पञ्चदशी पर प्रवचन की एम पी थ्री

 
 

ग्रन्थ - पञ्चदशी

 

श्री विद्यारण्य स्वामी की अन्य सभी रचनाओं की अपेक्षा 'पञ्चदशी' अधिक लोकप्रिय हुई है। इसमे अद्वैत वेदान्त का निरुपण क्रमबद्घ, स्पष्ट और सविस्तार हुआ है। यद्यपि इसमे विरोधी मतों के खण्डन का प्रयास नहीं किया गया है फिर भी प्रतिपाद्य विषय को स्पष्ट करने के लिए उनमें दोष अवश्य दिखाये गये हैं। ग्रन्थ का मुख्य उद्देश्य वेदान्त में रुचि रखने वाले व्यक्तियों को उसका सुखपूर्वक सम्यक् ज्ञान कराना ही है। लेखक ने इस विषय का प्रमाण उपनिषद् माना है, इसलिए मन्त्रों को उद्धृत करने मे कोई संकोच नहीं किया गया है। तर्क उपनिषद् प्रतिपादित सत्य का अनुगामी रहा है। तदनुरूप अनुभव प्राप्त करना उसका अन्तिम प्रमाण है। उसके साथ वेदान्त ज्ञान का फल जुड़ा हुआ है। ब्रह्म और आत्मा के एकत्व ज्ञान के अनुभव में ही कृत्कृत्यता, मुक्ति और् परमानन्द की उपलब्धि है।

 

ग्रन्थकार - परम पूज्य श्री विद्यारण्य स्वामी

 

मानव मात्र के लिए कल्याणकारी जीवन जीने का विधान वेद मे संग्रहीत है। वेद की ही अन्तिम शिक्षा वेदान्त है। उसे उपनिषद भी कहते हैं। उसका परम पवित्र ज्ञान मनुष्य को सब कल्मष से मुक्त कर आनन्द, शान्ति और पुर्णता प्रदान कर देता है। प्रबुध्द लोग प्राचिन काल से ही उसका आदर करते आ रहे हैं। पहले यह ज्ञान भारत में ही केन्द्रित था, किन्तु अब संसार की सभी भाषाओं में यह ज्ञान उपलब्ध है। वैज्ञानिक विकास के साथ आवागमन और सम्पर्क के साधन बढे और उसी के साथ यह ज्ञान भी दुर-दुर फैला। अन्य देशों में इसका आदर होते देखकर हम भारतवासियों ने भी अपने पूर्वजों के द्वारा आर्जित् इस सम्पत्ति का मूल्य समझा और इसका अध्ययन कर इसे अपने जीवन में लाने का प्रयास कर रहे हैं। 

वेद और उपनिषदों की भाषा तथा उनकी शैली कुछ जटिल है अथवा यह कहें कि आधुनिक भाषाओं का प्रयोग कर रहे मनुष्यों के लिए उनकी भाषा अभ्यास से बाहर होने के कारण कठिन प्रतीत होती है।  इस समस्या का निवारण करने का प्रयास पहले भी हुआ है और अब भी हो रहा है। इसी कारण वेदान्त के नये-नये ग्रन्थों की रचना होती रहती है। शंकराचार्य जी ने उपनिषद् आदि आर्ष ग्रन्थों पर भाष्य लिखकर उनका तात्पर्य स्पष्ट किया है और उन्होंने वेदान्त-दर्शन पर अनेक ग्रन्थ भी लिखे हैं।   उनके बाद उनके शिष्यों और अनुयायियों ने भी इस दिशा मे प्रयास जारी रखा। उनकी रचनाओं में श्री विद्यारण्य स्वामी के कई ग्रन्थ बडे महत्वपुर्ण और् ख्यातिप्राप्त हैं। वे भगवान् शंकराचार्य द्वारा स्थापित श्रृंगेरिमठ के आचार्य पद पर सन् १३७७ से १३८६ तक आसीन रहे। वे वेद-भाष्य रचयिता श्री सायण के भाई थे और स्वयं भी बडे विद्वान थे। उन्होने पञ्चदशी, सर्वदर्शन्-संग्रह, श्री शंकर दिग्विजय, जीवन-मुक्ति विवेक, अनुभूति प्रकाश, विवरण प्रमेय संग्रह, उपनिषद् दीपिका आदि कई ग्रन्थ लिखे हैं।  दृग्दृश्य विवेक पुस्तक के रचयिता भगवान् शंकराचार्य हैं अथवा विद्यारण्य स्वामी, इस विषय मे विवाद है।  

प्रवचन / व्याख्या - परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द

 

परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी चिन्मय मिशन के महान विभूति में से थे। उनका सारा जीवन मिशन के आध्यात्मिक कार्यो को आगे बढ़ाने में लगा रहा। गुरुदेव के कई ग्रंथो का हिन्दी अनुवाद करना और पञ्चदशी जैसे ग्रन्थो की व्याख्या करना अपने जीवन में उनका मुख्य योगदान रहा है। वो पुस्तकों से नहीं अपने अनुभव से व्याख्या करते थे। हिन्दी अध्यात्मिक जगत को उनका योगदान अतुलनीय है।स्वामी जी जगह-जगह पञ्चदशी पर शीवीर लगाया करते थे। कई साधको ने उनके शीवीर में पञ्चदशी पर उनके प्रवचनों को रीकार्ड करने की कोशीश की है। कुछ अध्याय जीनकी रीकार्डींग सुनने लायक हो पायी है , हम उसे यहाँ प्रस्तुत कर रहे है। 
 

 

चिन्मय मिशन

चिन्मय मिशन एक आध्यात्मिक संस्था है जो गुरुदेव स्वामी चिन्मयानन्द जी  द्वारा स्थापीत की गई. शेष ...

वेदान्त अध्ययन