कूटस्थदीप

 

हम अज्ञान के कारण अपने को शरीर समझतें हैं और संसार की समस्याओं से दुखी होते हैं। अपने दुखों से छुटकारा पाने का यही उपाय है की हम अपने अज्ञान को दूर कर अपने वास्तविक स्वरुप को पहचानें। वेदांत मत के अनुसार हम सहसा ब्रह्मभाव में नहीं पहुँच सकतें। उसकी एक विशेष प्रक्रिया है

सबसे से प्रथम हम अपनी विवेक बुद्धि के द्बारा शरीर और जीव में भेद पहचानें। अपने को जन्मने मरने वाला शरीर नहीं, वरण जीव समझें। अब हमें अपने सूक्ष्म विवेक के द्वारा अन्वय व्यतिरेक विधि से कूटस्थ को खोजना और पहचानना चाहिए।

कूटस्थ ही ब्रह्म है, इसलिये कूटस्थ के ज्ञान से ब्रह्मज्ञान भी संभव है। 'कूटस्थ' का अर्थ है लोहार की  निहाई इसलिए कूटस्थ का अर्थ हुआ निहाई की भाँती स्थिर और निर्विकार रहे वाला आत्मा । यह कूटस्थ हमारे अन्दर आने वाले अनुभव चिदाभास से भिन्न है। कूटस्थदीप नामक इस अध्याय का मुख्य प्रतिपाद्य विषय कूटस्थ की खोज कर उसे चिदाभास से पृथक् करना और ब्रह्म के साथ उसकी एकात्मता को प्रदर्शित करना है।  

प्रवचन का समय- 10 घंटे

फाईलों का भार - 147.6 एम बी

 

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कूटस्थदीप-1

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