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उपासना का अर्थ होता है, पास
में बैठना । उप का अर्थ है समीप और आसना
" धास्
" धातु में ल्युट प्रत्यय के संयोग से बने " आसन
" शब्द का स्त्रीलिंग है । इस प्रकार सम्यक् रुप से उपासना
का अर्थ समीप
में बैठना ही हुआ ।
" उपासना
" आध्यात्मिक अथवा धार्मिक जीवन में रुढ़िगत होकर एक महत्वपूर्ण
क्रम बन गया है । यूँ तो हम अपने लौकिक जीवन में कितनों के
पास बैठते या स्थित होते हैं । यह चाहे राजनैतिक क्षेत्र हो अथवा सामाजिक पर इसे
" उपासना
"
नाम से सम्बोधित नहीं किया जा सकता
क्योंकि यह आध्यात्मिक अथवा धार्मिक जगत् के शब्द के रुप में ही जाना जाने
लगा है ।
यदि हम
अपने लौकिक जीवन में ही इसे देखें तो पायेंगे कि शराबी के पास शराबी बैठता
है, जुआरी के पास जुआरी बैठता है, संगीतज्ञ के पास संगीतज्ञ बैठता है, और संत
के पास संत । कारण कि हम उसी व्यक्ति के पास बैठना पसन्द करते हैं जिसके
विचार हमारे से मिलते हैं । किसी अजनबी के पास एकदम कोई स्थित नहीं हो जाता ।
उसका स्वभाव, उसकी
आदतें, उसकी रुचियाँ देखनी पड़ती हैं । जब हम इन सबसे पूर्णरुपेण अवगत हो
जाते हैं और हमारी रुचियाँ, हमारी आदतें, हमारा स्वभाव उससे मेल खाता है तो
हम उसके प्रति स्थिर होते हैं वरना साथ बहुत अधिक दिनों तक नहीं चलता और
खटापटी हो जाती है ।
हमारे हिन्दू समाज की जो वैवाहिक परम्परा रही है, उसका
आधार भी उपासना का ही वातारण रहा है, क्योंकि पति और पत्नी जीवन भर के लिये
एक-दूसरे के प्रति समर्पित होते हैं । एक का दु:ख
-सुख दूसरे का दु:ख
-सुख हो जाता है । शरीर दो होते हुए भी एक हो जाते हैं। दोनों का एक-दूसरे
के प्रति यह समर्पण भक्त का भगवान् के प्रति समर्पण है । पत्नी पति की हर तरह
से सेवा करती है
उसे येन-केन प्रकारेण रिझाने का प्रयत्न करती है । पति भी
उसकी सेवा से रीझकर उसकी हर इच्छा पूरी करता है । ठीक यही बात भक्त और भगवान्
के बीच है । भक्त अपने इष्ट को रिझाने के लिये हर सम्भव प्रयत्न करता है और
भगवान् अपने समर्पित भक्त की हर इच्छा पूरी भी करता है । भले ही बाद में उसे
कुछ और उपाय करना पड़े । ऐसे कितना ही उदाहरण मिलते हैं जैसे -भस्मासुर,
हिरण्यकश्यप, पूतना आदि आदि । परन्तु ये उदाहरण स्वार्थ पूर्ति के लिये भक्ति
करने वाले भक्तों के हैं । सच्चा भक्त अपने लिये कुछ नहीं मांगता, वह तो
प्रभु की इच्छा को अपना ध्येय समझता है । यही बात एक सच्ची पत्नी की होती है ।
पति-पत्नी के इस उपासनापूर्ण वातावरण के लिये उनके
जन्मांक अथवा कुण्डली मिलाई जाती है । इस मिलन से वर और कन्या दोनों में विहित
गुणों की समानता का अवलोकन किया जाता है । जिन लोगों के जितने ज्यादा गुण मिल
जाते है वह विवाह उतना ही सफल होता है । बिना गुण मिलान किये होने वाले विवाह
अधिकतर असफल हो जाते हैं । ऐसे विवाहों में या तो एक की अकाल मृत्यु हो जाती
है अथवा होनों में कलह हो जाती है, परिणामत:
दोनों में सम्बंध विच्छेद भी हो जाता है, और एक का जीवन दूसरे के बिना अधूरा
रह जाता है । कलहपूर्ण दाम्पत्य जीवन का असर सन्तानों पर भी पड़ता है ।आजकल
अधिकतर युवकों एवं युवतियों के अशांत और अपराधपूर्ण जीवन का मुख्य कारण
उपासना के वातावरण
से दूर होना है । अर्थात् एक-दूसरे के विचारों,
प्रवृत्तियों और स्वभाव में असमानता होना है या यूँ कहें कि दोनों की कुण्डली
का ठीक प्रकार से मिलान नहीं किया जाता है।
आध्यात्मिक और धार्मिक क्षेत्र में अपने इष्ट देव के
प्रति स्थित होना उपासना कहलाता है ।
यह स्थिति शारीरिक न होकर भावात्मक ही
होती है । भावात्मक एकता पर ही शारीरिक एकता स्थिर
रहती है । जैसे विवाह का
एक विधान है वैसे ही उपासना का भी एक विधान है । जो लोग विधि-विधान से नहीं
चलते वे अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच पाते, अन्यत्र भटक जाते हैं। विवाह
वर-कन्या स्वंय नहीं करते । वे किसी न किसी माध्यम से
विवाह सूत्र में बँधते
हैं, फिर चाहें वे पण्डित जी हों, और कोर्ट हो या मन्दिर । विवाह का कोई न
कोई साक्षी होता है । इसी प्रकार परमात्मा के साथ बँधने का भी कोई न कोई
साक्षी होता है । उपासना का विधान हमें अपनाना चाहिये ।
(1) पहले परमात्मा को जानें
विवाह में वर-कन्या दोनों एक-दूसरे के बारे में सम्पूर्ण
जानकारी प्राप्त करते हैं । यह जानकारी चाहें किसी व्यक्ति विशेष के माध्यम
से प्राप्त की जाय या फिर किसी अखबार द्वारा । भक्त को भी भगवान् के बारे में
पहले जानकारी प्राप्त करनी चाहिये क्योंकि बगैर जानकारी के एक-दूसरे के प्रति
विश्वास नहीं टिकता और विश्वास के अभाव में प्रेम नहीं उपजता और बिना प्रेम
के सेवा और समर्पण नहीं हो सकता । गोस्वामी जी लिखते हैं -
जाने बिनु न होइ परतीती । बिनु परतीती होय नहिं
प्रीती ।।
प्रीति बिनु नहिं भगति दृढ़ाई । ज्यों खगेश जल की चिकनाई
।।
और भी-बिनु बिश्वास भगति नहिं तेहिं बिनु द्रवहिं न राम
।
(a)
सत्संग - भगवान् के विषय में जानकारी संतो, महात्माओं व महापुरुषों की
अमृतवाणी या फिर धार्मिक पुस्तकों के माध्यम से मिलती है । पुस्तकों में भी
परमात्मा से सम्बंधित संतों की वाणियाँ ही दर्ज होती हैं
। यह दोनों एक साथ
सत्संग के नाम से जाने जाते हैं । बिना सत्संग के भगवान् के प्रति विश्वास और
प्रेम नहीं उपजता । तुलसीदास जी लिखते हैं -
बिनु सत्संग बिबेक न होई
।
(b)
चित्रों का उपयोग - विवाह में वर-कन्या
एक-दूसरे के बारे में जानकारी प्राप्त करने के बाद एक-दूसरे का चित्र भी
देखना चाहते हैं और ऐसा करते भी हैं । परमात्मा यद्यपि निराकार हैं किन्तु
भक्तों के कल्याण के लिये विभिन्न रुपों में प्रकट होता है और हुआ है जो
विभिन्न अवतारों और विभिन्न देवी-देवताओं के रुप में विद्यमान है । इनके
चित्र ऋषि-मुनियों ने अपने अनुभव के आधार पर अंकित किये हैं । इन चित्रों और
मूर्तियों के माध्यम से उपासना का प्रारम्भ किया जा सकता है, किन्तु यह नहीं
भूलना चाहिये कि चित्र या मूर्ति केवल साधन मात्र हैं, साध्य नहीं । यह
शिक्षा की वह प्रारम्भिक कक्षा है जहाँ से विद्यार्थी चित्रों के माध्यम से ए
फार एप्पिल और बी फार बैट सीखता है । ज्यों- ज्यों वह आगे बढ़ता है चित्रों
और अन्य स्थूल चीजों का उपयोग छूट जाता है । वृक्ष में पहले फूल आता है तब फल
आता है । बगैर फूल के फल नहीं आता । फल के आ जाने पर फूल स्वंय गिर जाता है ।
यही आध्यात्मिक साधना का क्रम है ।
(c) परमात्मा
सहज, सरल व नि:श्छल
है - परमात्मा सरल है उसमें कोई बनावटीपन या
जटिलता नहीं है । वह सर्वत्र है और भरपूर है । कोई भी उसे सहज ही पा
सकता है । बस परमात्मा को पाने की एक ललक हो । परमात्मा सरल भी है और नि:श्छल
भी । वह कोई चतुराई नहीं दिखाता और न ही कोई दुराव ही करता है । जो कुछ करता
है खुलेआम करता है । इसलिये उपासकों को एकदम सहज, सरल और नि:श्छल
होना चाहिये । भगवान् राम
स्वंय कहते हैं -
निर्मल मन जन सो मेहि पावा । मोहि कपट छल-छिद्र न भावा
।।
अत:
साधक को छल कपट, दु:ख
चतुराई , विश्वासघात आदि अवगुण छोड़ देने चाहिये ।
(d)
परमात्मा सहनशील, क्षमाशील व दयालु है -
परमात्मा एकदम सहनशील है । लोग परमात्मा के बारें में कुछ भी कहें सब सहन
करता है पलट के जवाब
नहीं देता है और न ही तुरन्त दण्ड भी देता है। लोग अनेकानेक लांछन भी उस पर
लगाते है. । अपने कर्मों के वशीभूत अनेक दु:ख
भी उठाते हैं पर अपनी असफलता अपने दु:ख
के दोष परमात्मा को देते हैं पर वह सब कुछ सहन करता है । साधक को भी सहनशील
होना चाहिए। संसार के लोग सन्तों के बारे में क्या ऊटपटाँग बातें करते हैं,
अपने व्यंगबाण छोड़ते हैं, तिरस्कार करते हैं पर सन्त सब कुछ सहन करता है ।
तभी वह परमात्मा के समीप बैठने लायक हो सकता है ।
परमात्मा क्षमाशील भी है । वह पापी से पापी को भी अपनी
शरण में जाने पर क्षमा कर देता है । गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने यह बात कही
है । भगवान् राम ने तो अपने प्रति आघात करने वाले को भी
क्षमा किया है ।
उन्होंने केवल क्षमा ही नहीं किया बल्कि सुरधाम अथवा मोक्ष भी प्रदान की है ।
रावण, मारीच, कुम्भकरण कितनों को अपने धाम भेजा है जो सन्तों मुनियों को भी
दुर्लभ हैं । राम का विरद है -
सम्मुख होहि जीव मोहिं जबहीं । कोटिजन्म अघ नासहुँ
तबहीं ।।
अत:
उपासना के लिये क्षमाशील होना अति आवश्यक है ।
परमात्मा दयालु है । वह बहुत जल्दी द्रवित होता है और
अपने भक्त पर सब कुछ लुटा देता है । जो भी उसके शरण में पहुँच जाता है वसे सब
कुछ दे देता है । सुदामा के दो मूठी चावल खाकर उन्हें दो लोक प्रदान कर दिये
। उन्होंने कभी किसी का अहित नहीं किया
। उपासना करने वालों को सभी के प्रति दया
का आचरण करना चाहिये ।
(2)
गुरु को धारण करें
गुरु को धारण करना उपासना का एक अनिवार्य क्रम है
। गुरु को करना और बात है और धारण करना और बात । प्राय:
लोग गुरु तो कर लेते हैं परन्तु धारण नहीं
करते, फलत:
उन्हें अपनी साधना का पूरा-पूरा फल नहीं मिल पाता । धारण
करने का अर्थ है गुरु की हर प्रकार से आज्ञा पालन करना । गुरु की आज्ञा सदैव
कल्याणकारी होती है । अत:
उसके पालन में अपना विवेक नहीं लगाना चाहिये । गोस्वामी जी लिखते हैं -
मातु-पिता अरु गुरु कै बानी । बिनहिं विचारि करिय
सन्मानी ।।
और भी -बचन गुरु का आदेश इलाही है ।
इसमें
नुकता चीनी की सख्त मनाही है ।।
कुछ लोग गुरु को धारण न करके स्वंय ही पूजा -पाठ आदि
करने लगते हैं । उनका विचार है कि गुरु की कोई आवश्यकता है ही नहीं । ऐसा
विचार शत प्रतिशत गलत है । संसार का कोई भी कार्य हम पहले किसी से सीखते हैं,
चाहे साधारण से साधारण कार्य हो । मार्गदर्शन करने वाला वह व्यक्ति उस्ताद
अथवा गुरु कहलाता है, फिर आध्यात्म में गुरु की आवश्यकता क्यों नहीं
?
जो लोग गुरु न करके स्वंय ही सब कुछ करते हैं उन्हें केवल अहंकार ही मिलता है
और कुछ नहीं मिलता । अहंकार के वशीभूत वे अपना ही नुकसान करते हैं ।गुरु
अभिमान को उत्पन्न नहीं हीने देता, यदि बन भी गया तो उसे गला देता है ।
इसीलिये सन्तों ने कहा है -
अपने आप से कुछ नहीं होता यदि गुरु सिखायें न ।
कह, " अवतार " गुरु ढिंग आकर भेद को जब तक पाये न।।
भगवान् राम के वचन -
गुरु बिनु भव निधि तरै न कोई । जौ विरंचि
शंकर सम होई ।।
अत:
हर उपासक को गुरु अवश्य धारण करना चाहिये । निराकार की
उपासना करने वाला गुरु के बिना एक
कदम नहीं चल सकता ।
(3)
परमात्मा को रिझायें
जैसे पत्नी पति को रीझाकर सब कुछ प्राप्त कर लेती है,
उसी प्रकार परमात्मा को रिझाने वाले साधक को कुछ भी असम्भव नहीं रहता । वह सब
कुछ प्राप्त कर लेता है । उसका हर वचन, हर सोच सत्य होता है । भगवान् स्वंय
उसमें निवास करते हैं । वह परमात्मा में एकाकार होता है । रिझाने के लिये साधक
को हर प्राणी से प्रेम करना चाहिये और सबकी सेवा करनी चाहिये । यह सेवा संकोच
रहित खुशी मन से हो तथा तन-मन-धन से की गई हो । सेवा के बदले में कुछ प्राप्त
करने की कामना न हो । जो सेवा करने में संकोच करते है या कोताही नहीं करते
है, उन्हें परमात्मा का प्रेम नहीं मिलता ।
प्रभु को रिझाने के लिये आवश्यक है कि हमारा हर कार्य
प्रभु को समर्पित हो । भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही तो बताया कि हे
अर्जुन !
तू तन से युद्ध कर और मन से हमारा ध्यान कर, मैं
तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा । एक सच्चे साधक को इसी प्रकार रह पल, हर
क्षण, प्रभु का स्मरण करना चाहिये । परमात्मा ऐसे नहीं रीझता ।
कैसे रीझैं राम
?
मुख में राम बगल में छूरी का करता है काम ।
सुबह शाम को माला फेरत, दिनभर फेरत दाम ।।
कैसे रीझैं राम
?
अत:
एकाग्र मन होकर हर समय भगवान् को जपते रहो और उनकी शरण
ग्रहण किये रहो । बस आप सच्चे उपासक बन जायेंगे ।
इसके अतिरिक्त उपासक को दो और बातों से परहेज करना
चाहिये ।
(4)
हास-परिहास व उपहास से बचें
दूसरों की कमी को उजागर कर हँसना, उसका आनन्द लेना हास
कहलाता है । इससे उपासक को बचना चाहिये क्योंकि इससे केन्द्रित व्यक्ति की
निन्दा होती है और उसके मन में बैर के भाव उत्पन्न होते हैं । परिहास हास का
ही विस्तृत रुप है जिसमें कर्ता स्वंय मजा लेकर दूसरे को भी शरीक करता है तथा
अन्य भी मनोरंजन करते हैं । निन्दित व्यक्ति इसमें कुभाव में भर कर निन्दा
करने वाले तथा अन्य के प्रति रोष से भर जाता है और उसके कुभाव साधक को नीचे
गिराने में काम करते हैं । इसी प्रकार उपहास व्यंग बाण छोड़कर केन्द्रित
व्यक्ति को आहत करता है और उसके मन में घृणा , क्रोध, प्रतिशोध उत्पन्न करता
है, जो साधक को कभी भी खतरा पहुँचा सकता है । साधना में यह बहुत बड़ा व्यवधान
है । अत:
दूसरों के दोषों को जानते हुए भी नहीं कहना चाहिये ।
(4)
अपनी बात को बढ़ा-चढ़ा कर न कहें
संसार में यह प्रवृत्ति जोरों पर है कि व्यक्ति अपनी बात
को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहता है, ताकि लोग उसका महत्व समझें । अध्यात्म में यह
प्रवृत्ति विष का काम करती है, क्योंकि यह अहंकार को जन्म देती है तथा पुष्ट
करती है । इस प्रवृत्ति के वशीभूत कितने ही लोगों के अहं टकराते हैं और
व्यर्थ की उलझनों में फँसते हैं । ऊर्जा जो भगवत्भजन में लगानी चाहिये थी वह
व्यर्थ में नष्ट होती है । यदि इस आदत में फँसकर हमने किसी संत के सामने अपनी
पीठ थपथपाई तो सर्वज्ञ प्रभु का दास सन्त असलियत जानने में देर नहीं करता और उसके
मन में आपके प्रति उठे भाव आपकी अब तक की साधना की कमाई को भस्म करने में देर
नहीं लगाते । बनता काम भी बिगड़ जाता है । परमात्मा का विरद् है कि वह
अपने भक्त के अहंकार को नहीं देख सकता । अत:
अपने मुँह मिंया मिट्ठू बनने से सदैव बचना चाहिये ।
इस प्रकार यदि उपासक इन बातों पर सम्यक् ध्यान देता है
और उपासना के सोपानों पर दृढ़ पग रखता हुआ आगे बढ़ता है तो शनै:
शनै:
उपासना के शिखर पर पहुँच सकता है । प्रभु का साक्षात्कार कर अपने जीवन को
धन्य कर सकता है ।
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यह लेख चिन्मय मिशन की हिन्दी मासिक
पत्रिका "चिन्मय
चन्द्रिका" के माह जून 2003 के अंक में प्रकाशित हुआ था।
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