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प्रस्तावना
भगवान
शंकराचार्य ने भारतीय संस्कृति को सुदृढ बनाने के लिए अनेक
प्रकार के कार्य किए। उनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य
आध्यात्मिक साहित्य की रचना है। उनका समस्त साहित्य तीन
वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- प्रस्थानत्रयी आदि पर
भाष्य,
प्रकरण ग्रन्थ और स्तोत्र। तीनों प्रकार के साहित्य का
अपने स्थान में बडा महत्व है। प्रकरण ग्रन्थों में तत्वबोध,
अपरोक्षानुभूति,
भजगोविन्दम्,
विवेकचूडामणि आते हैं। ऐसी एक रचना
‘प्रश्नोत्तरी’
है।
भजगोविन्दम् और प्रश्नोत्तरी
जनसाधारण में मौखिक रूप से बहुत प्रचलित है। इन दोनों में प्रथम पुस्तक मुख्य
रूप से उन वृद्ध पुरुषों के लिए है जो अपने गृहस्थ धर्म का पालन कर लेने पर भी
अपने स्थान से हट नहीं रहे है। अब उन्हें वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की ओर आगे
बढना चाहिये। शंकराचार्य जी ने वृद्ध पुरुषों से यही आग्रह किया है।
प्रश्नोत्तरी पुस्तक सामान्य रूप से सभी लोगों के लिए है,
किन्तु संन्यासियों के लिए
अथवा तृतीय और चतुर्थ आयु वर्ग के लोगों के लिए विशेष रूप से है।
प्रकरण ग्रन्थों की सहायता से हम
उपनिषदृ आदि अपने मूल ग्रन्थों को सरलता से समझ सकते हैं। यहां हमें उन शब्दों
या पदों की परिभाषा मिल जाती है,
जिनका प्रयोग श्रुति और
स्मृति ग्रन्थों में अपने विशेष अर्थ में हुआ है।
यही शब्द वर्तमान समाज में बोलचाल
की भाषा में भी प्रयुक्त होते हैं,
किन्तु उनके अर्थ संकीर्ण
हो गये हैं अथवा कुछ बदल गये हैं। हम अध्यात्म शास्त्र के शब्दों के जिस अर्थ
से परिचित हैं,
उनके द्वारा यदि हम
शास्त्र का अध्ययन करते हैं तो उसका सही तात्पर्य नहीं समझ पाते। बहुंत बार हम
अर्थ का अनर्थ कर बैठते हैं। इसलिए शास्त्र का सम्यकृ ज्ञान प्राप्त करने के
लिए हमें प्रकरण ग्रन्थों का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। उनमें बतायी गई
परिभाषाओं को याद रख कर ही शास्त्र पढना उचित होगा।
भगवान शंकराचारर्य के लिखे सभी
प्रकरण ग्रन्थें का अपना महत्व है। प्रश्नोत्तरी एक अपने ही प्रकार की रचना है।
पहले श्लोक से प्रतीत होता है कि एक शिष्य अपने गुरु के पास जा कर अपने
संसार-सागर के दुःखों से पार जाने का मार्ग पूछता है। उसका प्रश्न सामान्य रूप
से हम सबका प्रश्न है। हम सभी लोग अपने-अपने संसार-जाल में फॅसे हुये हैं।
उसमें पडे हम लोग बरबस दुःख भोग रहे हैं। अपने प्रयत्न से हर व्यक्ति सुखी होने
का प्रयास करता है,
किन्तु उसे कितनी सफलता
मिलती है,
यह तो वही जानता है। कभी-कभी कुछ
लोग अपने जीवन-पथ पर एक क्षण रुक कर अपने जीवन का पुनर्निरीक्षण करते हैं और
सन्तुष्ट न होने पर उस व्यक्ति के पास जाते हैं तो सदा प्रसन्न दिखाई देता है।
छान्दोग्य उपनिषदृ में हम देखते
हैं कि नारद जी ऐसे ही पुरुष का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे अनेक विद्यायें
सीखने पर और अनेक उपाय कर लेने पर भी दुःखों से मुक्त नहीं हुए,
तो वे अपने भाई
सनत्कुमारों के पास गए। वे सदा आनन्द में मग्न रहते थे। उन्हें कभी दःखी या
उदास नहीं देखा गया। उसका रहस्य बताने के लिए नारद जी ने उनसे प्रार्थना की।
ऐसा ही कोई व्यक्ति भगवानृ
शंकराचार्य के पास आता है और वह संसार सागर से पार जाने का मार्ग पूछता है।
उसका उत्तर प्राप्त होने पर शिष्य के मन में नये-नये प्रश्न उठते हैं वह अपने
प्रश्न पूछता जाता है गुरुदेव उनका उत्तर देते जाता हैं वे सब प्रश्न और उनके
संक्षिप्त उत्तर इस पुस्तक में शुंकराचार्य ही ने ष्लोकबद्ध कर संग्रहीत कर
दिये हैं। इन सौ से भी अधिक संख्या में उठाये गए प्रश्नों में लगभग सभी
आध्यात्म शास्त्र आ जाता है। हम देखेंगे कि इनमें से अधिकांश प्रश्न हमारे ही
हो सकते हैं। हमें यहॉ उनका उत्तर एक अद्वितीय सन्त से मिल रहा है। इससे अधिक
प्रसन्नता की बात क्या हो सकती है।
सम्भव है,
हम इन उत्तरों को पाकर कुछ
सन्तुष्ट हों तो उसके कारण अध्यात्म विधा को जाननेकी अधिक जिज्ञासा हो और हम
आत्म-बोध,
विवेक-चूडमणि आदि ग्रन्थों को भी
पढने का साहस करें। हम इन ग्रन्थों को पड या सुन कर जितना ही विचार करेंगे,
उतना ही हमारा आध्यात्मिक
विकास होगा और उसी अनुपात में हमे जीवन का वास्तविक आनन्द भी प्राप्त होगा।
अध्यात्म-विद्या दुखों के समस्त कारण एक ओर हटा कर हमारे अन्दर छिपा आनन्द का
द्वार खोल देती है। तत्वबोध,
भजगोविन्दमृ,
प्रश्नोत्तरी आदि पुस्तकों
का अध्यात्म विद्या की प्रारम्भक पाठृय पुस्तक समझना चाहिए।
प्रश्नोत्तरी का प्रत्येक प्रश्न
और उसका उत्तर एक मणिरत्न की भंति है। अध्यात्म-प्रेकियों के लिए वह बडा ही
मूल्यवान है। इसलिए शंकराचार्य जी ने इस पुस्तक के अन्तिम श्लोक में इसका नाम
’मणिरत्नमाला’
भी बताया है। कुछ
प्रकाशकों ने इसे इसी नाम से प्रकाशित किया है।
यह पुस्तक वैराग्य पर अधिक बल
देती है। सन्यासी का संन्यास वैराग्य पर ही टिका होता है। वैराग्य के बिना
संन्यासी ही क्या है?
'सब
जन भये जोग उपहासी,
जैसे बिन विराग संन्यासी।’
और
'सोचिय
जती प्रपंच रत,
विगत विवेक विराग।’
पुरुषों के हृदय में इस
महिमामय वैराग्य की स्थापना करने के लिए शंकराचार्य जी ने उन्हें स्त्रियों से
दूर रहने की शिक्षा बार-बार दी है। स्त्रियों में आसक्त रहने वाले पुरुष पुत्रः
कलत्रः,
धन-सम्पत्ति आदि सभी भैतिक
विषयों में लिप्त होते देखो गये है। उनसे बचने के लिए आचार्य ने स्त्रियों की
निन्दा
भी की है। तुलसीदास आदि अन्य सन्तों ने भी यही मार्ग अपनाया है। अरण्यकाण्ड के
अन्त में सीता जी के वियोग से दुःखी भगवान राम ने नारद जी के सामने
'प्रमदा
सब दुख खानि’
आदि कह कर स्त्री की बडी
निन्दा की है।
कुछ संकुचित विचार की स्त्रियॉ और
स्त्रियों से तथाकथित सहानुभूति रखने वाले कुछ पुरुष स्त्री निन्दा के ऐसे वचन
सुनकर लाल-ताते होते हैं। उन्हें शंकराचार्य जी,
तुलसीदास आदि का शेष
साहित्य भी पढना चाहिए। वहॉ उन्होंने निरपेक्ष दृष्टि से नारी को देखा है और
उसकी महानता भी स्वीकार की है। ये सन्त नारी को जिस आदर्शरूप में देखते थे या
देखना चाहते थे,
नारियों को उस ओर ध्यान
देकर विवेकपूर्वक अपनी स्थिति को समझना चाहिए।
यदि
कोई पुरुष स्त्री-लोलुप है और उसके कारण वह विपत्त जाल में फंस रहा है,
तो कोई
भी समझदार पुरुष उसे स्त्रियों का आदर करने वाला सभ्य पुरुष न मान लेगा। उसके
सामने सन्त पुरुष स्त्री की निन्दा कर ही उसकी रक्षा करने का प्रयास करेगा।
चतुर्थ अवस्था में तो संसार से विरक्त हो कर ज्ञान और भक्ति के द्वारा परमात्मा
से सम्बन्ध जोडने में ही कल्याण है।
अपार संसार समुद्र मध्ये
निमज्जतो मे शरणं किमस्त ।
गुरो गृपालो कृपया वदैतत्
विश्वेश पादांबुज दीर्घ नौका ।।1।।
शिष्य - हे कृपालु गुरु! इस अपार
संसार समुद्र के बीच में डूब रहा हुँ। आप कृपा करके बताइये कि मैं किसकी शरण
में जाऊँ?
गुरु - विश्वेश परमात्मा के
चरण-कमलों की बहुत बडी नौका है। (उसी में बैठ कर तुम संसार-सागर से पार हो सकते
हो)
व्याख्या
प्रश्न
1 -
संसार समुद्र से उद्वार का उपाय
क्या है?
हर मनुष्य सुख,
सुरक्षा और स्वतंत्रता
चाहता है। और उसके लिए आजीवन प्रयास भी करता है,
किन्तु जीवन के अन्त में
भी वह अपने को जहॉ का तहॉ पाता है। वह दु:खरहित
आनन्द की अवस्था में नहीं पहुँच पाता। किसी भी दशा में उसे सुरक्षा और
स्वतंत्रता का अनुभव नहीं होता। सब के सामने यह प्रकट सत्य है। अन्तर केवल इतना
दिखाई देता है कि कुछ लोग असुविधा के साथ दु:ख
आदि भोगते है और कुछ लोग नाना प्रकार की प्रचुर सुविधाओं के साथ दु:ख,
असुरक्षा और परतंत्रता
भोगते हैं। सृष्टि के आदि काल से मनुष्य के सामने यह चुनौती रही है। यह समस्या
सार्वभौमिक है। इसलिए सभी देशों के विद्वानों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और
समस्या का निदान खोजने में व्यस्त रहे हैं। उसके फलस्वरूप नाना प्रकार के दर्शन
और धर्मों का उदृभव हुआ।
भारत के प्राचीनकालीन ऋषियों ने
इस चुनौती को स्वीकार कर जो प्रयास किये,
वे सब से अधिक सराहनीय
हैं। उन्होंने जीवन का वह सुनिश्चित मार्ग खोज लिया जिस पर चलकर विश्व का कोई
मनुष्य समस्त दु:खों
से छुटकारा पा सकता है। ऋषियों का मत है कि मनुष्य की सभी समस्याओं की जड़ अपने
आत्मस्वरूप का अज्ञान है। अपने आपको भूलकर वह अपने शरीर को ही आत्मा मान लेता
है और शरीर से उत्पन्न होने वाली समस्याओं में वह फॅस जाता है। देहाभिमानी
मनुष्य का मन राग-द्वेष से ग्रस्त हो जाता है और उससे प्रभावित मन एक काल्पनिक
संसार की रचना कर लेता है। जैसे सोते समय मनुष्य स्वप्न की रचना कर उसे सत्य
मानता है,
उसमें होने वाले लाभ-हानि
से सुखी-दु:खी
होता है,
वैसे ही जाग्रत अवस्था में
वह अपना काल्पनिक संसार रचता है,
उसे सत्य मानता है और उसके
सुख-दुख से पीड़ीत रहता है। संसार हर मनुष्य की व्यक्तिगत रचना है। वह जगत् से
भिन्न है। जगत् ईश्वर की रचना है और सब प्राणियों के लिए एक समान उपलव्ध है। हर
व्यक्ति उस जगत् को अपने राग-द्वेष की दृष्टि से देखता है और उसे वहॉ अपना
संसार दिखाई देता है। इसे स्पष्ट करते हुए अपनी पुस्तक आत्मबोध में शंकराचार्य
कहते है -
संसार:
स्वप्नतुल्यो हि रागद्वेषादिसंकुल:
।
स्वकाले सत्यवदृभाति प्रबोधे
सत्यसदृभवेत् ।।
संसार स्वप्न के समान है। वह
रागद्वेषादि से युक्त है। अपने समय में वह सत्यवत् भासित होता है,
किन्तु जागने पर असत् हो
जाता है।
संसार से जागने का तात्पर्य है
संसार से निवृत्त हो जाना और मनुष्य का जगत् से सीधा संबंध बन जाना। यदि जगत्
को इश्वर की रचना और उसी की वस्तु मान कर हम व्यवहार करते रहें तो हमारे सुख-दु:ख
की कोई समस्या नहीं रह जाती। जब तक हम संसार में घिरे हैं,
हमारी स्थिति वही है जैसे
किसी समुद्र में डूब रहे हों,
या कुऍ में गिर गये हों या
किसी शिकारी के जाल में फॅस गए हों। इस दु:खदायी
संसार से बाहर निकल जाना ही मुक्ति है।
इतना सब जान लेने पर सम्भव है कि
हम संसार समाप्त कर मुक्त होने का प्रयास करने लगें,
किन्तु देखेंगे कि यह
कार्य इतना सरल नहीं है। संसार हमारी मानसिक कल्पना है किन्तु हम उसे सहसा नष्ट
नहीं कर सकते। इसलिए अनुभवी सदृगुरु से पूछना पडता है कि इससे मुक्ति कैसे मिले
?
गुरु का कथन है कि जैसे समुद्र
से पार जाने के लिए जहाज उपयोगी है वैसे ही हमें संसार से पार होने के लिए
इश्वर के चरण-कमलों का सहारा लेना चाहिए।
"विश्वेश"
विश्व का ईश अर्थातृ स्वामी है। उसने अपनी माया शक्ति से जगत की रचना की है और
प्राणियों के शरीर में प्रविष्ट हो कर वही जीव बना है। वह जीव और जगत् दोनों का
नियन्ता है। यदि हम अपने आप को ईश्वर से जोडते हैं तो संसार से हमारा सम्बन्ध
समाप्त हो जाता है। जैसे हम धन-सम्पत्ति और परिवार पर आश्रित रहते हैं,
उसे सत्य मानते हैं और
उससे अपनी सुरक्षा समझते हैं,
वैसे ही हम अपने हृदय में
चिदानन्द रूप में विराजमान परमात्मा को ही सत्य समझें,
उसी को सुखस्वरूप माने और
उसी पर आश्रित रहें। इसी में हमारा निस्तार है।
बद्धो हि को
यो विषयानुरागी
को वा
विमुक्तो विषये विरक्तः ।
को वाऽस्ति
घोरो नरकः स्वदेहः
तृष्णाक्षयः
स्वर्गपदं किमस्ति ।।2।।
शिष्य
- बद्ध कौन है?
गुरु
- जो विषयों में आसक्त है। शिष्य - मुक्त कौन है?
गुरु
- जो विषयों से से विरक्त है। शिष्य - घोर नरक कौन सा है?
गुरु
- अपना देह। शिष्य - स्वर्ग पद कौर सा है?
गुरु
- तृष्णा का नाश।
व्याख्या
प्रश्न
2 -
बन्धन
में कौन है?
विषयों में अनुराग रखने वाला पुरुष ही बन्धन में है। विषय
पांच हैं - शब्द,
स्पर्श,
रूप,
रस और
गंध। ये पाँच महाभूतों की तन्मात्रायें हैं आकाश,
वायु,
अग्नि,
जल और
पृथ्वी पाँच महाभूत हैं। शब्दादि इसकी तन्मात्रायें ही
हमारी इन्द्रियों के लिए विषय हैं। स्वभावतः ये विषय
सुखदायी लगते हैं और इनमें हमारा राग-द्वेष होता है।
अनुकूल होने पर विषय सुखदायी लगते हैं और उनमें आसक्ति हो
जाती है। आसक्ति के कारण हम विषयों के अधीन हो जाते हैं,
उनके
बिना हम अपना जीवन निरर्थक समझने लगते हैं और विषय हमें
अपने बन्धन में बाँध लेते हैं
बार-बार विषयों का सुख लेते रहने पर चित्त में उनका
संस्कार निर्मित होता है। संस्कार दृढ होकर वासना का रूप
धारण कर लेता है। वासना के कारण मनुष्य की विषय-सुख की
इच्छा बार-बार होती है। वह उन्हें प्राप्त करने और भोगने
का प्रयास करता है। आसक्ति युक्त भोग से वासना बार-बार दृढ
होती रहती है। जीवन के अन्त तक वह बहुत बढ जाती है।
वासनाओं की तृप्ति के लिए जीव को बार-बार शरीर धारण करना
पडता है। यह जीव के लिए विवशता है। इसे बंधन कहते हैं।
इस प्रकार जीव विषयासक्ति के बंधन में पड़कर पुनर्जन्म के
दुःख भोगता है। किसी पुण्यकर्म के कारण सत्संग प्राप्त
होता है तो जीव को अपनी समस्या का बोध होता है। वह अपने
बंधन से छूटना चाहता है। उसके लिए वह परमात्मा का सहारा
लेता है। निरन्तर प्रयासरत रहने पर जीव मुक्त हो सकता है।
प्रश्न
3 -
अब
प्रश्न यह है कि मुक्त कौन है?
यदि विषयों में अनुराग नहीं रह जाता,
मनुष्य विरक्त हो जाता है तो वह मुक्त ही है। विषयों में
राग न रहना ही वैराग्य या विरक्ति है।
विषयों का राग या आसक्ति स्वतः समाप्त नहीं हो जाती।
वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ शिथिल और दुर्बल हो जाने पर
अनासक्त हो जाने का भ्रम होता है। वस्तुतः वासनायें बडी
सूक्ष्म और गहन होती हैं। वे वृद्धावस्था में सूक्ष्मस्प
से बीज के समान चित्तभूमि में पडी रहती हैं। मरने के बाद
जब अगला शरीर मिलता है,
तो
इन्द्रियाँ फिर सशक्त होने लगती हैं और पूर्व जन्म की
वासनाऍ अंकुरित होकर जीव को पुनः भोगों में प्रवृत्त कर
देती है। इस प्रकार जीव का बंधन जन्म-जन्मान्तर चलता है वह
स्वतः कभी मुक्त नहीं होता।
मुक्त होने के लिए जीव को प्रयास करना होता है। उसके लिए
एक सुनिश्चित क्रमबद्ध रास्ता है। उस पर धैर्य के साथ आगे
बढते रहने से अन्त में आत्मा और परमात्मा का ज्ञान होता
है। उसे अनुभव हो जाता है । फिर वह विषयों का सुख झूठा
समझकर त्याग देता है। विषयों का यह वैराग्य ही मुक्ति का
लक्षण है।
अविद्या से संसार की उत्पत्ति होती है। संसार से घिरा जीव
विषयों में आसक्त रहता है। विषयासक्ति के कारण कामना और
कर्म का निरन्तर दबाव बना रहता है। कर्म शुभ और अशुभ दो
प्रकार के हो सकते हैं शुभ कर्म करने से उसका फल स्वर्ग और
सुख प्राप्त होता है। अशुभ कर्म करने से नरक का दुःख भोगना
पडता है। ये स्वर्ग और नरक क्या है?
इस
विषय में नाना मत हो सकते है।
प्रश्न
4 -
घोर
नरक क्या है?
ऐसा प्रसिद्ध है कि नरक एक लोक है जहां जीव अपने पापों का
फल भोगता है। पाप का फल दुःख है। गरुड पुराण आदि पढने से
प्रतीत होता है कि नरक लोक यहां से बहुत दूर नीचे की ओर एक
स्थान है। यमराज के दूत पापी जीव को बॉध कर ले जाते हैं और
नाना प्रकार की पीड़ा देते हैं। विभिन्न प्रकार के पापों
के लिए नरक रूपी कारागार में तरह-तरह के दण्ड दिये जाते
हैं। जीव को ये दण्ड भोगने के लिए यातना शरीर प्राप्त होता
है। जीव बहुत कष्ट पाने पर भी उस शरीर को छोड नहीं पाता।
यह काटने-छाटने से पीड़ा तो देता है किन्तु नष्ट नहीं
होता।
ऐसे नरक का वर्णन संसार के सभी सम्प्रदायों में किया गया
है। इससे ज्ञात होता है कि नरक की अवधारणा मिथ्या नहीं है।
वह मनुष्य को पाप कर्म से विरत करने के लिए मात्र डराने
धमकाने की बात नहीं है। फिर भी शास्त्र जो कहना चाहते हैं
उसे समझ पाना सरल नहीं है। वस्तुतः लोक का अर्थ कोई स्थान
नहीं है। मृत्यु लोक का अर्थ यह पृथ्वी नहीं है,
जिस
पर हम रहते हैं। स्वर्ग और नरक भी वैसे लोक नहीं हैं,
जिनकी
प्रायः कल्पना की जाती है।
’लोक’
शब्द
लुकृ धातु से बना है जिससे लोचन या अवलोकन शब्द बनते हैं।
इसलिये लोक शब्द का अर्थ अनुभव का क्षेत्र है। इसे समझने
के लिए हमें
’स्वप्न
लोक’
की ओर
ध्यान देना चाहिये। स्वप्न भी एक लोक है,
किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि वह कहां है। वह हमारे अनुभव
में आता है और हम उसमें सुख-दुःख का भी अनुभव करते हैं।
इसी प्रकार स्वर्ग भी हमारे अनुभव में आता है। उसमें हम
अपने इच्छित पदार्थ पाते हैं और भोगते हैं। नरक में हमें
अनिच्छित दुःख भोगने पडते हैं वे दुःख अनुभवजन्य हैं।
मृत्युलोक पृथ्वी पर नहीं है,
वरन्
शरीर में अहंभाव और उसमें मरण का भय मृत्युलोक है। हम सब
लोग मरने की सम्भावना मानते हैं और उससे डरते हैं। मनुष्य
ही नहीं,
अन्य
प्राणीयों के साथ भी यही समस्या है। वे भी मृत्यु लोक में
हैं किन्तु नारकीय दुःख भोगते हैं।
मरने के पहले शरीर में नाना प्रकार के विकार और रोग
उत्पन्न होते हैं। उनके कारण उत्पन्न होने वाला कष्ट,
पीडा
और दुःख नरक का वातावरण उत्पन्न करता है। इस नारकीय वेदना
का कारण देहाभिमान है। जाग्रत अवस्था में देहाभिमान स्थूल
शरीर में होता है,
सोते
समय स्वप्न के सूक्ष्म शरीर में होता है और मरने के बाद
देव-शरीर या यातना-शरीर प्राप्त होता है।,
उसमें
भी जीव की आसक्ति रहती है। इस रहस्य का विस्तृत वर्णन
शंकराचार्य ने वूहदारण्यक उपनिषदृ में किया है। संक्षेप
में यहॉ
’स्वदेह’
कह कर
वे देहाभिमान की ओर ही संकेत करते हैं।
शरीर में तो ब्रह्म ज्ञानी,
जीवनमुक्त और भक्त लोग भी रहते हैं किन्तु वे उसमें आसक्ति
न रखने के कारण लोकातीत अवस्था में पहुचँ जाते है।
प्रश्न
5 -
स्वर्ग का पद कौन सा है?
अभी हम विचार कर रहे थे कि नरक आदि लोक क्या हैं। वहीं यह
भी स्पष्ट हो गया कि स्वर्ग से शस्त्रकारों का क्या
तात्पर्य है। शंकराचार्य का कथन है कि तृष्णा का नाश ही
स्वर्ग का पद है। इस कथन से इतना तो स्पष्ट है ही कि हमें
किसी स्थल विशेष को स्वर्ग नहीं समझ लेना चाहिए। स्वर्ग
हमारी आन्तरिक दशा ही है।
गीता के अनुसार काम,
क्रोध
और लोभ नरक के तीन द्वार हैं। इन तीनों को एक र्शद में
तृष्णा भी कह सकते है। तृष्णा के कारण मनुष्य पाप कर्म
करता है और नरक जाता है। उसे इस जीवन में और आगे आने वाले
जीवन में नाना प्रकार की यातनायें भोगनी
पडती हैं। तृष्णा नष्ट हो जाने पर काम,
क्रोध
आदि विकार नहीं रह जाते। निर्विकार मन से कोई पाप नहीं
करता। वह तो पुण्य कार्य ही करता है। पुण्यों के कारण अपने
अन्दर जो सुखानुभूति होती है वह स्वर्ग ही है। यह
सुखानुभूति घटती-बढती और आती-जाती रहते है,
इसलिए
इसे लोक ही समझना चाहिए। यह मुक्ति की अवस्था नहीं है।
संसार
हृत्कस्तु निजात्म बोधः
को मोक्ष
हेतुः प्रथितः स एव ।
द्वारं
किमेकं नरकस्य नारी
का स्वर्गदा
प्रणभृतामहिंसा ।।3।।
शिष्य - संसार का हर्ता कौन है?
गुरु
- अपने आत्मा का ज्ञान संसार नाश करनेवाला है। शिष्य -
मोक्ष हेतु कौन है?
गुरु
- अभी जो कहा,
वही
मोक्ष का हेतु है। शिष्य - नरक जाने का एक द्वार कौन है?
गुरु
- स्त्री ही नरक का द्वार है। शिष्य - प्राणियों को स्वर्ग
प्राप्त कराने वाला क्या है?
गुरु
- अहिंसा से ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
प्रश्न
6 -
संसार का नाश कैसे होता है?
स्मरण रखना चाहिए कि संसार अज्ञानी जीव की अपनी मानसिक
रचना है। जैसे स्वप्न या मनोराज्य मन की कल्पना है,
वैसे
ही संसार भी मन की कल्पना है। मनुष्य इस रहस्य को न समझकर
संसार को सत्य मानता है और उसका बंधन तथा सुख-दुःख भी सत्य
मानता है। शास्त्र और सन्त की कृपा से संसार का यथार्थ रूप
समझ में आता है और उससे मुक्त होने का विचार भी उत्पन्न
होता है।
शिष्य का सर्वप्रथम प्रश्न भी संसार के विषय में ही था। वह
संसार-सागर से पार जाने का उपाय जानना चाहता था। गुरु ने
बताया कि विश्वेश के चरण-कमलों की नौका के द्वारा
संसार-समुद्र से पार हो सकते हैं। यहां शिष्य संसार के
विनाश का उपाय जानना चाहता है। उसका यह पूछना उचित ही है,
क्योंकि संसार का विनाश भी हो सकता है। जैसे स्वप्न का
अन्त होता है या किसी भ्रान्ति का नाश होता है,
वैसे
ही संसार का भी अन्त या नाश हो सकता है।
संसार की उत्पत्ति अविद्या से होती है,
इसलिए
अविद्या के नाश से संसार भी नष्ट हो सकता है। उदाहरण के
लिए |