तृप्तिदीप
पिछले
अध्याय चित्रदीप में चित्रपट के दृष्टान्ट
से परमात्मा पर आरोपित इश्वर, जीव
और जगत का विवेचन करते हुए यह दिखा दिया कि अपना वास्तविक
स्वरुप परमात्मा ही है।
नामरूपात्मक भेद मायाकृत है। उनकी
उपेक्षा करने पर अपना सत्स्वरूप
शेष रहता है।
अब इस अध्याय में आत्म ज्ञान का फल दिखाते है।
जीव अज्ञान के कारण अपने को भोक्ता
और जगत के विषयों को भोग्य समझता है।
इनमें उसकी सत्यत्व बुद्धि होती है।
इस अवस्था में वह भोग्य पदार्थो की
कामना करता है और उसकी कामना निरंतर बढ़ती
रहती है। वह कभी तृप्ति का सुख नहीं
पाता।
विचारपूर्वक आत्मज्ञान होने पर भोक्ता
और भोग्य पदार्थ मायाकृत और उपेक्षणीय
सिद्ध होते है। अतः कामना उत्पन्न
होने का अवसर नहीं रह जाता। कामना
का अभाव ही तृप्ति है। आत्मा
स्वयं आनंदस्वरूप है।
आत्मज्ञानी व्यक्ति आत्मा के आनंद में ही रमण करता
है। उसी में सन्तुष्ट
और तृप्त रहता है। इस आत्मा
- तृप्ति को प्रकाशित करना ही इस अध्याय का प्रतिपाद्य
विषय है।
प्रवचन का समय- 39.41 घंटे
फाईलों का भार - 641 एम बी
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