ब्रह्मानन्दगत योगानन्द

 

ग्रन्थ रचना की योजना के अनुसार इस अध्याय का नाम ब्रह्मनन्दगत योगनन्द है इसमें ब्रह्म के आनंद स्वरुप होने का शास्त्र प्रमाण दिया गया है सभी उपनिषद्, पुराण, गीता आदि ग्रन्थ इसे आनंदमय कहते है सुषुप्ति अवस्था में जब न बाह्य विषय प्राप्त होते है और न उन्हें ग्रहण करने वाले इन्द्रिय और मन बुद्धि ही होते है उस समय भी सुख का अनुभव होता है वह ब्रह्मानंद ही है अविद्या के कारण हम उसे जान नहीं पाते है ध्यानयोग के द्वारा ब्रह्म का यह आनंद जाग्रत अवस्था में भी प्राप्त किया जा सकता है मन शुद्ध और शांत होने पर उसमे ब्रह्मानंद का अनुभव होता है योग के द्वारा यह आनंद प्राप्त होने के कारण योगानंद कहलाता है यह ब्रह्मानंद से भिन्न कोई आनंद नहीं है इसलिए इसे 'ब्रह्मानन्दगत योगानंद' समझना चाहिए
 

प्रवचन का समय- 16 घंटे

फाईलों का भार - 217.80 एम बी

 

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योगानन्द-1

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