नाटकदीप

 

दीप प्रकरण का अंतिम अध्याय नाटकदीप है। इसके नाम से ही ज्ञात होता है कि इस अध्याय में नाटक के दृष्टांत से हमारी आन्तरिक स्थिति का निरूपण किया गया है। मानों एक सभा में दीपक रूप साक्षी विधमान है और इसके प्रकाश में सभा का स्वामी अहंकार और सभासद विषय प्रकाशित हो रहे हैं, बुद्धि रुपी नर्तकी नाच रही है और इन्द्रियाँ उसमे ताल दे रही हैं। ये सब उसी साक्षी रुपी दीपक से प्रकाशित हो रहे है। सभा उठ जाने पर वहाँ कोई नहीं रहता केवल स्वयं प्रकाश स्वरुप दीपक के समान साक्षी रह जाता है। इस दृष्टांत से हम अपना साक्षी स्वरुप आत्मा को जान सकते है।

 

प्रवचन का समय- 4 घंटे

फाईलों का भार - 56.7 एम बी

 

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नाटकदीप-1

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