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लेख

स्वर्ग और नरक

(परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द)

     ऐसा प्रसिद्ध है कि नरक एक लोक है जहां जीव अपने पापों का फल भोगता है। पाप का फल दुःख है। गरुड पुराण आदि पढने से प्रतीत होता है कि नरक लोक यहां से बहुत दूर नीचे की ओर एक स्थान है। यमराज के दूत पापी जीव को बॉध कर ले जाते हैं और नाना प्रकार की पीड़ा देते हैं। विभिन्न प्रकार के पापों के लिए नरक रूपी कारागार में तरह-तरह के दण्ड दिये जाते हैं। जीव को ये दण्ड भेगने के लिए यातना शरीर प्राप्त होता है। जीव बहुत कष्ट पाने पर भी उस शरीर को छोड़ नहीं पाता। यह काटने-छाटने से पीड़ा तो देता है किन्तु नष्ट नहीं होता।

     ऐसे नरक का वर्णन संसार के सभी सम्प्रदायों में किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि नरक की अवधारणा मिथ्या नहीं है। वह मनुष्य को पाप कर्म से विरत करने के लिए मात्र डराने धमकाने की बात नहीं है। फिर भी शास्त्र जो कहना चाहते हैं उसे समझ पाना सरल नहीं है। वस्तुतः लोक का अर्थ कोई स्थान नहीं है। मृत्यु लोक का अर्थ यह पृथ्वी नहीं है, जिस पर हम रहते हैं। स्वर्ग और नरक भी वैसे लोक नहीं हैं, जिनकी प्रायः कल्पना की जाती है।

     "लोक" शब्द लुकृ धातु से बना है जिससे लोचन या अवलोकन शब्द बनते हैं। इसलिये लोक शब्द का अर्थ अनुभव का क्षेत्र है। इसे समझने के लिए हमें 'स्वप्न लोक' की ओर ध्यान देना चाहिये। स्वप्न भी एक लोक है, किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि वह कहां है। वह हमारे अनुभव में आता है और हम उसमें सुख-दुःख का भी अनुभव करते हैं। इसी प्रकार स्वर्ग भी हमारे अनुभव में आता है। उसमें हम अपने इच्छित पदार्थ पाते हैं और भेगते हैं। नर में हमें अनिच्छित दुःख भेगने पडते हैं वे दुःख अनुभवजन्य हैं।

     मृत्युलोक पृथ्वी पर नहीं है, वरन् शरीर में अहंभाव और उसमें मरण का भय मृत्युलोक है। हम सब लोग मरने की सम्भावना मानते हैं और उससे डरते हैं। मनुष्य ही नहीं, अन्य प्राणियों के साथ भी यही समस्या है। वे भी मृत्यु लोक में हैं किन्तु नारकीय दुःख भोगते हैं।

     मरने के पहले शरीर में नाना प्रकार के विकार और रोग उत्पन्न होते हैं। उनके कारण उत्पन्न होने वाला कष्ट, पीडा और दुःख नरक का वातावरण उत्पन्न करता है। इस नारकीय वेदना का कारण देहाभिमान है। जाग्रत अवस्था में देहाभिमान स्थूल शरीर में होता है, सोते समय स्वप्न के सूक्ष्म शरीर में होता है और मरने के बाद देव-शरीर या यातना-शरीर प्राप्त होता है, उसमें भी जीव की आसक्ति रहती है। इस रहस्य का विस्तृत वर्णन शंकराचार्य ने वूहदारण्यक उपनिषदृ में किया है। 

     शरीर में तो ब्रह्म ज्ञानी, जीवनमुक्त और भक्त लोग भी रहते हैं किन्तु वे उसमें आसक्ति न रखने के कारण लोकातीत अवस्था में पहुँच जाते है।

 

     अभी हम विचार कर रहे थे कि नरक आदि लोक क्या हैं। वहीं यह भी स्पष्ट हो गया कि स्वर्ग से शस्त्रकारों का क्या तात्पर्य है। शंकराचार्य का कथन है कि तृष्णा का नाश ही स्वर्ग का पद है। इस कथन से इतना तो स्पष्ट है ही कि हमें किसी स्थल विशेष को स्वर्ग नहीं समझ लेना चाहिए। स्वर्ग हमारी आन्तरिक दशा ही है।

     गीता के अनुसार काम, क्रोध और लोभ नरक के तीन द्वार हैं। इन तीनों को एक शब्द में तृष्णा भी कह सकते है। तृष्णा के कारण मनुष्य पाप कर्म करता है और नरक जाता है। उसे इस जीवन में और आगे आने वाले जीवन में नाना प्रकार की यातनायें भोगनी पडती हैं। तृष्णा नष्ट हो जाने पर काम, क्रोध आदि विकार नहीं रह जाते। निर्विकार मन से कोई पाप नहीं करता। वह तो पुण्य कार्य ही करता है। पुण्यों के कारण अपने अन्दर जो सुखानुभूति होती है वह स्वर्ग ही है। यह सुखानुभूति घटती-बढती और आती-जाती रहते है, इसलिए इसे लोक ही समझना चाहिए। यह मुक्ति की अवस्था नहीं है।

(मणिरत्नमाला से)

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