ब्रह्मानन्दगत अद्वैतानन्द
ब्रह्म का आनन्द अपने प्रकार का एक है। वह अखण्ड है। उसके विभाजन नहीं हो सकते। किन्तु उस आनन्द तक पहुँच कर उसकी अनुभूति तीन प्रकार से हो सकती है - योग (ध्यानयोग) के द्वारा, इसलिए उसका नाम रखा है योगानन्द और उसका वर्णन ग्यारहवें अध्याय में किया; दूसरे आत्मा के परमप्रेमस्वरूप का विचार करने से, इसलिए उसका नाम रखा आत्मानन्द और उसका वर्णन किया बारहवें अध्याय में; तीसरे ब्रह्म की अद्वेत सत्ता का विचार करने से, इसलिए उसका नाम रखा अद्वैतानन्द और उसका वर्णन करते है इस तेरहवें अध्याय में। पिछले अध्याय में फलरूप में योगानन्द और आत्मानन्द को एक ही कह आये है। इस अध्याय में वर्णित अद्वैतानंद का भी वही फल है।
ब्रह्म
के आनन्द से ही समस्त जगत् की उत्पत्ति होती है और उस
आनन्द में ही सब प्राणी जीते हैं। जगत और जीवों का समस्त
द्वैत अन्ततः अपने उत्पत्ति-स्थान आनन्द में ही लीन हो
जाता है। इसलिए आनन्द से भिन्न कुछ भी नहीं हो सकता। आनन्द
अद्वैतरुप होने के कारण इस अध्याय का नाम अद्वैतानन्द रखा
गया।
प्रवचन का समय- 15 घंटे
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