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गुरु परिचय |
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गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुरेव परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।३।। गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही शंकर (महेश्वर) हैं, गुरु ही परब्रह्म हैं उन गुरुदेव को मेरा प्रणाम है। |
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भारतीय संस्कृति का आधार वेदान्त दर्शन है। उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और श्रीमद् भगदगीता में इस दशॅन का प्रतिपादन किया गया है। आदि शंकराचार्य जी ने इन ग्रन्थों पर भाष्य लिख कर अद्वैत वेदान्त की स्थापना की । आज वही सर्वाधिक वैज्ञानिक और व्यावाहारीक होने के कारण भारत ही नहीं समस्त विश्व में आदरणीय है। |
परम पूज्य भगवान आदि शंकराचायॅ |
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इसी परम्परा मे आधुनिक काल में स्वामी तपोवन जी महाराज एक महान आचार्य के रुप में अवतरित हुए । वे अद्वैत वेदान्त के मूर्तमान रुप थे। उन्होंने अगली पीढी को अपने गंभीर साहित्य के साथ स्वामी चिन्मयानन्द जैसी एक महान विभूति दी। |
परम पूज्य स्वामी तपोवन महाराज जी
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स्वामी चिन्मयानन्द जी वर्तमान युग के महान कार्यकर्ता सिद्व हुए। उन्होंने चिन्मय मिशन की स्थापना की और देश के चारो दिशाओं में तथा समग्र विश्व में अद्वैत वेदान्त के प्रचार प्रसार में अद्भुत सफलता प्राप्त की। उन्होंने ज्ञान यज्ञ की परम्परा चलाई , प्रचुर साहित्य लिखा, ब्रह्मचारियों को वेदान्त का प्रशिक्षण दिया और अनेक केन्द्रों की स्थापना की। विद्यालयों और अस्पतालों आदि की स्थापना करा कर उन्होंने सामाजिक सेवा के कार्यों को प्रोत्साहन दिया। उनके अनेक शिष्य बडे प्रबुद्ध और मिशनरी कार्य में समर्पण भावना से लगे रहने वाले है। |
परम पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी
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वर्तमान काल में उनमें से एक स्वामी तेजोमयानन्द जी है जो इस समय चिन्मय मिशन संस्था के प्रमुख हैं। वे अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी आदि भाषायें जानते हैं। इन भाषाओ में प्रवचन आदि करते हैं और ग्रन्थ भी लिखे हैं। उनके संरक्षण में संस्था बड़े तीव्र गति से विकास कर रही हैं। |
परम पूज्य स्वामी तेजोमयानन्द जी
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