ब्रह्मानन्दगत विद्यानन्द
श्री भारतीतीर्थ मुनि के मतानुसार आनंद
तीन प्रकार के है - 1 ब्रह्मानन्द, विद्यानन्द और
विषयानन्द। ऐसा विभाजन कर उन्होंने ब्रह्मानन्द को पुनः
तीन भागों में बाँटा- योगानन्द, आत्मानन्द और अद्वेतानन्द।
इन तीनों का विस्तृत निरूपण ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें
अध्यायों में किया गया। अब चौदहवें अध्याय में विद्यानन्द
का वर्णन करते है। आगे पंद्रहवें अध्याय में विषयानन्द का
निरूपण करेंगे।
इस विभाजन का मुख्य आधार बुद्धि वृतियाँ हैं। वृत्तिहीन
अवस्था में जो आनंद अनुभूत होता है वह ब्रह्मानन्द है।
वृतिप्रवाह के समय भी सुखानुभूति होती है। वह वृत्तिभेद से
विद्यानन्द और विषयानन्द दो प्रकार का हो सकता है। विद्या
ब्रह्मज्ञान है। बौद्धिक ब्रह्मज्ञान से सुख प्राप्त होता
है, वह विद्यानन्द है और भौतिक विषयों के संस्पर्श से जब
विषयाकार वृत्ति उत्पन्न होती है तो विषयानन्द का अनुभव
होता है।
इस अध्याय में विद्यानंद का वर्णन करते है। आचार्य ने इसके
चार अवान्तर भेद किये है - दुःखाभाव, कामाप्राप्ती,
कृतकृत्यता और प्राप्तप्राप्यता। सम्पूर्ण अध्याय में
इन्ही चारो का वर्णन क्रमशः किया गया है।
प्रवचन का समय- 8 घंटे
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