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तुम ज्ञान
स्वरूप हो। ये शरीर मन बुद्धि प्राकृत हैं,
ये
आत्मा नहीं है। जो चेतन स्वरूप आत्मा है वही तुम्हारा स्वरूप है। तीन गुण ही
तीन गुणों में बर्त रहे हैं। माने कारण शरीर के तीनों गुणों की शरीर में
स्थित होकर क्रीडा चल रही है। आत्मा तो न आती है न जाती है। समुद्र का जल तो
जहाँ का तहाँ भरा है वो तो तरंगे हैं जो चल रही हैं। ऐसे ही आत्मा तो नित्य
विद्यमान है। ये शरीर हैं जो आ जा रहे हैं। आत्म स्वरूप में स्थित होकर रहो।
कपडे फटते
हैं तो दूसरे पहन लेते हैं। इसी प्रकार शरीर हैं,
एक
छोडा दूसरा पहन लिया। वैसे तो किसी भी समय शरीर में आत्मबुद्धि नहीं होनी
चाहिए परन्तु तृतीय या चतुर्थ अवस्था आ जाये तो यह भावना अमृत के समान है।
जिस व्यक्ति
का देहाभिमान छूट गया वह परमात्मा भाव में
फटाफट पहुँच जायेगा उसे कोई रोक नहीं सकता और शरीर के खूंटे में जिसकी नाव
बंधी है वह परमात्मा तक नहीं पहुँच सकता। जहाँ साफ दिखाई देता है कि यह शरीर
मेरा स्वरूप नहीं है इस मोटी बात को भी जो नहीं समझ पाया वह परमात्मा तक कैसे
पहुँच सकता है
?
इसलिये सबसे पहले यह शरीर बने रहने की बात हो अथवा आज ही समाप्त हो जाये तो
तुम्हारी
(आत्मा
की)
क्या हानि?
तुम तो एक
अनन्त सागर हो ये जगत् उसम उत्पन्न तरंगे है एक शरीर की बात क्या समस्त जगत्
के आदि कारण चेतन सत्ता को अपना रूप समझो। चाहे ब्रह्माण्ड उत्पन्न हो या
समाप्त-न कुछ वृद्धि न कुछ क्षति। जैसे स्वभावतः स्वप्न रोज-रोज बनता बिगडता
है ऐसा ही जगत है। इसका कोई प्रभाव अपने
(आत्मा
की)
पर नहीं है।
आत्मा के
लिये कोई भी वस्तु इस जगत् में न प्राप्तव्य न त्याज्य है। जगत् जैसा चलता है
स्वभावतः बन बिगड रहा है। बनने बिगडने दो। अपने आत्मस्वरूप में स्थित रह कर
देखो। एक अविनाशी,
शांत,
निर्मल,
चेतन आकाश।
यदि तुम ऐसी आत्मा हो तो विचार करो कि क्या उसका जन्म हो सकता है
?
क्या
उसमें अहंकार हो सकता है
?
तो
उसमें कर्म भी नहीं हो सकता।
वासंसि
जीवोनि यथा विहाय
तुम जो कुछ
भी देखते हो
(दृश्य
है),
वहाँ-वहाँ तुम
(आत्मा)
ही उस रूप में प्रतिभासित हो रहे हो। जैसे सागर देखे कि कहीं धारा कहीं
बुद्बुद् सब मेरे ही रूप हैं। इसी तरह आत्म स्वरूप से सब मेरे ही रूप हैं
चाहे सूर्य,
नक्षत्र,
तारे
हों अथवा समस्त प्राणी। एक अरूप आत्मा ही सर्वत्र विद्यमान है जितने भी रूप
सृष्टि के हैं सब इसी के हैं जब सारा जगत् अपना ही रूप है तो मैं-तुम कहाँ
रहें-
"
कापर
दाया कीजिये कापर निर्दय होय
साई के सब
रूप हैं कीरी कुंजर दोय
"
गीता के
अनुसार
'पण्डिता:
समदर्शिन:'
यह
समत्वदृष्टि आ गई कि एक ही तत्व का बना सब जगत् है हमसे भिन्न कोई नहीं अब
श्रद्धा के बल पर चित्त में यह बात दृढ रहनी चाहिये वरना बुद्धि में विकल्पों
के आने पर ज्ञान टिकेगा नहीं। जहां तक बस चले अपने साक्षी को पहचानो। विचार
करते-करते वहाँ तक पहुँच जाओ लेकिन किसी स्थल पर विचार तुम्हें वहाँ तक नहीं
ले जा पाता तो श्रद्धा करो- श्रद्धा के बल पर आगे बढो।
श्रद्धा से
निश्चय करो कि यह शरीर मैं नहीं हुँ मैं शरीर का दृष्टा हुँ। मैं मन बुद्धि
नहीं इनका साक्षी हुँ। अनुभव में न आये तो भी निश्चय करो-यह कोरी कल्पना नहीं
होगी यह श्रद्धा होगी। शास्त्र गुरू कहते हैं तो सत्य है। कल्पना तो वह थी जो
अभी तक करते रहे कल्पना और श्रद्धा में अंतर है। जो वस्तु दिखाई न दे उसका
विचार तो कल्पना है और जो स्वयं को दिखाई न दे तुम्हारे गुरू को तो दिखाई दे
रही है। शास्त्र और गुरू के वचन में सत्यत्व मानना ही श्रद्धा है।
शास्त्रों
का अध्ययन करो,
अपने
भीतर देखने की कोशिश करो लेकिन जब तुम्हारी बुद्धि काम न करे तो श्रद्धा करो।
जैसे गुरू ने बताया या शास्त्रों में बताते हुए परमात्मा के लक्षणों का स्मरण
करो परमात्मा का स्मरण करने से भी पूर्व जन्म के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
सन्मुख होई
जीव मोहि जबहीं
!
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं
!!
सन्मुख होने
का मतलब यही है कि परमात्मा के लक्षणों का स्मरण करो। ईश्वर तर्क से सिद्ध
नहीं किया जा सकता उसके लिये तो शास्त्र एवं गुरू ही प्रमाण है। इनमें
श्रद्धा होगी तभी परमात्मा का ज्ञान होगा।
‘‘श्रद्धावाँल्लभते
ज्ञानं’’
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