स्थापना

 

सन 1947 में सैकड़ों वर्षों की पराधीनता के बाद भारतवर्ष को राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त हुई, किन्तु समाज के प्रमुख लोगों में पश्चिमी सभ्यता का रंग चढ़ा था। हिन्दू धर्म का महत्व हिन्दू के मन में ही लुप्त हो गया था। धर्म और संस्कृति ही किसी राष्ट्र की आत्मा होती है। उसके आच्छादित हो जाने पर जनता के मन में दुर्बलता जाती है। उसे दूर करने के लिए देश के विद्वानों ने अनेक धार्मिक सुधार के आन्दोलन प्रारम्भ किए। उसी समय सन 1951 में स्नातन धर्म को आधार बनाकर चिन्मय आन्दोलन का उदय हुआ। इस आन्दोलन के प्रवर्तक स्वामी चिन्मयानन्द थे। उन्होनें स्वामी शिवानन्द से सन्यास की दीक्षा ली थी और स्वामी तपोवन महाराज से वेदान्त ग्रन्थ पढ़े थे तथा उनके निर्देशन में आध्यात्मिक साधना की थी। उन्होनें स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थमहर्षि अरविन्द, महर्षि रमन आदि का साहित्य पढ़ा था। उनके सामने भावी राष्ट्र का एक आदर्श चित्र था। उसे मूर्तिमान करना चाहते थे। उसके लिए उन्होनें ज्ञान यज्ञों की योजना बनाई। इसका सिलसिला पूना नगर से प्रारम्भ हुआ।

 

दो वर्ष बाद 8 अगस्त 1953 को स्वामी से प्रभावित कुछ भक्तगणों ने अध्ययन और विचार विमर्श हेतु एक फोरम बनाने का निश्चय किया। स्वामी जी उस समय उत्तरकाशी में थे। उन्होनें उत्साह के साथ अपनी योजना "चिन्मय मिशन" नामक नये संगठन के निर्माण हेतु स्वामी जी को पत्र लिखा। उनका उत्तर आया कि मेरे नाम से किसी संगठन का निर्माण करें। में यहाँ प्राचीन सन्तों का संदेश देने आया हूँ मैं उनसे लाभान्वित हुआ हूँ। यदि मैनें तुम्हें किसी प्रकार से लाभान्वित किया हो तो तुम भी इसे जारी रखो। भक्तों ने स्वामी जी को फिर लिखा कि "चिन्मय" शब्द परमात्मा का वाचक हैइसलिए हमनें उसी नाम से "चिन्मय मिशन" का प्रारम्भ किया।

 

चिन्मय मिशन का मुख्य उद्देश्य यही है कि संसार के किसी क्षेत्र के व्यक्ति को वेदान्त ज्ञान प्रदान कर उसे आत्मोन्नति करते हुए सुख समृद्दि प्राप्त करने में और समाज का उपयोगी अंग बनने में सहायता करें। स्वामी जी के अथक परिश्रम के फलस्वरूप इसका संदेश विश्व के अनेक देशों में तथा भारत के कोने- कोने में फैलता गया। इसका आधार सनातन धर्म और उसके धर्म ग्रन्थ रामायण उपनिषद् आदि है। जनता में इसका ज्ञान कराने के लिए आठ - दस दिनों के ज्ञान यज्ञ किए गए और उसके बाद श्रोताओं ने स्वाध्याय मण्डल स्थापित कर अपने धर्म ग्रन्थों का अध्ययन प्रारम्भ किया। इस प्रकार दस वर्ष तक अनेक नगरों में चिन्मय मिशन का विस्तार होता गया। अब यह आवश्यकता समझ में आने लगी कि सभी स्थानीय केंन्द्रों में सामंजस्य रखने के लिए तथा उनको मार्ग - निर्देशन देने के लिए एक केन्द्रीय संगठन बनाया जाये। अत: 1964 में मुम्बई में एक शिखर संस्था की स्थापना हुई और उसका नाम रखा गया "सेन्ट्रल चिन्मय मिशन ट्रस्ट" इस प्रकार यह एक रजिस्टर्ड संस्था बन गई और इसका कार्य विधिवत होने लगा। इस समय सेन्ट्रल चिन्मय मिशन ट्रस्ट द्वारा विश्व में 243 मिशन केंन्द्रो के अतिरिक्त, भारत में स्थापित 37 सेवा ट्रस्टों के कार्य - कलापों पर भी नियन्त्रण रखा जाता है।

 

गतिविधियाँ

 

वेदान्त प्रशिक्षण

 

हिन्दू धर्म का मुख्य दर्शन वेदान्त है। जैसे भौतिकी, रसायनशास्त्र, जीवविज्ञान आदि बाह्यजगत् के भौतिक विज्ञान है वैसे ही वेदान्त आन्तरिक जगत् का विज्ञान है। यह जीवन का विज्ञान है। मानव निर्माण में सहायक वेदान्त का ज्ञान चिन्मय मिशन ज्ञानयज्ञ, आध्यात्मिक शिविर, मिशन केन्द्रों पर नियमित कक्षायें, सवाध्याय मण्डल, पत्राचार पाठ्यक्रम,  ई मेल वेदान्त, वेदान्त पाठ्यक्रम के द्वारा देता है।

 

बाल विहार

स्वामी चिन्मयानन्द जी ने एक बार कहा था " बच्चे ज्ञान से भरने के लिए खाली पात्र नहीं, वे तो प्रज्वलित करने के लिए दीपक है" । बाल विहार में पाँच से पन्द्रह साल के बच्चे सप्ताह में एक बार मिलते हैं। प्रशिक्षित सेवक उनकी बैठक मिशन सेंटर या अपने घर में लगाते हैं। वहाँ बच्चों को प्रेमपूर्ण वातावरण में भजन गाकर, शास्त्रों का पाठ कराकर, पुराणों की कहानियाँ सुनाकर तथा अन्य रुचिकर साधनों से सदाचार और संस्कृति की शिक्षा दी जाती है। भारत तथा अन्य देशों में सैकड़ों बाल विहार चिन्मय मिशन केन्द्रों पर चल रहे हैं।    

 

चिन्मय युवा केन्द्र

 

चिन्मय मिशन के युवा संवर्ग का नाम चिन्मय युवा केन्द्र है। इसमे 16 से 28 वर्ष के बच्चे भाग लेते हैं। इसका उद्देश्य है,   " सक्रिय आध्यात्मिक ज्ञान द्वारा युवा शक्ति को सन्मार्ग में लगाना" इसके लिए युवकों की साप्ताहिक कक्षायें लगती हैं जहाँ उन्हें शास्त्र अध्ययन के द्वारा अपनी निहित शक्ति का ज्ञान कराया जाता है।  चिन्मय युवा केन्द्र को संक्षेप में " चिक" कहते है।

 

सेन्ट्रल चिन्मय वानप्रस्थ संस्थान

 

संक्षेप में इसे " सिसिभिएस" कहते है। यह चिन्मय मिशन के वरिष्ठ नागरिकों का संवर्ग है। इसके अन्तर्गत 60 वर्ष से अधिक आयु के स्त्री -  पुरुष संगठित हुए हैं। " सिसिभिएस" वरिष्ठ नागरिकों को आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त करने की प्रेरणा देता है और उसे प्राप्त करने का मार्ग भी दिखाता है। वह उन्हें समाज पर निर्भर न रहने की प्रेरणा देता है।

 

देवी मंडल

 

यह संवर्ग केवल महिलाओं के लिए है। वे सप्ताह में एक बार किसी स्थान पर मिलकर शास्त्रों का अध्ययन करती हैं, भजन गाती हैं तथा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम करती हैं। देवी मण्ड़ल महिलाओं को ऐसा अनुकूल अवसर भी प्रदान करता है जहाँ वे अपनी समस्यायें स्पष्ट रूप से व्यक्त कर उनके समाधान पर विचार करती हैं।

 

भजन मंडल

 

यह संवर्ग केवल भक्ति को प्रधानता देता है। इसके सदस्य सप्ताह में एक बार मिलकर वैदिक पाठ और भजन करते हैं। इसमें सभी वर्ग के स्त्री पुरुष भाग ले सकते हैं।

 

विद्यालय और महाविद्यालय

 

चिन्मय मिशन के विद्यालय या महाविद्यालय कुछ भिन्न प्रकार का हैं। इसमें अन्य विषयों के साथ चिन्मय विजन प्रोग्राम भी जोड़ा गया है। यह प्रोग्राम चिन्मय मिशन ने तैयार किया है। यह इतना अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है कि मिशन के विद्यालयों के अतिरिक्त भी 500  बाहरी विद्यालयों में इसे स्वीकार कर लागू किया गया है।

 

पितामह सदन

(वृद्धाश्रम)

 

भारत में चिन्मय मिशन के आठ पितामह सदन है। वे कानपुर, इलाहाबाद,  रीवां , तमरायपक्कम,  कोयम्बटूर, एलायपल्ले, कोठापटनम् और कोल्हापुर में स्थित है।

इन पितामह सदनों में साधारण खर्चे पर सुविधापूर्ण आवास, शाकाहारी पौष्टिक भोजन, पुस्तकें,  टेलीविजन, वीडियों प्लेयर, वीडियों टेप और ध्यान की सुविधायें हैं। यहाँ विशेष ध्यान आध्यात्मिक वातावरण बनाये रखने का होता है। उसके लिए पूजा - पाठ प्रवचन तथा शिवरों का आयोजन किया जाता है।

 गुगल मेप में देखे 

 सेन्ट्रल चिन्मय मिशन ट्रस्ट, साकी विहार रोड़,

 सांदीपनी साधनालय, मुम्बई - 400072

फोन- 091- 022-28572367,28575806,फेक्स- 091- 022-28573065

-मेल - ccmtpublications@chinmayamission.com

ccmt@vsnl.com

 

चिन्मय मिशन

चिन्मय मिशन एक आध्यात्मिक संस्था है जो गुरुदेव स्वामी चिन्मयानन्द जी  द्वारा स्थापीत की गई. शेष ...

वेदान्त अध्ययन