द्वैत विवेक

 

हमारे सब प्रकार के दु:खो का कारण अविद्या है इसी ने हमारे आनन्दमय स्वरुप को अच्छादित कर अनात्मा के मोह में डाल दिया है इससे निवृत होने का मार्ग एक मात्र विवेक ही है विवेक विचार से ह आत्मा अनात्मा का अन्तर समझकर अविद्या के जाल से मुक्त हो सकते है पहले अध्याय में प्रत्यक तत्व विवेक द्वारा, दुसरे अध्याय में पंचमहाभूत विवेक द्वारा और तीसरे में पंचकोश विवेक द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करने का मार्ग दिखाया गया है

इस अध्याय में द्वेत विवेक का विचार किया जा रहा है इश्वर ने इस सृष्टि की रचना की और उसी के साथ जव की भी उत्पत्ति हुईव ने भी एक सृष्टि रच ली और वह अपनी रची हुई सृष्टि के जाल में फँस गया जीव की रची हुई सृष्टि उसका संसार है इश्वर की सृष्टि जगत है यही द्वेत है इसका विवेक होने पर जीव का भ्रम मिट जाता है वह अपने रचे हुए संसार जाल से छुटकारा पा जाता है
 

प्रवचन का समय- 12 घंटे

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द्वैतविवेक

 

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