ब्रह्मानन्दगत आत्मानन्द
ब्रह्मानन्दगत योगानन्द नाम के पिछले ग्यारहवें अध्याय के 86 वें श्लोक में कह आये हैं कि ब्रह्मानन्द, वासनानन्द और विषयानन्द - यही तीन प्रकार के आनन्द हैं। इनके अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का कोई आनन्द नहीं है। सुषुप्तावस्था में स्वयं प्रकाशस्वरुप अनुभव में आने वाला सुख ब्रह्मानन्द है। उस अवस्था से जाग्रदवस्था में आने पर कुछ काल उदासीन दशा रहती है। उसमें भी सुख का अनुभव होता है। यह ब्रह्मानन्द की वासना है। इसलिए इसे वासनानन्द कहते है। काम्य विषय के प्राप्त होने पर मन शान्त होकर अन्तर्मुखी हो जाता है। उस अवस्था में ब्रह्मानन्द चित्तवृत्ति में प्रतिबिम्बित होता है। यह प्रतिबिम्बित सुख विषयानन्द है। यही तीन प्रकार के आनन्द हैं। इस जगत में उनके अतिरिक्त अन्य कोई आनन्द नहीं है।
विद्यानन्द विषयानन्द के ही अन्तर्गत आता है और ब्रह्मानन्द के अन्तर्गत योगानन्द, आत्मानन्द और अद्वैतानन्द आ जाते है। योगानन्द का वर्णन पिछले अध्याय में हो चुका। अहंकार की वृत्ति क्षीण होने पर ब्रह्मानन्द निरावृत होकर अनुभव में आता है। योग साधना के द्वारा यह सम्भव होता है, इसलिए इसे योगानन्द कहते हैं। इस अध्याय में ब्रह्मानन्द का वर्णन आत्मानन्द के रुप में हुआ है। यह योगाभ्यास के बिना भी सम्भव है।
प्रवचन का समय- 16 घंटे
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