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प्रश्न

ब्रह्म

1) प्रश्न- सत्य वस्तु की पहचान क्या है ?

उत्तर  -  सत् शब्द पारमार्थिक या तत्त्वमीमांसा के अर्थ में जब प्रयुक्त किया जाता है तो निश्चय ही उसका अर्थ अपरिवर्तनीय या निर्विकार होता है। भगवान शंकराचार्य के मतानुसार सत्य वह है जिसके विषय में हमारी बुद्धि परिवर्तित हो अथवा जिस वस्तु का जो रुप निश्चित है उसमें परिवर्तन हो। जो कुछ दिखाई दे उसे ही सत्य मानना उचित नहीं है।        

2) प्रश्न   -  जगत् में कौन वस्तु ऐसी है जिसे सत्य कहा जा सके ?

उत्तर  -  जगत् की कुछ वस्तुयें प्रत्यक्ष ही विकारी दिखाई देती है। कुछ वस्तुयें अनुमान से अनित्य समझ में आती हैं और कुछ वस्तुयें शास्त्र प्रमाण से नश्वर जानने में आती है। इसलिए जगत् नामरुपात्मक, आदि अन्त वाला और विकारी है। इसमें कुछ भी सत्य नही हैं।  

3) प्रश्न  -  क्या जगत् के अतिरिक्त कुछ वस्तु है जिसे सत्य कह सकते है ?

उत्तर -  किसी वस्तु को सत्य होने के लिए उसे अपनी सत्ता से नित्य विद्यमान, अनादि अनन्त तथा अद्वितीय होना चाहिए। ऐसी कोई वस्तु अवश्य है अन्यथा जगत् की मिथ्या वस्तुओं को सत्ता का भान भी नहीं हो सकता। जैसे मिट्टी की सत्यता से धट सत्य प्रतीत होता है वैसे ही परम सत् की सत्यता से जगत् सत्य प्रतीत होता है। किसी भी परिवर्तनशील वस्तु के लिए एक नित्य अधिष्टान की आवश्यकता होती है।     

4) प्रश्न  -  यदि जगत् से परे कोई सद् वस्तु है तो वह क्या है ?

उत्तर -  हमारे वैदिक दर्शन में उसे ब्रह्म कहते है। उसे ब्रह्म कहने का कारण यही है कि वह ब्रह्मत्तम और पूर्ण है। ब्रह्म का कोई कारण नही है किन्तु वह समस्त मिथ्या जगत् का कारण है। जगत् ब्रह्म से उत्पन्न होकर उसी पर आश्रित रहता है और उसी में लीन हो जाता है। इसलिये जगत् ब्रह्म से भिन्न नही है। ब्रह्म शब्द का प्रयोग प्रायः दो अर्थो में किया जाता है- मुख्य और गौण। मुख्य अर्थ में इसका प्रयोग निरपेक्ष सत् के लिये किया गया है जो पूर्ण स्वस्वरुप, निर्गुण और अपरिवर्तनीय है। गौण अर्थ में उसका प्रयोग जगत् रचयिता के रुप में अर्थात् ईश्वर रुप में हुआ है।              

5) प्रश्न  - निर्गुण ब्रह्म अथवा सगुण ब्रह्म में क्या भेद है ?

उत्तर - निर्गुण ब्रह्म सत् - चित् और आनन्दस्वरुप निरुपाधिक सत्ता है। वह तीनों कालों में  एकसमान विद्यमान रहता है। सृष्टि काल में वह सृष्टि की अपेक्षा से सगुण माना जाता है। वह जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का हेतु है। वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सर्वान्तरयामी है। वह समग्र जगत् का स्वामी और जीवों का फलदाता है। उसे अपरब्रह्म अथवा ईश्वर भी कहते है। यह समझना ठीक नहीं है कि ब्रह्म दो है। एक ही ब्रह्म की दो अवस्थायें निर्गुण और सगुण हैं, जैसे जल और हिम।  

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