शोक
,
अज्ञान
,
अहंता
और अभिमान ये सब जीव के धर्म हैं । परमात्मा या भगवान राम तो ज्ञान स्वरूप
हैं । जीव भाव अज्ञान के कारण है । जब तक जीव भाव रहेगा तब तक उसके साथ ये
समस्यायें (हर्ष
,
विषाद आदि)
रहेंगी । अज्ञान मिटते ही जीव भाव समाप्त हो जायेगा और वास्तविक स्वरूप
(परमात्म स्वरूप) प्रगट हो जायेगा । परमात्मा तो सम्पूर्ण जगत का अधिष्ठान है
। जितनी भी चराचर सृष्टि है सब उसी का स्वरूप है और सारे जगत का स्वामी है ।
जैसे मिट्टी से घर उत्पन्न होता है । घर का स्वामी मिट्टी है क्योंकि मिट्टी
के बिना घर रह ही नहीं सकता । इसी प्रकार समस्त जगत परमात्मा पर आश्रित है ।
वह पूरे जगत का स्वामी है ।
जैसे आकाश
में बादलों का पर्दा देखकर अज्ञानी लोग कहते हैं कि बादलों ने सूर्य को ढक
लिया है । सूर्य तो इन बादलों से लाखों गुना बडा है फिर ये उसे कैसे ढक सकतें
है । वास्तव में बादल हमारी आँखों को ढक लेते है । और हमें ऐसा प्रतीत होने
लगता है जैसे बादलों ने सूर्य को ढक लिया है । इसी प्रकार मोह जीव को आवृत्त
कर लेता है और उसे ईश्वर की अनुभूति नहीं हो पाती । ईश्वर तो अपने स्थानपर
साफ चमाचम सूर्य के समान विद्यमान है । वह सदा सत्स्वरूप
,
ज्ञान
स्वरूप व आनन्द स्वरूप में नित्य उपलब्ध है । मोह का प्रभाव उस पर नहीं पडता
। जीव व परमात्मा के बीच मोह का व्यवधान है । यदि मोह हट जाये तो परमात्मा
बिल्कुल जैसा है वैसा अनुभव में आ जाता है ।
यदि आँख
में उंगली लगा लो तो एक के स्थान पर दो-दो चन्द्रमा दिखाई देने लगते है । ऐसे
ही मोह के कारण लोगों को निर्गुण व सगुण अलग-अलग दो परमात्मा दिखाई देते है ।
परमात्मा तो एक अद्वितीय है । हे पार्वती
!
परमात्मा के सम्बंध में मोह की क्या स्थिति है वह हम तुम्हें उदाहरण देकर
समझाते है । जैसे आकाश में अंधेरा हो जाये या धुआँ और धूल छा जाये तो लोग
समझेंगे कि आकाश काला अथवा मैला व धूल भरा हो गया है । वास्तव में अंधेरा
,
धुआँ और धूल
आकाश पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकते । आकाश तो सूक्ष्म होने के कारण इन सबसे
अप्रभावित रहता है । वह निर्लेप है। ऐसे ही तमोगुण
,
रजोगुण और
सत्व गुण जीव के ऊपर अपना प्रभाव अवश्य डालते हैं
,
परन्तु
परमात्मा आकाश की तरह सदैव निर्लिप्त व निर्विकार रहता है ।
परमात्मा तो
सर्वत्र और नित्य है
,
परन्तु
जिनके अन्दर सत्वगुण अधिक है और वे शास्त्र प्रमाण के अनुसार विचार करतें हैं
उन्हें परमात्मा का अपने हृदय में ही अनुभव हो जाता है । विचार का क्रम इस
प्रकार है - विषय हैं
,
इन्द्रियाँ(करण) हैं
,
इन्द्रियों
के देवता (सुर) है । और फिर जीव है । इन सभी में क्रमशः अधिकाधिक चेतना दिखाई
देती है । इनमें चेतना कहाँ से आई
?
तब स्वयं ही
यह उत्तर मिलता है कि इन सबका परम प्रकाशक जो है उसी का नाम राम है । अपने आप
में इन्द्रियों आदि जड हैं - न ये देख सकती हैं
,
न सुन सकती
हैं हम इन सबसे जो अनुभव ग्रहण करते हैं उसका एकमात्र कारण है कि परमात्मा
इनमें चेतना रूप में विद्यमान है । इसीलिये परमात्मा का एक नाम गोविन्द व
गोपाल है । गो
=
इन्द्रियाँ तथा विन्द
=
जानने वाला ( प्रकाशित करने वाला) । इन्द्रियों के अधिष्ठात्र देवताओं में जो
चेतना है वह परमात्मा की ही है । ये देवता व्यष्टि और समष्टि दोनों रूप में
है । देवताओं के बाद जीव आता है । अहंकार ही जीव है । अहंकार भी वस्तुतः जड
है किन्तु इसमें जो चेतना दिखाई देती है वह परमात्मा की है ।
परमात्मा मानो दीपक के प्रकाश की तरह है । दीपक का प्रकाश जिस वस्तु पर
पडेगा उसी का रूप धारण कर लेगा । इसीप्रकार परमात्मा चैतन्य इन्द्रिय
,
मन
,
अहंकार आदि
जिस पर पडता है वहीं रूप धारण कर लेता है । ऐसा लगता है जैसे आँख,
कान आदि की अलग-अलग चेतना है । लेकिन एक ही चेतना सब जगह छायी हुई है ।
चैतन्य रूप परमात्मा ही कण-कण में व्याप्त हैं इन सबके नष्ट होने पर भी चेतना
नष्ट नहीं होती । वह सदा विद्यमान रहती है । इस चेतना पर मोह का प्रभाव नहीं
पडता । यदि अहंकार में रहेंगे तो मोह आ जायेगा और यदि अहंकार को प्रकाशित
करने वाली चेतना में पहुंच गये तो फिर मोह नहीं रह सकता ।
परमात्मा और
जगत का सम्बध इस प्रकार है - परमात्मा प्रकाशक है और जगत प्रकाशित हो रहा है
जैसे दीपक व इससे प्रकाशित होने वाला घट । दीपक का प्रकाश भौतिक है और
परमात्मा चेतना का प्रकाश है । स्थूल व सूक्ष्म सारा का सारा ब्रह्माण्ड
प्रकाश्य है और परमात्मा अर्थात राम प्रकाशक है । जैसे घर दीपक को प्रकाशित
नहीं कर पाता उसी प्रकार हमारे प्राण
,
मन
,
बद्धि आदि
अपने प्रकाशक परमात्मा को नहीं जान पाते ।
यह सारा जगत
माया की रचना है और परमात्मा मायाधीश है
,माया
का स्वामी है । परमात्मा ज्ञान स्वरूप है और तीनो गुणों की मूल - माया
,
परमात्मा
में स्थित है । इसलिये कहते हैं कि परमात्मा गुणों का धाम है
–
“मायाधीस
ज्ञान गुन धामू”
। परमात्मा का ज्ञान जब व्यवहारिक रूप में अवतरित होता है तो गुण रूप में आता
है । परमात्मा की सत्यता से जड माया भी चेतन लगने लगती है । माया अज्ञान
स्वरूप है किन्तु परमात्मा के अधीन होने के कारण ज्ञान स्वरूप प्रतीत होने
लगती है ,
जैसे रस्सी की सत्यता के कारण कल्पित सर्प भी सत्य भासित होता है । यद्यपि यह
जगत नाम रूपात्मक है
,
मिथ्या है
किन्तु परमात्मा की सत्यता के कारण सत्य प्रतीत होता है । वेदान्त कहता है कि
कोई भी भ्रम निराधिष्ठान नहीं होता । जगत एक भ्रान्ति है और इस भ्रान्ति का
अधिष्ठान परमात्मा है । जैसे सर्प की भ्रान्ति मिटने पर अधिष्ठान रूप रस्सी
का ज्ञान हो जाता है
,
उसी प्रकार
माया समाप्त हाते ही हमें परमात्म स्वरूप का दर्शन हो जाता है जो अधिष्ठान
रूप में नित्य विद्यमान है।
कहीं पर घूप
में सीपी पडी हो तो धूप में दूर से उसकी चमक देखकर चाँदी का भ्रम होता है ।
इसी प्रकार रेगिस्तान में सूर्य के प्रकाश में तपी हूई बालू से जल की लहरों
का भ्रम होता है । इसे मृगमरीचिका कहते हैं । जल की भ्रांति में अधिष्ठान
बालू व चॉदी के भ्रम में अधिष्ठान सीपी विघमान रहती है
,
इसीप्रकार
सारे जगत का अधिष्ठान परमात्मा है । हमारी भ्रान्ति (मोह) बुद्धि से हटे तो
परमात्म स्वरूप प्रगट हो जाये ।
इसीलिये
समस्त शास्त्र उपदेश देते है कि परमात्मा से प्रेम करों और सांसारिक मोह को
छोडो । बिना शास्त्र देखे अपनी युक्तियों से भ्रम नहीं मिटता । उपरोक्त
उदाहरण के द्वारा धीरे-धीरे समझने की कोशिश करनी चाहिये । व्यक्ति अज्ञान में
,
माया
में ,
मोह में तो होते ही हैं,
किन्तु यह मोह छूटे कैसे
?
तो विचार
करो
!
शास्त्र के
ऊपर,
इसके उदाहरणें व युक्तियों पर ध्यान दो । सतत विचार करना पडेगा । विचार
करते-करते कालांतर में अज्ञान निवृत होगा । चित्त का शोधन होगा
,
फिर
धीरे-धीरे हृदय में परमात्मा की उपलब्धि होगी ।
शंकरजी
पार्वती जी को समझाते हुये आगे कहते हैं
–
“एहि
बिधि जग हरि आश्रित रहई”।
यह जगत परमात्मा पर ऐसे आश्रित है जैसे घट मिट्टी पर और तरंग जल पर । मिट्टी
के बिना घट का अस्तित्व नहीं हो सकता और जल के बिना तरंग का । ऐसे ही
अधिष्ठान रूप परमात्मा ने मायामय जगत का रूप धारण किया है । परमात्मा की
सत्ता से यह जगत सत्यवत् भासित होता है
,
जैसे रस्सी
के कारण ही मिथ्या सर्प सत्यवत् भासित होता है ।
यह जगत
असत्य है तब भी दु:ख
देता है । इसे समझाने के लिये स्वप्न का उदाहरण दिया गया है । यदि स्वप्न में
कोई हमारा सिर काट दे तो हम दुःखी होंगे ओर जब तक जागेंगे नहीं तब तक दुःख
दूर नहीं होगा । जाग्रतावस्था में कोई सिर काट दे तो दुःखी होने की बात ही
नहीं क्योंकि अनुभव करने वाला व्यक्ति ही मर गया । ऐसे ही संसार में कई
प्रकार की हानियाँ (धन की,
परिवार की ) होती रहती हैं और व्यक्ति इनसे तब तक दुःखी होता रहता है जब तक
स्वप्नवत् संसार को सत्य मानता रहता है । जहाँ उसे समझ में आया कि सारा जगत
मिथ्या है एक परमात्मा ही सत्य है आर्थात् अपने सत्स्वरूप के प्रति जाग्रत
होने पर,
दुःख नहीं होता। संसार के दुःखों से छूटने का सर्वोत्तम उपाय यही है कि
व्यक्ति आत्मा-परमात्मा को जाने तथा मोह निद्रा से जागे । मोह में पडा हुआ
व्यक्ति जो कुछ देखता है वह सब स्पप्न के समान है । जगत का धन
,
व्यक्ति
,
लाभ-हानि ,
लडाई झगडे आदि का चिंतन करते रहने से माया नहीं छूटती । इससे छुटकारा का एक
मात्र उपाय है निरन्तर परमात्मा का चिन्तन
,
स्मरण ।
परमात्मा
हमारे शरीर में इन्द्रियां
,
मन
,
बुद्धि आदि
की चेतना के रूप में बिद्यमान है । परमात्मा सच्चिदानन्द स्वरूप है और
सर्वव्यापक है । उसके अलौकिक कार्य हैं जैसे
–
“बिनु
पद चलइ सुनइ बिनु काना
........”
। परब्रह्म परमात्मा जो आकाश की तरह सर्वव्यापी चैतन्य है वह निर्गुण
-निराकार है
,
उसके
ज्ञानेन्द्रियॉ
,
कर्मेन्द्रियॉ आदि कुछ नहीं हैं । वह बिना कानों के ऐसे सुनता है कि सृष्टि
में जितने भी कानसुनते है वे सब उसी परमात्मा की चेतना से सुनते हैं । वह
बिना पैरों के चलता है अर्थात् वह सब जगह बिद्यमान है उसको चलने का कोई कारण
ही नहीं है । उसके हाथ नहीं परन्तु जगत के समस्त हाथ उसी की चेतना से कर्म
करते हैं । यही बात जिव्हा
,
वाणी
,नासिका
आदि इन्द्रियों के बारे में भी हैं संक्षेप में तात्पर्य यह है कि सब प्राणी
अपनी इन्द्रियों से जो-जो कार्य करते हैं उसकी क्षमता परमात्मा की चेतना से
ही प्राप्त होती है ।
बृहदारण्यक
उपनिषद में एक मंत्र आता है -
“अशरीरी
भावसन्तः न प्रियाप्रियो स्पर्शतः”
अर्थात् आत्मा अशरीरी होने के कारण उसे प्रिय - अप्रिय कुछ भी स्पर्श नहीं
करता । परमात्मा सब जगह व्याप्त होते हुये भी असंग है
,
अलौकिक है ।
वह सत्स्वरूप
,
चेतन स्वरूप
व आनन्द स्वरूप है । सर्वाधिष्ठान है । वह मायापति है और यह जगत मायामय है ।
उसी
परमात्मा ने अपने भक्तों की सुविधा के लिये मानवीय शरीर (सगुण साकार) धारण कर
लिया और अयोध्या में जाकर दशरथ पुत्र राम बन गये
–
“सोइ
दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान”।
जिससे भक्त आसानी से उनका ध्यान कर सकें । भगवान राम का शरीर तो दिखाई देता
हे लेकिन अपने आप में वे अशरीरी परमात्मा हैं । उन्हें कोई हर्ष- विषाद
लाभ-हानि नहीं है । निर्गुण ब्रह्म का ध्यान कठिन है
,
इसलिये
भक्तों के हितार्थ वे राम के रूप में अवतरित हुये । इस रूप में श्याम वर्ण,
वैजन्ती माला धारण किये हुये
,
हाँथ में
धनुष वाण लिये हुये
,
प्रकाशमान
,
तेजोमय
,
गुण
निधान ,
शील निधान भगवान श्री राम का ध्यान करना सरल है । जो इसका ध्यान करता है वह
संसार के मोह जाल से छूट जाता है ।
वेदान्त के
अनुसार ‘काश’
का अर्थ है प्रकाश,
ज्ञान । इसलिये काशी में रहने का तात्पर्य है कि जो व्यक्ति ज्ञान की परिधि
में रहता है । परमात्मा के ज्ञान में रहते हुये जब कोई शरीर छोडता है तो वह
परमात्मा को ही प्राप्त कर लेता है । गीता में भी भगवान कहते हैं-
“यं
यं वापि स्मरन्भावं त्यज्यन्ते कलेवरम्”
मरते समय जो
जिस भाव में रहता है उसी अनुसार उसकी गति हो जाती है । शंकर जी कहते हैं कि
सारी सृष्टि की रचना उसने की और सारे प्राणी भी उसी ने बनाये
,
वही मेरा
स्वामी है । सभी भक्तों को भी इसी तरह समझना चाहिये और सतत स्मरण करते रहना
चाहिये । उसी परमात्मा पर निर्भर रहें
,
संसार में
कहीं धन ,
परिवार ,
व्यक्ति ,
वस्तु से कोई आशा न रखें,
परमात्मा से ही आशा रखें । भगवान सबके हृदय की बात जानते है । और सबके अन्दर
बैठकर सबका नियंत्रण भी करते हैं । हमारे हृदय में परमात्मा के लिये कितना
प्रेम है ,
यह परमात्मा से छिपा नहीं है । हमारे सब दोष
,
दुर्गुण वह
जानता है । भगवान के स्मरण की महिमा बताते हुये शंकर जी कहते है
–
बिबसहुँ
जासु नाम नर कहहीं । जनम अनेक रचित अघ दहहीं।।
सादर सुमिरन
जे नर करहीं । भव बारिधि गोपद इव तरहीं ।।
.....(दो.
बा. 116)
विवश होकर
भी नाम स्मरण से जन्म-जन्म के पाप विनष्ट हो जाते हैं और श्रद्धायुक्त मन से
स्मरण करने पर भवरूपी सागर बडी सरलता से पार हो जाता है । इसका तात्पर्य है
कि अध्यात्म विद्या का पहला फल है - उपासना से चित्त शुद्धि
,
यहीं पापों
का विनाश है । इसके फलस्वरूप व्यक्ति का मन भगवत् नाम में लगने लगता है और वह
मोह जाल से छुटकारा पाकर परमात्मा की प्राप्ति करके आनन्दमय हो जाता है ।
जीवन की
सबसे बडी उपलब्धि यही है कि मोह दूर हो जाये
,
परमात्मा
में दृढ विश्वास उत्पन्न हो और दुःख की आत्यान्तिक निवृत्ति हो जाये । यही
जीवन मुक्ति है । सभी शास्त्रों की शिक्षा का यही मुख्य प्रयोजन है ।
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