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वर्तमान में युवकों के लिये गीता का उपदेश

 (पू. स्वामी चिन्मयानन्द)

     

     सभी महान् विचारकों ने अपनी-अपनी दार्शनिक खोज के अन्तिम कार्यों के रूप में व्यक्तियों के विकास के लिये कार्यक्रमों की आवश्यकता स्वीकार की है। व्यक्ति के अनुशासन और इस प्रकार उसके द्वारा किसी भी संस्कृति का लक्ष्य सम्पूर्ण राष्ट्रीय जीवन की क्षमता को बढाना और उसके सौन्दर्य में वृद्धि करना ही होता है। सुधरे हुए व्यक्तियों का, जिनसे मिलकर ही सभ्य समाज बनता है, विकासोन्मुख संसार ही वह लक्ष्य है जिसके लिये सभी दार्शनिक और विभिन्न प्रणेता, पैगम्बर प्रचार करते और कार्य करते हैं। भगवद्गीता एक ऐसा शास्त्र है जिसका लक्ष्य व्यक्तिगत रूप में साधक के व्यक्तित्व का संगठन और उन्हें अपने जीवन की तमाम चुनौतियों का उत्साहपूर्वक सामना करने के योग्य बनाना है।

     यह तो स्पष्ट ही है कि भौतिकवाद के वरदानों द्वारा किसी भी विकसित जाति की निर्धनता की प्रताड़नाओं, रोगजनित कष्टों और परिच्छिन्न जीवन की असुविधाओं का निवारण सम्भव है। लेकिन दार्शनिक लोग युक्तियुक्त तर्कों द्वारा सिद्ध करते हैं कि कोई मनुष्य उच्च जीवन स्तर प्राप्त करके प्रचुर मात्रा में भोजन, वस्त्र, आवास तथा शान्तिपूर्ण सफल राष्ट्रीय जीवन की दूसरी तमाम सुविधायें उपलब्ध कर लेने मात्र से भावनात्मक रूप से सुखी नहीं हो सकता और दूसरों के साथ अपने सम्बंधों में उचित तालमेल भी नहीं बिठा सकता। यहाँ पर हमारा ध्यान भगवद्गीता द्वारा उद्घाटित दृष्टिकोण में अन्तर्निहित अकाट्य युक्तियों की ओर जाता है।

     मनुष्य पशु है - एक बुद्धिमान पशु। यदि वह केवल पशु होता तो उसे अपनी शारीरिक सुविधाओं और सुरक्षा के अतिरिक्त किसी और चीज की जरूरत ही न होती लेकिन चुँकि यह एक अतिविकसित, मनोवैज्ञानिक प्राणी है, अतः वह भावनात्मक सन्तुष्टि भी चाहता है। और एक बुद्धिमान प्राणी होने के नाते वह अपनी तमाम अपूर्णताओं से उद्विग्न और अधीर है। वह शरीर से युक्त मात्र भौतिक ढाँचा ही नहीं है, उसके मन और बुद्धि भी है। शरीर की भौतिक आवश्यकताओं केवल भौतिक मनुष्य को ही सन्तोष दे सकती हैं। भौतिक मनुष्य अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व का केवल तीसरा भाग ही है। जब भौतिकवाद किसी समाज की केवल आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रयत्न करता है, तो वह मानो प्रत्येक व्यक्ति के दो तिहाई भाग की ओर ध्यान ही नहीं देता है। ऐसे अवसर पर भगवद्गीता में जिस पूर्ण तुष्टि की प्रक्रिया का रहस्योद्घाटन किया गया है, वह मानव जाति और उसके भाग्य में विश्वास रखने वाले सभी प्राणियों के लिये दीप - स्तम्भ की भाँति प्रकाशित हो उठता है।

     संक्षेप में जब आधुनिक मानव अपने भौतिकवादी दृष्टिकोण के साथ मनुष्य के आस पास के संसार में सुधार द्वारा जीवन स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयत्न करता है तो, शास्त्रों के गहन विचारक और सच्चे दार्शनिक निर्णय रूप में संकेत करते हैं कि संसार की सुख और समृद्धि व्यक्ति के चरित्र स्तर में वृद्धि पर ही निर्भर करती है।

     प्रत्येक राष्ट्र को अपनी राजनैतिक पद्धति और आर्थिक ढाँचा निश्चित करना और अपनी योजनाओं को जागरूकतापूर्वक तैयार करना ही पडेगा। इस तरह संसार के दार्शनिकों के पास मानव-व्यक्तित्व के विकास के लिये विस्तृत कार्यक्रम और व्योरेवार योजनायें होनी चाहिये। भगवद्गीता न केवल हिन्दू-जीवन-पद्धति सम्बन्धी सिद्धान्तों की ओर ही संकेत करती है बल्कि वह कुछ ऐसी निश्चित योजनाओं का उद्घाटन भी करती है जिनसे प्रत्येक व्यक्ति आत्मोद्वार की ओर अग्रसर हो सकता है। राष्ट्र नागरिक से मिलकर ही बनता है, यदि नागरिक बलवान, कुशल, परिश्रमी और त्यागी होते हैं तो राष्ट्र महान् बन जाता है। यदि व्यक्ति स्वार्थी, दुश्चरित्र, आलसी और भ्रष्ट होते हैं तो वह निश्चय ही एक खराब राष्ट्र होगा।

     गीता युवकों के लिए कही गयी है। उनकी मानसिक समस्याएं जैसे उनकी घोर अशान्ति, असम्भव आकांक्षायें, अनन्त इच्छायें, पूर्ण अविश्वास का भाव और कष्टपूर्ण निराशायें, पतनकारी विषाद, विक्षोभजनक भ्रान्तियां, यहाँ तक कि उनका जीवन के प्रति भ्रामक भौतिकवादी दृष्टिकोण इन सबको अर्जुन में प्रदर्शित किया गया है और भगवान् कृष्ण द्वारा पाण्डव युवराज का मनोवैज्ञानिक उपचार ही गीता का मुख्य विषय है।

     हमारे देश का युवक आज ऐसे आदर्श की आवश्यकता अनुभव कर रहा है जो उन्हें त्यागमय और उत्साहपूर्ण कर्मों के लिये निरंतर प्रेरित कर सके। युवकों में योजनायें बनाने का साहस, काम करने की अदमनीय प्रवृत्ति, कल्पना करने का उत्साह, कार्यक्षमता के साथ-साथ वे सभी प्रकार की अकुशलतायें और घृणित दोष भी हैं, जो उन्हें अपने आसपास के संसार में देखने को मिलते हैं। प्रत्येक युवक अपनी शक्ति और बल, तेज और ओज, विचार और कर्म का कार्यक्षेत्र में भलीभाँति प्रयोग कर सकता है। साहसी युवकों के हृदय के इन भागों को ठीक दिशा देने के लिये उन्हें प्रशिक्षित करना होगा। इसके लिये इनमें से प्रत्येक को विशेष मानसिक सन्तुलन और अचूक व्यावहारिक बुद्धि की आवश्यकता हैं। ऐसे सन्तुलित मन और बुद्धि से युक्त होकर ही युवक उपयोगी निर्णयों और रचनात्मक निष्कर्षों तक पहुँच सकेंगे। भ्रामक परिस्थितिय के मध्य में मन और बुद्धि की विस्फोटक स्थितियों और खतरनाक चुनौतियों का ठीक-ठीक मूल्यांकन और निर्णय लेने सम्बन्धी प्रशिक्षण कैसे दिया जाये? भगवद्गीता में इसका विशद विवेचन किया गया है।

     ऐसा प्रायः कम ही होता है कि राष्ट्र के युवकों को ऐसी भीषण स्थितियों और भयानक चुनौतियों का सामना करना पडे जैसे कि इस समय हमारे सामने है। फिर भी यह स्वीकार किया जाना चाहिये कि यह वह परिस्थिति है जिससे किसी भी पिछडे हुए देश को बचा पाना सम्भव नहीं है जब कि वह अपने इतिहास को नये सिरे से लिखने के लिये प्रयत्नशील होता है। यह तो प्रसूति-पीडा के समान ही है और कोई भी नया जन्म पीडा के बिना सम्भव ही नहीं है। चुँकि यह स्वाभाविक अवस्था है जिसमें से गुजरकर ही युवक आगे बढ सकते हैं अतः अपने हित के लिये अपनी सांस्कृतिक निधि की ओर ही देखना होगा और हमारे पास जो कुछ भी विधियाँ उपलब्ध हैं, उनका अपने आपको दृढ बनाने और राष्ट्र की पुनर्निर्माण सम्बंधी चुनौतियों का सामना करने के लिये आवश्यक शक्ति, सहनशीलता और साहस की प्राप्ति हेतु खोज निकालना होगा।

     वर्तमान युवक, जो बुद्धिमान तो हैं ही और अपने भीतर इस विश्वास के उफान का अनुभव करते हैं कि इस साधन-सम्पन्न देश में उसके प्राकृतिक साधन की खोज और गर्वेषणा द्वारा जो कुछ भी चाहें प्राप्त कर सकते हैं, मगर सभी स्तरों पर वे अपनी उमंगों का खून होते हुए, अपने सपनों को साकार न होते हुए और अपनी आकांक्षाओं को मिट्टी में मिलते हुए देखते हैं। उनके चारों ओर प्रतिक्षण बढती हुई बुराई की शक्तियां और परिणामस्वरूप मायूसी जो उन्माद और घोर निराशा का रूप धारण करती हुई सी प्रतीत होती है, युवकों पर छाती जा रही है। कभी-कभी तो वे पागत हो उठते हैं। और अगले ही क्षण इस कदर निराश हो जाते हैं कि उनके चारों ओर क्या हो रहा है, वह उसके प्रति लापरवाह से होने लगते हैं। उनके मन भ्रष्ट, बुद्धियाँ हतोत्साहित और शारीरिक रूप में वे अनैतिक और लज्जाजनक भ्रष्टाचार का अस्वास्थ्यकर अप्राकृतिक जीवन जी रहे हैं और वे अपने ऐसे प्रत्येक काम को, जो वे थोथी युक्तियों का आश्रय लेकर पागलपन में कर रहे हैं, उचित ठहराने का प्रयास करते हैं। यह हमें संसार के युवकों में सर्वत्र देखने को मिलता है।

     हम इस समय निःसंदेह एक श्रेष्ठ राष्ट्र में हैं, परंतु खेद है कि हम अत्यन्त अकुशल हैं। अर्जुन जो कि एक योग्य योद्धा है, भगवद्गीता के प्रथम अध्याय में अपने व्यक्तिगत मानसिक विषाद के कारण चुनौतियों का सामना करने में असमर्थ सा हो गया है। भगवान् कृष्ण अपने इस गीत द्वारा अपने विद्यार्थी के अस्त-व्यस्त व्यक्तित्व का उपचार कर उसे पुनर्संगठित करते हैं और हम देखते हैं कि प्रथम अध्याय का निराश अर्जुन अन्तिम अध्याय में अपने और संसार के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने के लिये नवप्राप्त दृढ निश्चय के साथ उठ खडा होता हैं। यह मानसिक पुनर्संगठन की प्रक्रिया ही गीता का विषय और हमारी राष्ट्रीय पुनर्जाग्रति के कार्य में आवश्यक है। इतनी आवश्यकता किसी और ज्ञान की नहीं है, जितनी की इस महान् रहस्यमयी प्रक्रिया की। अतः मेरा दावा है कि गीता राष्ट्र के युवकों का ही महान् शास्त्र है।

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